दिल बिकता है तो बिकने दे, आंसू न बहा, फरियाद न कर, बस संत वेलेंटाइन से प्रार्थना कर!!
भारत में वैलेंटाइन डे अब निजी प्रेम का उत्सव कम और बाजार का बड़ा आयोजन अधिक बन गया है। इश्क़ भावनाओं से निकलकर ऑफ़र, उपहार और सोशल मीडिया प्रदर्शन में ढल गया है। युवा पीढ़ी प्रेम चाहती है, लेकिन शादी और स्थायी बंधनों को लेकर संकोच में है। सवाल यह है कि यह आज़ादी है या बाजार द्वारा गढ़ी गई नई असुरक्षा।
-बृज खंडेलवाल-
“ये इश्क़ नहीं आसाँ, बस इतना समझ लीजिए, एक आग का दरिया है और डूब के जाना है।” कभी यह शेर मोहब्बत की तपिश, उसके त्याग और उसकी गहराई का बयान हुआ करता था। आज वही आग का दरिया कॉम्बो ऑफर में उपलब्ध है। एक लाल गुलाब के साथ चॉकलेट फ्री, चॉकलेट के साथ टेडी फ्री और सबके साथ इंस्टाग्राम रील बोनस। इश्क अब दिलों की खामोश धड़कनों से ज्यादा मोबाइल स्क्रीन की चमक में दर्ज हो रहा है।
इस बार देखा भारत में वैलेंटाइन डे अब प्रेम का निजी उत्सव कम और बाजार का सार्वजनिक मेला अधिक बन चुका है। फरवरी की शुरुआत होते ही शहरों की हवा में लाल रंग घुलने लगता है। मॉल सज जाते हैं, रेस्टोरेंट्स में एडवांस बुकिंग का तांता लग जाता है, गिफ्ट शॉप्स पर भीड़ उमड़ पड़ती है। सोशल मीडिया पर प्रेम का प्रदर्शन किसी प्रतियोगिता जैसा दिखता है। किसने क्या दिया, किसने कहाँ डिनर किया, किसने कितनी महंगी अंगूठी पहनाई। रिश्ते जैसे इवेंट मैनेजमेंट का प्रोजेक्ट बनते जा रहे हैं। दिखावे की इस चमक में गहराई अक्सर पीछे छूट जाती है।
आंकड़े बताते हैं कि यह केवल भावनाओं का मामला नहीं, बल्कि एक विशाल कारोबार है। 2021 में लगभग पंद्रह हजार करोड़ रुपये का वैलेंटाइन बाजार 2025 तक बढ़कर करीब अट्ठाईस हजार पांच सौ करोड़ रुपये पर पहुंच गया और 2026 में इसके बत्तीस हजार करोड़ रुपये पार करने का अनुमान है। ई कॉमर्स कंपनियां, क्विक डिलीवरी ऐप्स, होटल, ज्वेलरी ब्रांड और ऑनलाइन गिफ्टिंग प्लेटफॉर्म इस सीजन को किसी त्योहार से कम नहीं मानते। फूलों का कारोबार ही हजारों करोड़ में है। लाखों गुलाब कुछ ही दिनों में बिक जाते हैं। छोटे शहरों और कस्बों में भी प्रेम का यह बाजार तेजी से फैला है। दिलचस्प यह कि अब आगरा जैसे टियर टू और टियर थ्री शहरों से आने वाले ऑर्डर कुल बिक्री का बड़ा हिस्सा बन चुके हैं। महिलाएं भी बड़ी संख्या में खरीदारी कर रही हैं और परफ्यूम, ज्वेलरी जैसे प्रैक्टिकल गिफ्ट्स की मांग बढ़ी है।
