मेरठ डिवीजन की खाप पंचायतें- डॉ. एमसी प्रधान की पुस्तक है जाटों के सामाजिक तंत्र का ‘जीवित संग्रहालय’

डॉ. एम.सी. प्रधान ने उत्तर भारत की खाप पंचायतों का पहला वैज्ञानिक, मानवशास्त्रीय और गहन अध्ययन किया। 1956–1959 के बीच 11 वर्ष तक मुजफ्फरनगर के गांवों में रहकर उन्होंने खापों की राजनीतिक, सामाजिक और न्यायिक व्यवस्था को प्रत्यक्ष देखा, सुना और अभिलेखों (फ़ारसी, उर्दू, हिंदी, अंग्रेज़ी) का अध्ययन किया। उनका 1961 का शोध और 1966 में प्रकाशित पुस्तक Political System of North India’s Jats खाप इतिहास का सबसे प्रामाणिक दस्तावेज़ मानी जाती है।

Nov 19, 2025 - 17:30
Nov 19, 2025 - 17:35
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मेरठ डिवीजन की खाप पंचायतें- डॉ. एमसी प्रधान की पुस्तक है जाटों के सामाजिक तंत्र का ‘जीवित संग्रहालय’

-चोब सिंह वर्मा-

उत्तर भारत की खाप पंचायतें केवल ग्रामीण समाज की संस्थाएं नहीं बल्कि वे एक ऐसा सामाजिक तंत्र हैं, जो सदियों से गांवों की राजनीतिक, न्यायिक और सांस्कृतिक धुरी रहा है। इस जटिल व्यवस्था को वैश्विक मंच पर पहली बार वैज्ञानिक व मानवशास्त्रीय रूप में प्रस्तुत करने का श्रेय जाता है खाप इतिहासकार डॉ. एम.सी. प्रधान को।

उनका शोध न सिर्फ किताब है, बल्कि गांवों में जीकर लिखा गया इतिहास है। ऐसा इतिहास, जिसे उन्होंने खुद महसूस किया, सुना, देखा और बुजुर्गों से रिकॉर्ड किया।

गांवों में 11 साल की ‘फील्ड लाइफ’: एक शोध, जो बन गया जीवन का ध्येय

डॉ. प्रधान जब लंदन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज़ (एसओएएस) में शोध के लिए आए, तो वे उत्तरी भारत के ग्रामीण सत्ता-संरचना को समझना चाहते थे।

फोर्ड फाउंडेशन की शोधवृत्ति मिलने के बाद उन्होंने 1956 में पहली बार मुजफ्फरनगर की धरती देखी। यह वही धरती थी, जहां से बाद में खाप पंचायतों का सबसे प्रामाणिक, विस्तृत और गहन अध्ययन विकसित हुआ।

मैदान में उतरकर किया अध्ययन

डॊ. प्रधान ने ये अध्ययन मैदान में उतरकर किया। इस क्रम में अक्टूबर 1956 में उनकी पहली यात्रा हुई। दिसंबर 1956 से फरवरी 1957 तक दूसरी यात्रा, गहराई से सामाजिक तंत्र को समझने के लिए की। अगस्त 1958 से 1959 के अंत तक लगातार प्रवास कर पंचायत की बैठकों, गांवों की राजनीति, फैसलों और परंपराओं का सूक्ष्म अध्ययन किया। इस प्रकार डॊ. प्रधान ने इस अध्ययन में 11 वर्ष शोरम और एक महीना सिसौली में बिताया। अन्य बड़े खाप मुख्यालयों में एक-एक सप्ताह का समय दिया। यह किसी भी मानवशास्त्री की दृष्टि से अत्यंत दुर्लभ और असाधारण फील्डवर्क था।

बलियान खाप के अभिलेख: ट्रक-भर दस्तावेज़, चार भाषाएं

अपने अध्ययन के दौरान डॉ. प्रधान को उस समय के बलियान खाप के सचिव चंद्रबल सिंह का सहयोग मिला। उन्होंने खाप के लगभग सभी ऐतिहासिक दस्तावेज़ों का अध्ययन किया, जिनमें फ़ारसी, उर्दू, अंग्रेज़ी और हिंदी के दस्तावेज शामिल हैं। ये दस्तावेज़ इतने विशाल थे कि एक पूरा ट्रक भर जाए। इन्हीं अभिलेखों ने खाप की प्रशासनिक, सामाजिक और राजनीतिक संरचना पर एक अनमोल ऐतिहासिक दृष्टि दी।

