तकनीक और आधुनिकता की दौड़ में कुछ पाया… तो बहुत कुछ छूट भी गया

विकास और आधुनिकता की दौड़ में समाज ने अपनी कई परंपराएँ और सांस्कृतिक धरोहरें पीछे छोड़ दी हैं। सुलेख प्रतियोगिता से की-बोर्ड तक, सामूहिक त्योहारों से कैटरिंग वाले आयोजन तक, विवाह की पीली चिट्ठी से व्हाट्सऐप संदेश तक और महिला संगीत से म्यूजिकल नाइट तक—हर बदलाव ने सुविधा दी, लेकिन आत्मीयता और रिश्तों की गर्माहट छीन ली। आज ऑनलाइन शॉपिंग हो या आने वाले समय का आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, हर नई दिशा हमें कुछ नया देती है पर बहुत कुछ पीछे भी छोड़ जाती है। सवाल यही है कि क्या आधुनिकता की चमक के बीच हम अपनी संस्कृति और परंपराओं को बचा पाएंगे?

Sep 10, 2025 - 13:44
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तकनीक और आधुनिकता की दौड़ में कुछ पाया… तो बहुत कुछ छूट भी गया

कहावत है कि आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है। यह सत्य है, लेकिन जब विकास की दौड़ में इंसान नई-नई राहें खोजता है, तो पीछे बहुत कुछ छोड़ भी देता है। आने वाली पीढ़ियां सिर्फ तकनीक और आधुनिकता का सुख नहीं पातीं, बल्कि इतिहास के पन्नों से झरता आनंद, रिश्तों की गर्माहट और परंपराओं की मिठास उनसे छिन जाती है। कल भी बहुत कुछ छूटा था, आज भी छूट रहा है और निश्चय ही कल भी छूटेगा।

शिक्षा की दुनिया: किताबों से की-बोर्ड तक

कभी चुंगी स्कूलों की चौखट पर बैठकर सुलेख प्रतियोगिताएं होती थीं। बच्चे अक्षरों को सुंदर बनाने में अपना हुनर दिखाते थे। अब अंग्रेजी माध्यम और कंप्यूटर की-बोर्ड ने बच्चों के हाथों से कागज़ और पेंसिल छीन लिए हैं। सुलेख प्रतियोगिता की जगह की-बोर्ड पर तेज़ उंगलियां चलाने का कौशल आ गया है।
मास्टर साहब की संटी, जो अनुशासन और सीखने का प्रतीक थी, अब मानव अधिकारों की डंडे के नीचे दब गई है। शिक्षा का चेहरा बदला है, लेकिन इसमें से बहुत कुछ पीछे छूट गया।

त्योहारों का सामूहिक आनंद गायब हो गया

हमारे तीज-त्योहार कभी समाज को जोड़ने वाले सेतु थे। होली मिलन, गोवर्धन पूजा, दाल-बाटी भोज और भंडारे न केवल धार्मिक आस्था के प्रतीक थे, बल्कि वे आपसी प्रेम और भाईचारे का माध्यम भी थे। बड़े-बूढ़ों और बच्चों का एक साथ बैठना, पकवानों की खुशबू, गीत-संगीत का शोर, यह सब घर-घर का उत्सव हुआ करता था।
आज वही उत्सव कम्युनिटी हॊल की जगह मैरिज होम और कैटरिंग की परंपरा में सिमट गए हैं। समुदाय और परिवार के बीच का मेलजोल व्यावसायिक चमक-दमक में दब गया है। सामूहिक आनंद की जगह निजी आयोजन हावी हो गए हैं। यहां भी कुछ पाया तो कुछ छूट गया।