पर सवाल केवल बाजार का नहीं है, मानसिकता का भी है। युवा पीढ़ी आज पहले से कहीं अधिक स्वतंत्र है। करियर, आर्थिक अस्थिरता, महंगाई, नौकरी की अनिश्चितता और जलवायु संकट जैसी चिंताएं उसके सामने हैं। ऐसे में शादी और स्थायी रिश्तों को लेकर हिचक स्वाभाविक दिखती है। कई सर्वे बताते हैं कि बाईस से पैंतीस वर्ष आयु वर्ग के लगभग उनतालीस प्रतिशत युवा अट्ठाईस वर्ष की उम्र पार करने के बाद भी शादी को वैकल्पिक मानते हैं। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के आंकड़ों के अनुसार लगभग तेईस प्रतिशत युवा विवाह को प्राथमिकता नहीं देते। डेटिंग ऐप्स पर सक्रिय जेन जी पीढ़ी में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो इन प्लेटफॉर्म्स का उपयोग केवल दोस्ती और नेटवर्किंग के लिए करते हैं।
यह नई पीढ़ी प्रेम से भाग नहीं रही, बल्कि उसे अपनी शर्तों पर परिभाषित करना चाहती है। वह भावनाएं चाहती है पर बंधन से डरती है। वह साथ चाहती है पर स्थायित्व की गारंटी देने से हिचकती है। पुरानी फिल्मों का “हमेशा साथ निभाएंगे” वाला वादा अब उसे भारी लगता है। उसकी शब्दावली में घोस्टिंग, सिचुएशनशिप और देखते हैं क्या होता है जैसे वाक्य आम हैं। सवाल यह है कि यह आजादी है या असुरक्षा का नया नाम। क्या यह दिल टूटने से बचने की कोशिश है या संवेदनाओं को सीमित करने की आदत।
पुराना प्रेम धैर्य, इंतजार, समझौते और संघर्ष का साहस मांगता था। चिट्ठियों की स्याही में महीनों की प्रतीक्षा का रंग होता था। आज संदेश सेकंडों में पहुंचते हैं और जवाब में देरी होने पर बेचैनी शुरू हो जाती है। रिश्ते भी उसी तेजी से बनते और टूटते दिखते हैं। डिजिटल दुनिया ने इजहार को आसान बना दिया है, पर गहराई को कठिन।
फिर भी तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। कुछ सर्वे बताते हैं कि अधिकांश महिलाएं स्थायी और गंभीर रिश्तों को प्राथमिकता देती हैं। युवा पीढ़ी विवाह को अनिवार्य सामाजिक बंधन नहीं मानती, पर इसका अर्थ यह नहीं कि वह प्रेम को हल्के में लेती है। वह दोस्ती, आत्म प्रेम और भावनात्मक संतुलन को भी महत्व दे रही है। गैलेंटाइन डे जैसे चलन दोस्ती के जश्न को भी बराबर जगह दे रहे हैं। यह बदलाव समाज में रिश्तों की विविधता को स्वीकार करने की दिशा में एक कदम भी हो सकता है।
समस्या तब पैदा होती है जब बाजार भावनाओं का एक तयशुदा प्रारूप रच देता है। जैसे प्रेम का मतलब केवल महंगा डिनर, महंगे उपहार और सार्वजनिक प्रदर्शन रह गया हो। असल मोहब्बत की कसौटी न तो कीमत है और न ही सोशल मीडिया पर लाइक्स की संख्या। गुलाब मुरझा जाते हैं, चॉकलेट पिघल जाती है, रील का ट्रेंड बदल जाता है। जो टिकता है वह आपसी भरोसा, संवाद और सम्मान है।
आज का दौर प्रेम को बंधनों से मुक्त कर रहा है, पर उसे बाजार की गिरफ्त में भी दे रहा है। चुनाव हमारे हाथ में है। हम इश्क को केवल ऑफर और डिस्काउंट तक सीमित कर दें या उसे उस आग के दरिया की तरह जिएं जिसमें डूबने का साहस भी हो और पार पहुंचने का धैर्य भी।