अंबेडकर विवि में चमकी जरदोज़ी की रोशनी, फोर्थ क्लास कर्मचारी शमीम बानो बनीं सबके लिए प्रेरणा

आगरा। डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा के गृह विज्ञान संस्थान के महिला अध्ययन केंद्र में आयोजित सात दिवसीय जरदोज़ी कढ़ाई कार्यशाला का दूसरा दिन उत्साह, सृजनशीलता और प्रेरणा से भरा रहा। यह कार्यशाला विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर आशु रानी की प्रेरणा से संचालित हो रही है। जिन्होंने प्रतिभा को पहचानने और उसे अवसर में बदलने की मिसाल कायम की है।

Nov 12, 2025 - 22:32
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अंबेडकर विवि  में चमकी जरदोज़ी की रोशनी, फोर्थ क्लास कर्मचारी शमीम बानो बनीं सबके लिए प्रेरणा
गृह विज्ञान संस्थान के महिला अध्ययन केंद्र में आयोजित सात दिवसीय जरदोज़ी कढ़ाई कार्यशाला में प्रशिक्षण लेतीं छात्राएं ।

आगरा। डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा के गृह विज्ञान संस्थान के महिला अध्ययन केंद्र में आयोजित सात दिवसीय जरदोज़ी कढ़ाई कार्यशाला का दूसरा दिन उत्साह, सृजनशीलता और प्रेरणा से भरा रहा। यह कार्यशाला विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर आशु रानी की प्रेरणा से संचालित हो रही है। जिन्होंने प्रतिभा को पहचानने और उसे अवसर में बदलने की मिसाल कायम की है।

इस आयोजन की सबसे खास बात यह है कि इसकी प्रेरणा विश्वविद्यालय की एक साधारण कर्मचारी शमीम बानो से मिली। जो वर्ष 2011 से कुलपति सचिवालय में कार्यरत हैं। सीमित आर्थिक संसाधनों के बावजूद शमीम बानो ने जरदोज़ी कढ़ाई की पारंपरिक कला को न सिर्फ सीखा बल्कि उसमें निपुणता हासिल की।

कुलपति प्रो. आशु रानी ने उनके इस अद्भुत हुनर को पहचानते हुए निर्णय लिया कि इस कला को विश्वविद्यालय की छात्राओं और महिलाओं तक पहुँचाया जाए। इसी सोच के तहत यह सात दिवसीय कार्यशाला शुरू की गई, ताकि महिलाएं इस कौशल को सीखकर आत्मनिर्भरता और स्वरोजगार की दिशा में आगे बढ़ सकें।

कार्यशाला के दूसरे दिन शमीम बानो ने प्रतिभागियों को चौपेल और मोती की सहायता से जरदोज़ी के सुंदर डिज़ाइन बनाना सिखाया। उनकी सादगी, धैर्य और समर्पण ने सभी छात्राओं का मन जीत लिया। छात्र-छात्राओं ने इस कला को सीखने में गहरी रुचि दिखाई और कहा कि यह कार्यशाला उनके आत्मविश्वास को नई दिशा दे रही है। प्रतिभागियों ने कहा कि यह कार्यशाला सिर्फ प्रशिक्षण नहीं, बल्कि महिला सशक्तिकरण और आत्मविश्वास का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि यदि किसी को अवसर और विश्वास दिया जाए, तो वह अपनी प्रतिभा से समाज में मिसाल बन सकता है।

कुलपति प्रो. आशु रानी का यह प्रयास विश्वविद्यालय में समानता, संवेदना और सशक्तिकरण की नई मिसाल पेश कर रहा है। उन्होंने कहा कि कला किसी पद या परिस्थिति की मोहताज नहीं होती, बस उसे पहचानने वाली नजर चाहिए। आज यह संदेश पूरे परिसर में गूंज रहा है कि प्रतिभा चाहे जहां भी हो, उसे मंच मिलना चाहिए।