शरद पवार की छत्रछाया से सत्ता संघर्ष तकः ‘अजित दादा’ के अचानक चले जाने से थम गई महाराष्ट्र की आक्रामक राजनीति, छह बार के उपमुख्यमंत्री का अधूरा रह गया मुख्यमंत्री बनने का सपना, और अब सवाल- उनकी सियासी विरासत का असली वारिस कौन?
यह कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि महाराष्ट्र की राजनीति एक सुबह जागती है और सत्ता के गलियारों में एक भारी ख़ामोशी पसर जाती है। ‘अजित दादा’ की आवाज़ नहीं, उनके तेज़ फैसलों की आहट नहीं, और न ही वह आक्रामक ऊर्जा जो संकट में भी समीकरण पलट देती थी। दुर्भाग्य से महाराष्ट्र की राजनीति में ऐसा दिन बुधवार (28 फरवरी) को आया, जब राज्य के उप मुख्यमंत्री अजित पवार का एक विमान हादसे में निधन हो गया। यह सिर्फ़ एक नेता के जाने तक सीमित नहीं है बल्कि यह एक पूरी राजनीतिक शैली का विराम है।
-एसपी सिंह-
महाराष्ट्र की राजनीति में ‘अजित दादा’ सिर्फ़ एक नाम नहीं, बल्कि एक सियासी शैली, तेज़ फैसलों और बेबाक सत्ता-व्यवहार का पर्याय रहा है। शरद पवार की छत्रछाया में राजनीति की शुरुआत करने वाले अजित पवार ने तीन दशक से अधिक समय तक सत्ता के केंद्र में रहकर संगठन गढ़ा, सरकारें बनाईं–बिगाड़ीं और कई बार इतिहास रचा। छह बार उपमुख्यमंत्री बने, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने का सपना अंत तक अधूरा रह गया। उनकी राजनीति समझौते, टकराव, महत्वाकांक्षा और विरासत, चारों का संगम रही। महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री अजित पवार की बुधवार (28 फरवरी) को विमान हादसे में मौत के बाद यह सवाल आ खड़ा हुआ है कि उनकी विरासत का वारिस कौन होगा?
शरद पवार की छाया में ‘दादा’ का उदय
अजित पवार ने राजनीति में कदम अपने चाचा और दिग्गज नेता शरद पवार की मार्गदर्शक छत्रछाया में रखा। 1990 के दशक में उन्होंने जमीनी राजनीति को अपनाया। ग्रामीण महाराष्ट्र, सहकार आंदोलन, सिंचाई परियोजनाएं और संगठनात्मक नेटवर्क उनकी ताक़त बने। अपनी कार्यशैली की वजह से ही वे पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच लोकप्रिय हो गये थे। उनकी सांगठनिक क्षमता को देखते हुए ही चाचा शरद पवार संगठन की ओर से बेफिक्र होकर दिल्ली की राजनीति पर पूरा फोकस कर पाते थे।
लगातार 35 वर्षों तक विधायक चुना जाना उनके जनाधार और सांगठनिक पकड़ का प्रमाण रहा। शरद पवार की रणनीतिक राजनीति के साथ अजित पवार की आक्रामक कार्यशैली ने पार्टी को कई जिलों में मजबूती दी।
संगठन निर्माण में भूमिका: सत्ता का ‘फील्ड कमांडर’
पार्टी संगठन में अजित पवार को अक्सर फील्ड कमांडर माना गया। बूथ से लेकर जिला स्तर तक नेटवर्क, सहकार क्षेत्र और स्थानीय निकायों में पैठ और चुनावी प्रबंधन और गठबंधन-समझ। इन सबने उन्हें शरद पवार के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक उत्तराधिकारियों में शुमार किया। सत्ता के समीकरण बदलने में उनकी निर्णायक भूमिका रही, चाहे सरकार बनानी हो या दबाव बनाना।
उपमुख्यमंत्री के छह कार्यकाल: शक्ति, विवाद और प्रभाव
अजित पवार छह बार महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री बने। यह अपने आप में रिकॉर्ड है। प्रशासनिक पकड़, वित्त और विकास से जुड़े बड़े फैसले, सिंचाई, बुनियादी ढांचे और ग्रामीण विकास पर फोकस जहां उन्हें अलग पहचान देते थे, वहीं विवाद भी साये की तरह चलते रहे। उनके तीखे बयान और सत्ता के सीधे इस्तेमाल ने समर्थक और आलोचक, दोनों पैदा किए।
जब चाचा-भतीजी की राहें जुदा हुईः सत्ता बनाम विरासत
वर्ष 2019 में शरद पवार और अजित पवार रिश्तों में सबसे बड़ा मोड़ आया। 2019 में सत्ता के अचानक बदले समीकरणों ने दोनों के रिश्ते में पहली दरार डाली। दरअसल 2019 में भाजपा-शिवसेना गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिला था। इसके बाद शिवसेना ने ढाई वर्ष के लिए मुख्यमंत्री पद पर दावा ठोक दिया था। इसी दरम्यान एक दिन अचानक खबर आती है कि अजित पवार एनसीपी के विधायकों के साथ भाजपा से जा मिले हैं। आनन-फानन में भाजपा के देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री और अजित पवार ने उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली थी।
