मोदी-बादल की मुलाकात से पंजाब की सियासत में हलचल, क्या विधानसभा चुनाव से पहले फिर बनेगा भाजपा-अकाली गठबंधन?
नई दिल्ली/चंडीगढ़। पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले राज्य की राजनीति एक बार फिर नए मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है। शुक्रवार सुबह संसद भवन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष एवं पंजाब के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल की मुलाकात ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। लंबे समय तक साथ रहने के बाद अलग हो चुके भाजपा और अकाली दल के रिश्तों को लेकर एक बार फिर कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या दोनों दल आगामी विधानसभा चुनाव से पहले पुराने सहयोगी के रूप में फिर साथ आ सकते हैं।
यह मुलाकात ऐसे समय हुई है, जब एक दिन पहले ही आम आदमी पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हुए राज्यसभा सांसद हरभजन सिंह ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भेंट की थी। लगातार हो रही इन राजनीतिक मुलाकातों को पंजाब में बदलते राजनीतिक समीकरणों के संदर्भ में देखा जा रहा है।
भाजपा और शिरोमणि अकाली दल का गठबंधन कभी देश की सबसे मजबूत और लंबे समय तक चलने वाली राजनीतिक साझेदारियों में शामिल रहा है। करीब ढाई दशक तक दोनों दलों ने पंजाब में मिलकर चुनाव लड़े और सरकारें बनाईं। केंद्र की एनडीए सरकारों में भी अकाली दल अहम सहयोगी रहा। इस गठबंधन ने पंजाब की राजनीति में लंबे समय तक निर्णायक भूमिका निभाई।
हालांकि वर्ष 2020 में केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानूनों के विरोध ने दोनों दलों के रिश्तों में दरार पैदा कर दी। किसान आंदोलन के दौरान शिरोमणि अकाली दल ने भाजपा से अपना गठबंधन समाप्त कर दिया और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) से भी अलग हो गया। विरोध दर्ज कराते हुए उस समय केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने भी केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद दोनों दल अलग-अलग राजनीतिक रास्तों पर चल पड़े।
लोकसभा चुनाव में भाजपा और अकाली दल ने अलग-अलग मैदान में उतरकर अपनी राजनीतिक ताकत आजमाई, लेकिन दोनों दलों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इसके बाद से समय-समय पर यह चर्चा उठती रही कि यदि दोनों दल फिर साथ आते हैं तो पंजाब में राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं।
इसी बीच पंजाब की राजनीति में हाल के दिनों में हुए घटनाक्रमों ने इन अटकलों को और बल दिया है। आम आदमी पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं के भाजपा की ओर जाने और उसके बाद प्रधानमंत्री से उनकी मुलाकातों ने यह संकेत दिया है कि भाजपा पंजाब में अपनी राजनीतिक रणनीति को नए सिरे से मजबूत करने में जुटी हुई है। ऐसे माहौल में सुखबीर सिंह बादल का प्रधानमंत्री मोदी से मिलना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान आकर्षित कर रहा है।
हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सुखबीर सिंह बादल के बीच हुई बातचीत का कोई आधिकारिक विवरण सामने नहीं आया है। दोनों नेताओं ने भी मुलाकात के एजेंडे को सार्वजनिक नहीं किया है। यही कारण है कि इस मुलाकात को लेकर तरह-तरह की राजनीतिक व्याख्याएं सामने आ रही हैं। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि बातचीत केवल शिष्टाचार तक सीमित रही या फिर इसमें पंजाब के आगामी चुनाव और संभावित राजनीतिक सहयोग जैसे विषयों पर भी चर्चा हुई।
इस मुलाकात की राजनीतिक प्रतिक्रिया भी तत्काल देखने को मिली। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने सोशल मीडिया पर फिल्मी अंदाज में टिप्पणी करते हुए लिखा— "ना-ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे।" इसे भाजपा और अकाली दल के बीच संभावित नजदीकियों पर किया गया राजनीतिक कटाक्ष माना जा रहा है।
वर्तमान में पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार है और पार्टी दोबारा सत्ता में लौटने की तैयारी कर रही है। दूसरी ओर कांग्रेस भी राज्य में अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने के प्रयास में जुटी है। भाजपा लगातार अपना संगठन मजबूत करने और नए सामाजिक-राजनीतिक समीकरण बनाने में लगी हुई है, जबकि शिरोमणि अकाली दल अपने पारंपरिक जनाधार को दोबारा संगठित करने की कोशिश कर रहा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के बीच फिर से गठबंधन होता है तो पंजाब विधानसभा चुनाव का पूरा परिदृश्य बदल सकता है। इससे चुनावी मुकाबला और अधिक दिलचस्प होने के साथ-साथ विपक्षी वोटों का नया ध्रुवीकरण भी देखने को मिल सकता है। कई सीटों पर सीधा असर पड़ने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
फिलहाल दोनों दलों की ओर से गठबंधन को लेकर कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है। इसलिए इसे अभी केवल राजनीतिक अटकलों के रूप में ही देखा जा रहा है। लेकिन इतना तय है कि संसद भवन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सुखबीर सिंह बादल की यह मुलाकात पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रमों में शामिल हो गई है। आने वाले दिनों में दोनों दलों की राजनीतिक गतिविधियों और बयानों पर पूरे देश की नजर रहेगी, क्योंकि इन्हीं से यह तय होगा कि पंजाब की राजनीति में पुराने सहयोगी एक बार फिर साथ आते हैं या नहीं।