राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से पूछे कई सवाल, क्या राष्ट्रपति के कार्य की न्यायिक समीक्षा हो सकती है

नई दिल्ली। देश के 52वें प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति भूषण रामकृष्ण गवई के समक्ष पदभार संभालते ही जो सबसे अहम कार्य आया है ,वह है राष्ट्रपति की ओर से पूछे गये 14 महत्वपूर्ण सवाल। पिछले माह उच्चतम न्यायालय ने राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के विचारार्थ रखे गए विधेयकों पर राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए समयसीमा तय की थी। शीर्ष अदालत के इस फैसले को लेकर कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आई थीं। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने तो न्यायपालिका द्वारा राष्ट्रपति के निर्णय लेने के लिए समयसीमा निर्धारित करने को ‘सुपर संसद’ के रूप में कार्य करने की संज्ञा दे डाली थी। अब खुद राष्ट्रपति ने कई कड़े  सवालों की सूची उच्चतम न्यायालय को भेजी है जिसके जवाब का इंतजार राष्ट्रपति के साथ ही पूरे देश को रहेगा। 

May 15, 2025 - 14:27
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राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से पूछे कई सवाल, क्या राष्ट्रपति के कार्य की न्यायिक समीक्षा हो सकती है


सुप्रीम कोर्ट द्वारा राज्य विधानसभाओं से भेजे गए विधेयकों पर राष्ट्रपति और राज्यपालों को कार्रवाई करने के लिए समयसीमा तय करने के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अनुच्छेद 143(1) के तहत सर्वोच्च न्यायालय से यह राय मांगी है कि क्या राष्ट्रपति के कार्य न्यायिक समीक्षा के अधीन हैं और क्या संविधान में इस प्रकार की कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं होने के बावजूद उन पर समयसीमा थोपना संभव है।

इस वर्ष अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपालों के लिए विधेयकों पर कार्रवाई करने की एक समयसीमा तय की थी और पहली बार यह निर्देश दिया था कि राष्ट्रपति को राज्यपाल द्वारा विचारार्थ सुरक्षित रखे गए विधेयकों पर निर्णय तीन महीने के भीतर लेना होगा।  हालांकि संविधान के अनुच्छेद 201 के तहत राष्ट्रपति के निर्णय के लिए कोई समयसीमा निर्धारित नहीं है।

शीर्ष अदालत ने कहा था कि “यदि इस अवधि से अधिक विलंब हो, तो उचित कारण दर्ज किए जाने चाहिए और संबंधित राज्य को सूचित किया जाना चाहिए।” अपने फैसले में देश की शीर्ष अदालत ने तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि द्वारा नवंबर 2023 में 10 विधेयकों को राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखने की कार्रवाई को अवैध और त्रुटिपूर्ण करार दिया था जबकि वे विधेयक पहले ही राज्य विधानसभा द्वारा पुनर्विचारित किए जा चुके थे। 

अब जो जानकारी सामने आई है उसमें राष्ट्रपति ने जानना चाहा है कि “क्या भारत के संविधान के अनुच्छेद 201 के तहत राष्ट्रपति द्वारा विवेकाधिकार का प्रयोग न्यायिक समीक्षा के अधीन है? राष्ट्रपति ने जानना चाहा है कि जब संविधान में इस विवेकाधिकार के प्रयोग की समयसीमा या तरीका निर्धारित नहीं है, तो क्या न्यायालयिक आदेशों के माध्यम से ऐसे विवेकाधिकार के प्रयोग के लिए समयसीमा और तरीका निर्धारित किया जा सकता है?” 

राष्ट्रपति ने सवाल किया है कि  “क्या भारत के संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल द्वारा विवेकाधिकार का प्रयोग न्यायिक समीक्षा के अधीन है? सवाल किया गया है कि क्या अनुच्छेद 361 न्यायिक समीक्षा पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता है जब यह राज्यपाल के अनुच्छेद 200 के तहत किए गए कार्यों से संबंधित हो? राष्ट्रपति मुर्मू ने पूछा है कि जब संविधान में कोई समयसीमा या प्रक्रिया निर्धारित नहीं है, तो क्या न्यायालय द्वारा समयसीमा और प्रक्रिया निर्धारित की जा सकती है ताकि राज्यपाल अनुच्छेद 200 के तहत अपने सभी अधिकारों का प्रयोग कर सकें?”

संदर्भ में यह भी जानना चाहा गया है कि “क्या राष्ट्रपति को, राज्यपाल द्वारा किसी विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति हेतु सुरक्षित रखने या अन्यथा स्थिति में भारत के संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत सर्वोच्च न्यायालय से राय लेनी आवश्यक है?” साथ ही यह सवाल भी किया गया है कि “क्या अनुच्छेद 200 और अनुच्छेद 201 के तहत राज्यपाल और राष्ट्रपति के निर्णय कानून के प्रभावी होने से पहले के चरण में न्यायिक समीक्षा के अधीन हैं? सवाल किया गया है कि क्या न्यायालयों को किसी विधेयक की सामग्री पर, किसी भी रूप में, तब तक निर्णय देने की अनुमति है जब तक वह विधेयक कानून न बन जाए?” सवाल किया गया है कि “क्या भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत राष्ट्रपति/राज्यपाल द्वारा किए गए संवैधानिक कार्यों और आदेशों को किसी भी रूप में प्रतिस्थापित किया जा सकता है?”

कुछ अन्य प्रश्न जो सर्वोच्च न्यायालय को संदर्भित किए गए हैं, उनमें शामिल हैं: “जब कोई विधेयक अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, तो राज्यपाल के पास कौन-कौन से संवैधानिक विकल्प उपलब्ध हैं? सवाल किया गया है कि क्या राज्यपाल, अनुच्छेद 200 के तहत विधेयक प्रस्तुत किए जाने पर, उपलब्ध सभी विकल्पों का प्रयोग करते समय मंत्रिपरिषद की सलाह और सहायता से बंधे होते हैं?”

राष्ट्रपति मुर्मू ने यह भी रेखांकित किया है कि अनुच्छेद 200, जो राज्यपाल की शक्तियों और विधेयकों को स्वीकृति देने, स्वीकृति रोके रखने या राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखने की प्रक्रिया को निर्धारित करता है, “राज्यपाल द्वारा संवैधानिक विकल्पों के प्रयोग के लिए कोई समयसीमा निर्धारित नहीं करता।” अनुच्छेद 201 राष्ट्रपति की शक्तियों और विधेयकों को स्वीकृति देने या अस्वीकृति के लिए प्रक्रिया निर्धारित करता है, परन्तु “राष्ट्रपति द्वारा इन संवैधानिक विकल्पों के प्रयोग के लिए कोई समयसीमा या प्रक्रिया निर्धारित नहीं करता।'' इसमें पूछा गया है कि राष्ट्रपति या राज्यपाल की सहमति के बिना कोई विधेयक कानून बन सकता है।