राजनीति के जानकार बताते हैं कि अजित पवार ने यह कदम चाचा शरद पवार की सहमति से ही उठाया था, लेकिन शपथ होने के बाद शरद पवार ने इसके खिलाफ स्टैंड लिया। उन्होंने अजित पवार के निर्णय के खिलाफ जाकर पार्टी विधायकों की बैठक बुलाकर साबित कर दिया कि विधायक उनके साथ हैं। नतीजा यह हुआ कि देवेंद्र फड़णवीस और अजित पवार को चंद घंटों बाद ही इस्तीफा देना पड़ा। इसके कुछ समय बाद अजित पवार अपने चाचा शरद पवार के पास लौट आये थे। शरद पवार ने भी उन्हें माफ कर उद्धव ठाकरे की सरकार में शरद पवार ने उन्हें उप मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवाई थी।
कहने को तो यह कहा जा सकता है कि भाजपा खेमे से वापस चाचा के पास लौटने से चाचा-भतीजे के रिश्ते सामान्य हो गये थे, लेकिन एनसीपी के अंतःपुर की जानकारियां रखने वाले बताते हैं कि अजित पवार मन ही मन खिन्न थे। इसकी वजह थी यह थी कि अजित पवार मानते थे कि चाचा ने उन्हें पहले भाजपा के कैंप में भेजा और फिर कदम वापस खींचकर उनकी क्रेडिबिलिटी को नुकसान पहुंचाया। इस असंतोष का विस्फोट साल 2023 में हुआ, जब उन्होंने पार्टी के विधायकों का बड़ा धड़ा अपने साथ लेकर भाजपा से हाथ मिलाया और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली सरकार में उप मुख्यमंत्री बन गये। चाचा-भतीजे के बीच की यह दरार खुली बगावत में बदल गई, क्योंकि अजित पवार ने पार्टी को तोड़कर अपना अलग रास्ता चुन लिया था।
यह टकराव सिर्फ़ व्यक्तिगत नहीं था, यह विरासत बनाम सत्ता की राजनीति थी।
शरद पवार जहां संस्थागत धैर्य और दीर्घकालिक रणनीति के प्रतीक रहे, वहीं अजित पवार ने तात्कालिक सत्ता और प्रशासनिक प्रभाव को प्राथमिकता दी। दोनों की राजनीति की भाषाएं अलग थीं, और यही टकराव का मूल बना।
मुख्यमंत्री का सपना: क्यों रह गया अधूरा?
अजित पवार के पास जनाधार, अनुभव और सत्ता-संचालन एक्सपीरियंस समेत सब कुछ था। फिर भी मुख्यमंत्री की कुर्सी उनसे दूर रही। इसके कारणों पर गौर करें तो पाते हैं कि गठबंधन राजनीति की जटिलताएं, पार्टी के भीतर नेतृत्व संतुलन, शरद पवार की दीर्घकालिक रणनीति और स्वयं अजित पवार की आक्रामक शैली, इन सबने मिलकर उन्हें बार-बार उपमुख्यमंत्री की भूमिका तक सीमित रखा। अजित पवार ने जब चाचा शरद पवार का साथ छोड़ा था, तब सीएम की कुर्सी तक न पहुंच पाने की पीड़ा व्यक्त करते हुए इसके लिए चाचा को कोसा था कि उन्होंने कभी सीएम की कुर्सी तक नहीं पहुंचने दिया।
राजनीतिक विरासत: दादा क्या छोड़ गए?
अजित पवार की राजनीति को एक पंक्ति में नहीं बांधा जा सकता। वह संगठन के मज़बूत निर्माता थे। सत्ता के कुशल संचालक की रूप में भी उनकी पहचान रही। और सबसे बड़ी बात, वह टकराव से पीछे न हटने वाले नेता भी रहे।
उनकी विरासत महाराष्ट्र की राजनीति में लंबे समय तक बहस का विषय रहेगी कि क्या वे विरासत के वारिस थे या सत्ता के स्वप्नद्रष्टा।
महाराष्ट्र की राजनीति ने ‘अजित दादा’ को खो दिया है। यह केवल व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि यह तेज़ फैसलों, सीधे टकराव और सत्ता-प्रबंधन की एक पूरी पाठशाला पर विराम लगने जैसा है। ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि क्या यह विराम स्थिरता लाया है या फिर अनिश्चितता?
कुल मिलाकर अजित पवार की राजनीति ने महाराष्ट्र को दशकों तक प्रभावित किया। कभी छाया में, कभी केंद्र में। ‘अजित दादा’ की कहानी सत्ता की सीढ़ियों, रिश्तों के उतार-चढ़ाव और अधूरे सपनों की कहानी है, जो आने वाले समय में भी सियासी विमर्श को दिशा देती रहेगी।