नजर दौड़ाएं पुलिस कमिश्नर, हर थाने के होती है सदर जैसी मनमानी
आगरा। आगरा के पुलिस कमिश्नर जे रविंद्र गौड़ को बीते कल जिन असहज हालातों से गुजरना पड़ा, उसके लिए उनके वे मातहत जिम्मेदार थे, जिन्हें पुलिस महकमे में कांस्टेबल के नाम से जाना जाता है। पुलिस कमिश्नर को हाईकोर्ट में जाकर माफी मांगनी पड़ी। पुलिस कमिश्नर को इस मामले से सबक लेने की जरूरत है क्योंकि यह अकेला ऐसा मामला नहीं है, जिसमें वारंट की तामील कराने में मनमानी की गई हो। ऐसे ढेरों मामले हैं, जिनमें कांस्टेबलों के स्तर से कोर्ट के समन तामील कराने में मनमानी की जाती है।
-आरोपियों से मिलकर कांस्टेबल लगाते रहते हैं गलत रिपोर्ट, इससे लम्बे खिंचते हैं केस
थाना सदर से जुड़े एक मामले में पुलिस कमिश्नर को हाईकोर्ट में पेश होकर माफी मांगनी पड़ी। इसके बाद यह मामला तो रफा-दफा हो गया है। पुलिस कमिश्नर ने कोर्ट से जारी वारंट के मामले में लापरवाही बरतने के आरोप में सदर थाने के इंस्पेक्टर, एक दरोगा सोनू कुमार और दो कांस्टेबल को निलंबित भी कर दिया है।
यह मामला इतना भर था कि चेक बाउंस के एक मामले में आगरा की कोर्ट से बार-बार वारंट भेजे जा रहे थे और सदर थाने की पुलिस उन्हें तामील नहीं करा रही थी। वादी हाईकोर्ट गया तो पुलिस की ओर से आख्या भेजी गई कि उन्हें कोर्ट का कोई वारंट मिला ही नहीं। हाईकोर्ट ने आगरा के जिला जज से रिपोर्ट मांगी तो पुलिस का झूठ सामने आ गया क्योंकि कोर्ट से जारी वारंट हाईकोर्ट में भेजे जा चुके थे। इसके बाद कोर्ट ने पुलिस कमिश्नर को तलब किया और उन्हें माफी मांगनी पड़ गई।
यह मामला तो रफा-दफा हो गया है, लेकिन पुलिस कमिश्नर अगर कोर्ट से जारी होने वाले समन और वारंट की तामीली की असलियत जानेंगे तो दंग रह जाएंगे। ऐसे तमाम लोग हैं जो निचले स्तर के पुलिसकर्मियों द्वारा की जा रही मनमानी की वजह से परेशान हो रहे हैं। कोर्ट से जारी वारंट और समन पर पुलिस यह रिपोर्ट लगा देती है कि आरोपी मिला नहीं या फिर मकान बंद मिला। इसी वजह से कोर्ट में मामले लंबे खिंचते रहते हैं।
दरअसल ऐसी रिपोर्टें आरोपियों से मिलीभगत के बाद कोर्ट में भेजी जाती हैं जबकि वादियों को मालूम होता है कि आरोपी घर पर ही होते हैं, पर वे कुछ कर नहीं पाते। कोर्ट को भी पुलिस द्वारा भेजी गई रिपोर्ट पर भरोसा करना पड़ता है।
सदर थाना क्षेत्र के अंकुर शर्मा के चेक बाउंस के मामले में कोर्ट से जारी हो रहे वारंट के मामले में भी ऐसा ही हो रहा था। आरोपी मनोज को पुलिस वारंट की तामील ही नहीं करा रही थी। तंग आकर अंकुर को हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी थी।
हर कोई अंकुर की तरह हाईकोर्ट तक नहीं पहुंच पाता। पुलिस कमिश्नर को अंकुर जैसे ही तमाम लोगों की तकलीफें महसूस कर कुछ ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जिससे कि निचले स्तर के पुलिसकर्मी कोर्ट से जारी समन और वारंट की तामीली को टाल न सकें। यह अकेले सदर थाने में नहीं हो रहा, हर थाने के पुलिसकर्मी ऐसा करते हैं। इससे उन लोगों को बहुत परेशानी होती है जो न्याय पाने के लिए कोर्ट में गए होते हैं।