कृष्ण के संग कुछ कदम… और जिंदगी का सफर हो जाए आसान!
तरुण गर्ग की किताब ‘कुछ कदम कृष्ण के साथ’ श्रीमद्भगवद्गीता के 18 अध्यायों की सीख को आज की जिंदगी की उलझनों, तनाव और चिंताओं से जोड़ती है। सरल संवाद शैली में लिखी यह किताब कर्म, धैर्य, संयम और आत्मचिंतन जैसे संदेशों को सहज ढंग से सामने रखती है। 90 पन्नों की यह पुस्तक गीता की गहरी दार्शनिक टीका नहीं, बल्कि उसे आम पाठक के जीवन के करीब लाने का प्रयास है। इसका मूल संदेश यही है कि परिणाम की चिंता में कर्म न छोड़ें और कठिन परिस्थितियों में कृष्ण की सीख को व्यवहार में उतारें।
-बृज खंडेलवाल-
क्या जिंदगी के हर सवाल का जवाब किसी मोटे-मोटे ज्ञान की किताब में ही छिपा है? या फिर कभी-कभी जवाब वहीं मिल जाता है, जहां हम देखना भूल जाते हैं; श्रीकृष्ण की सीख में?
आज का कुरुक्षेत्र भी कम दिलचस्प नहीं है। कहीं दफ्तर में तनाव है, कहीं कारोबार में चिंता। कहीं रिश्तों की उलझन है तो कहीं भविष्य का डर। अर्जुन तब रथ पर परेशान था, आज का आदमी मोबाइल हाथ में लेकर परेशान है।
तरुण गर्ग की छोटी-सी किताब ‘कुछ कदम कृष्ण के साथ’ इसी बेचैनी को समझने की कोशिश करती है। किताब श्रीमद्भगवद्गीता के 18 अध्यायों की सीख को आज की जिंदगी से जोड़ती है। भाषा सरल है और अंदाज बातचीत जैसा है।
किताब का कवर ही इसकी कहानी का संकेत दे देता है। एक आधुनिक युवक कृष्ण के साथ चल रहा है। दोनों के बीच बातचीत हो रही है। लगता है जैसे आज का अर्जुन अपनी परेशानियां लेकर कृष्ण के पास पहुंच गया हो।
समय बदल गया है, लेकिन इंसान के सवाल शायद ज्यादा नहीं बदले। नौकरी का दबाव हो या कारोबार की चिंता, परिवार की परेशानी हो या भविष्य का डर; सवाल आज भी वही हैं।
मैं क्या करूं? सही रास्ता कौन-सा है? मुश्किल समय में खुद को कैसे संभालूं?
यहीं तरुण गर्ग की किताब पाठक का हाथ पकड़ लेती है।
वे गीता को कठिन दार्शनिक भाषा में समझाने नहीं बैठते। न संस्कृत के भारी शब्दों का बोझ डालते हैं, न पाठक को विद्वान बनने की परीक्षा देते हैं। वे सरल सवाल-जवाब और रवि नाम के एक आधुनिक किरदार के जरिए कृष्ण की सीख सामने रखते हैं।
रवि कोई पौराणिक पात्र नहीं है। वह हमारे आसपास का आदमी है। उसके सवाल भी हमारे जैसे हैं। इसलिए पाठक को उससे जुड़ने में ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती।
किताब का मकसद गीता की कोई अंतिम या विद्वत्तापूर्ण व्याख्या करना नहीं है। मकसद सीधा है, गीता को जिंदगी के करीब लाना।
बहुत से लोग गीता का नाम सुनकर ही थोड़ा घबरा जाते हैं। लगता है कि इसे समझने के लिए संस्कृत, दर्शन और धर्मशास्त्र पढ़ना पड़ेगा। गर्ग इस डर की गांठ खोलने की कोशिश करते हैं।
उनका संदेश है कि कृष्ण की बातें केवल मंदिर या पूजा तक सीमित नहीं हैं। उनका संबंध हमारे रोज के फैसलों, व्यवहार और सोच से भी है।
किताब का सबसे महत्वपूर्ण संदेश भी सीधा है, कर्म करते रहिए और परिणाम की चिंता में अपना कर्म मत बिगाड़िए।