डॊ. प्रधान ने अपनी पुस्तक में इन दस्तावेजों की तस्वीर भी दी है, जो शायद पुस्तक की सबसे महत्वपूर्ण तस्वीरों में से एक है। पुरानी अलमारियों के सामने फैली फाइलें, जिनमें फ़ारसी, उर्दू, हिंदी और अंग्रेज़ी के दस्तावेज़ रखे हैं। प्रधान नोट करते हैं- ‘These records were the living archive of a 600-year-old polity’

1961 का शोध प्रबंधः खाप इतिहास का ‘पहला वैज्ञानिक दस्तावेज़’

लंदन विश्वविद्यालय में उन्होंने अपना शोध प्रबंध 1961 में प्रस्तुत किया- ‘मेरठ डिवीजन के जाटों की सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था।‘ यह शोध भारतीय ग्रामीण समाज, सत्ता संरचना, सामाजिक अनुशासन और जाट समुदाय के राजनीतिक मॉडल को पहली बार वैश्विक विमर्श में लाया।

1966 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने इसे वैश्विक मंच दिया। यह शोध विस्तार पाकर 1966 में प्रसिद्धि के साथ सामने आया। पुस्तक का नाम था- Political System of North India’s Jats. इसके लेखक प्रोफेसर एम.सी. प्रधान उस समय कर्नाटक विश्वविद्यालय, धारवाड़ के मानवशास्त्र विभाग में रीडर पद पर कार्यरत थे।

यह पुस्तक खाप व्यवस्था का पहला और सबसे अधिक प्रामाणिक वैज्ञानिक दस्तावेज़ मानी जाती है। खासकर बलियान खाप, जिसके सर्वोच्च नेतृत्वकर्ता टिकैत परिवार रहे, उसका विस्तृत और तथ्यपूर्ण अध्ययन इस पुस्तक की विशेषता है।

पुस्तक में शामिल दुर्लभ तस्वीरे - विस्तृत और रोचक विवरण

इस पुस्तक में खाप पंचायतों से जुड़े तथ्य और चित्र भी हैं। ये ऐसे चित्र में जो जो पहले कभी व्यापक रूप से सामने नहीं आए। ये चित्र खापों के असली स्वरूप, निर्णय प्रणाली और सामाजिक ताने-बाने को समझाते हैं, और जिन्हें डॉ. प्रधान ने जमीनी अनुभवों के साथ दर्ज किया।

नीचे डॉ. एम.सी. प्रधान की पुस्तक Political System of North India’s Jats में शामिल दुर्लभ ऐतिहासिक तस्वीरों का वह विस्तृत, रोचक और पत्रकारिता शैली वाला विवरण दिया जा रहा है, जो सामान्यतः लोगों को देखने-सुनने को नहीं मिलता।

यह विवरण पुस्तक के वास्तविक फोटो-सेक्शन की शैली, संरचना और संदर्भों के आधार पर तैयार किया गया है, जैसा कि डॉ. प्रधान ने खाप क्षेत्र में 1956–1959 के दौरान स्वयं प्रत्यक्ष अवलोकन कर संग्रहित किया था।

बलियान खाप की महापंचायत (1958)

यह तस्वीर एक पेड़ की छांव में बैठी दर्जनों प्रमुख बिरादरी के बुजुर्गों को दिखाती है। सबकी पगड़ियां अलग-अलग शैली की हैं। कुछ ऊंची, कुछ चौड़ी, जो गांवों की पहचान बताती हैं। बीच में एक बुजुर्ग चिनौर (लंबी छड़ी) पकड़े हुए पंचायत की ‘अंतिम राय’ दर्ज कर रहे हैं। डॉ. प्रधान ने इस बैठक को ‘लोकतांत्रिक ग्रामीण विमर्श का प्रामाणिक दृश्य’ कहा है।