विवाह का स्वरूप उत्सव से औपचारिकता तक आ गया

मांगलिक उत्सवों में हम सभी नये रिश्तों को जन्म देते हैं। पहले यह काम नाई और पंडित करते थे। विवाह कभी सामाजिक उत्सव होता था। पीली चिट्ठी बुलावे का प्रतीक थी, जिसमें अपनापन और रिश्तों की गर्माहट छलकती थी। अब उसकी जगह सेव द डेट संदेश और व्हाटसएप निमंत्रण ने ले ली है।
कभी विवाह के दौरान रिश्तेदारों (बुआ-बहन, मामा आदि) को बस स्टेशन या रेलवे स्टेशन से लाने के लिए परिवार के सदस्यों की ड्यूटी लगती थी। रिश्तेदारों को ससम्मान घर तक लाने और ठहराने में पूरा परिवार एकजुट रहता था। अब ये सारे काम मैरिज ब्यूरो और इवेंट मैनेजर संभालते हैं। रिश्तेदार कब आए और कब चले गये, पता ही नहीं चल पाता। उनसे बतियाना तो सोच में भी नहीं आ पाता। रिश्तों की इस औपचारिकता में कुछ तो पीछे छूट ही गया है।
पत्र लिखने की बेकरारी, दूल्हा-दुल्हन के बीच चिट्ठियों का आदान-प्रदान, भाई-बहनों की चुहल—सब पीछे छूट गया। इनकी जगह वीडियो कॊल और व्हाटसएप चैटिंग ने ले ली है।
पहले की शादियों में मिलनी और पंगत का आनंद, जहां सब साथ बैठकर भोजन करते थे, अब बफे और 56 भोग की चकाचौंध में गुम हो चुका है। विवाह अब रिश्तों का सेतु न होकर महज एक कार्यक्रम भर रह गया है। उस समय चार रुपये की मिलनी के आनंद को आज की सोने की चेन ने छीन लिया है।

महिलाओं की परंपराएं और आधुनिकता

मांगलिक अवसरों पर महिलाएं कभी घर-आंगन में ढोलक बजाकर गीत गाती थीं, रतजगा करती थीं, और विवाह को आनंदमयी बना देती थीं। अब वही म्यूजिकल नाइट और स्टेज परफॉर्मेंस में बदल गया है। ढोलक और हारमोनियम की जगह डीजे और इवेंट लाइटिंग ने ले ली। परंपरा की सहजता और आत्मीयता यहां भी कहीं पीछे छूट गई।
महिला संगीत, जो परिवार की आत्मा हुआ करता था, अब मंचीय कार्यक्रम बन गया है। आज महिलाएं स्टेज पर इवेंट के इशारों पर नृत्य करती हैं। यह बदलाव सुखद नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह कभी भी सनातन की परम्परा नहीं रही।

लड़के की शादी में बरात जाने के बाद घर पर रहकर महिलाओं का खोइया खेलना तो अब यादों में रह गया है। पहले शादियों में बच्चों से लेकर बूढ़ों तक की जिम्मेदारियां तय होती थीं, लेकिन अब यह सब यादों में ही है, वह भी पुरानी पीढ़ी के लोगों में।

रोज़मर्रा का जीवन और रिश्तों की दूरी

कभी घर का सामान खरीदना भी एक उत्सव था। बाज़ार जाना, दुकानदारों से बतियाना, और परिजनों संग मिलकर सामान चुनना मानसिक आनंद का साधन था। अब ऒनलाइन शॊपिंग ने यह सुख भी छीन लिया। सुविधा तो मिली, पर रिश्तों की गर्माहट और सामूहिकता खो गई।

समय की दौड़ और भविष्य

आज जब हम पीछे देखते हैं तो एहसास होता है कि बहुत कुछ हमसे दूर चला गया है। कल की पीढ़ी भी यही कहेगी कि उनकी परंपराएं, उनका आनंद, उनकी यादें उनसे छिन गईं। आने वाले समय में शायद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस उनके सामने नई चुनौतियां और नई प्रतिस्पर्धाएं लेकर आएगा। लेकिन इस रफ्तार में जो भी पीछे छूटेगा, उसकी कमी हमेशा सालती रहेगी।

सवाल यह है कि इस दौड़ को कौन थामेगा? सब कहते हैं- घंटी बंधनी चाहिए, लेकिन कोई आगे नहीं बढ़ता। विकास जरूरी है, आधुनिकता भी जरूरी है, लेकिन परंपरा और धरोहर का सम्मान उससे कहीं ज्यादा जरूरी है।
समाज को यह सोचना होगा कि क्या आधुनिक चमक-दमक की कीमत पर हम अपनी आत्मा, अपनी संस्कृति और अपने रिश्तों की मिठास खो देंगे?

-राजीव गुप्ता- जनस्नेही कलम से
लोक स्वर, आगरा

SP_Singh AURGURU Editor