आज हर कोई नतीजे के पीछे भाग रहा है। विद्यार्थी अच्छे अंक चाहते हैं। युवा अच्छी नौकरी चाहते हैं। कर्मचारी पदोन्नति चाहते हैं। कारोबारी ज्यादा मुनाफा चाहते हैं।
और सोशल मीडिया ने तो इस दौड़ में पेट्रोल डाल दिया है।
दूसरे की चमकती जिंदगी देखकर हमें अपनी जिंदगी फीकी लगने लगती है। हर किसी को लगता है कि बाकी सब आगे निकल गए और हम पीछे रह गए।
ऐसे समय में गीता का कर्मयोग बहुत काम की बात करता है। अपना काम ईमानदारी से करो। अपनी जिम्मेदारी निभाओ। परिणाम की चिंता में आज का काम मत खराब करो।
तरुण गर्ग खुद कई क्षेत्रों से जुड़े रहे हैं। आगरा के सफल व्यवसायी होने के साथ वे एंकर, अभिनेता, गायक, कवि और पॉडकास्टर भी हैं। शायद इसी वजह से उनकी लेखन शैली में संवाद और मंचीय सहजता दिखाई देती है।
वे पाठक को भाषण नहीं देते। उससे बातचीत करते हैं।
किताब की एक और खूबी इसकी संक्षिप्तता है। केवल 90 पन्नों में गीता के 18 अध्यायों की मूल भावना तक पहुंचाना आसान काम नहीं। लेकिन इसी वजह से यह किताब उन लोगों के लिए उपयोगी हो सकती है, जो गीता पढ़ना चाहते हैं लेकिन उसकी विशालता देखकर शुरुआत ही नहीं कर पाते।
बेशक, इसे गीता पर कोई गहरी दार्शनिक टीका समझना उचित नहीं होगा। गंभीर अध्ययन के लिए इससे कहीं बड़े और विस्तृत ग्रंथ उपलब्ध हैं।
लेकिन यह किताब ऐसा दावा भी नहीं करती।
इसकी ताकत कुछ और है। यह कठिन बात को आसान भाषा में कहती है। और कई बार आसान भाषा ही सीधे दिल तक पहुंचती है।
किताब पढ़ते हुए महसूस होता है कि लेखक कृष्ण को केवल पूजनीय देवता के रूप में नहीं, बल्कि जिंदगी के मार्गदर्शक के रूप में सामने लाना चाहते हैं।
मन भ्रमित हो तो कृष्ण की सीख याद करो।
संकट सामने हो तो कर्म मत छोड़ो।
नतीजा मनमाफिक न मिले तो धैर्य रखो।
सफलता मिले तो अहंकार से बचो।
और जब रास्ता समझ न आए तो थोड़ा अपने भीतर झांको।
आखिर ज्ञान की असली परीक्षा किताब के पन्नों में नहीं होती। वह हमारे व्यवहार में दिखाई देता है।
गुस्से के समय संयम रहे। असफलता के समय हिम्मत रहे। सफलता के समय विनम्रता रहे। मुश्किल समय में कर्तव्य याद रहे।
तभी गीता की सीख जिंदगी में उतरती है।
इस नजर से देखें तो ‘कुछ कदम कृष्ण के साथ’ केवल पढ़ने की किताब नहीं है। यह रुककर सोचने की किताब भी है।
कभी-कभी जिंदगी में लंबे भाषण की जरूरत नहीं होती। कोई बस इतना कह दे; “घबराओ मत, अपना कर्म करते रहो।”
कृष्ण ने अर्जुन से संवाद किया था। तरुण गर्ग ने उसी संवाद को आज के पाठक तक पहुंचाने की कोशिश की है।
इस किताब की सबसे बड़ी खूबी शायद यही है कि इसमें हमें अपने सवाल दिखाई देते हैं। और उन्हीं सवालों के बीच कृष्ण की सीख एक शांत आवाज की तरह सुनाई देती है।
कृष्ण के साथ चलने के लिए शायद हमेशा लंबी यात्रा जरूरी नहीं होती। कभी-कभी कुछ कदम ही काफी होते हैं।
तरुण गर्ग की यह किताब उन्हीं कुछ कदमों का निमंत्रण है।
पुस्तक: कुछ कदम कृष्ण के साथ।
लेखक: तरुण गर्ग।
प्रकाशक: निखिल पब्लिशर्स, आगरा।
पृष्ठ: 90 - मूल्य: ₹299