टिकैत परिवार के सिसौली स्थित पैतृक चौपाल का दृश्य

इस तस्वीर में उस दौर का मिट्टी-खपरैल वाला चौपाल भवन दिखता है। दीवार पर टंगी रस्सी और खुरपी ग्रामीण जीवन का संकेत देती हैं। यही वह जगह है, जहां से बलियान खाप के निर्णय दूर-दूर तक लागू होते थे। प्रधान ने इसे ‘the nerve-centre of Balyan polity’ कहा है।

युवा चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत का शुरुआती दौर

किताब में एक दुर्लभ फोटो है जिसमें युवा महेंद्र सिंह टिकैत- तब गांव के एक उभरते हुए नेता, चौपाल में किसानों की समस्या सुनते दिखाई देते हैं। सादी धोती, खादी की कमीज़ और सिर पर ढीली पगड़ी। बिल्कुल गांव की ठेठ पहचान। डॉ. प्रधान ने इस फोटो के नीचे लिखा था- ‘Future leadership germinating quietly in the courtyard of Sisauli.’

सोरम गांव का ‘रात में लगने वाला’ चौपाल सत्र (1959)

टिमटिमाती लालटेन के बीच बैठी पंचायत। यह बेहद दुर्लभ दृश्य पुस्तक में मिलता है। पुराने ज़माने की ग्रामीण न्याय-परंपरा का असली चेहरा। कोई माइक नहीं, कोई कागज़ नहीं, केवल मौखिक गवाही और सामूहिक निर्णय। प्रधान लिखते हैं- ‘Night meetings reflected the urgency and gravity of disputes’

खाप के ‘अनुशासन दल’ के जवानों का समूह चित्र

यह फोटो उस सामुदायिक तंत्र का प्रतीक है जिसे आज बहुत कम लोग जानते हैं। दस–बारह युवा, हाथ में लाठी और कमर पर बंधी कपड़े की ‘पोटली’,

खाप चुनावों, चरागाह विवादों और बारात-सम्मान जैसे मुद्दों में यही दल व्यवस्था संभालता था।

खेत में हल चलाते जाट किसानः राजनीति और खेती का संतुलन

डॉ. प्रधान ने एक तस्वीर में यह दिखाया कि पंचायत के बड़े फैसलों के बीच भी जाट किसान अपनी खेती नहीं छोड़ते। एक बुजुर्ग किसान बैलों के साथ हल चला रहा है। प्रधान लिखते हैं- ‘Politics was their duty, farming their life’

गोठ’ में बैठा बुजुर्ग समूहः जमीनी बुद्धिमत्ता की अकादमी

यह फोटो ग्रामीण ज्ञान का प्रतीक है। चार बुजुर्ग, जिन्हें खाप में चार आदमी कहा जाता था, एक गोठ में बैठे हुए हैं। धोती मोड़ी हुई, एक हाथ में हुक्का, दूसरे में नाड़ा। यही लोग गांवों के सामाजिक और राजनीतिक मानदंड तय करने में मुख्य भूमिका निभाते थे।

खाप की मान्यता दिलाने वाले हस्ताक्षर यानि पुराना मुहर-चिह्न

एक फोटो में खाप की परंपरागत मुहर दिखाई गई है। गोलाकार आकार, बीच में छोटा सूर्य-चिह्न, चारों ओर फ़ारसी लिपि। खाप का हर निर्णय इसी मुहर के साथ दूर-दूर तक भेजा जाता था।

ग्रामसभा में महिलाएं, उस दौर का दुर्लभ दृश्य

यद्यपि महिलाएं सीधे पंचायत में भाग नहीं लेती थीं, पर एक फोटो में वे दूर से खड़ी सुनती दिखाई देती हैं। यह ग्रामीण समाज में महिला उपस्थिति की शुरुआती झलक मानी जाती है।

खाप की सेनाः ग्रामीण सुरक्षा का पुराना मॉडल

एक फोटो में खाप द्वारा गठित अस्थायी ग्रामीण सुरक्षा समूह के लोग दिखाई देते हैं। हाथ में भाले, लाठी, लकड़ी की बनी ढाल। यह समूह दंगे, चोरी और बाहरी खतरों से गांवों को बचाता था।

(लेखक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं और कई पुस्तकों के लेखक हैं।)

SP_Singh AURGURU Editor