सोशल मीडिया: रिश्तों का मंच या फिर दिखावे का मेला?
आज यानि 30 जून को सोशल मीडिया दिवस है। सोशल मीडिया जहां एक ओर वैश्विक जुड़ाव, प्रसिद्धि और आय के अवसर प्रदान करता है, वहीं दूसरी ओर यह निजी जीवन को सार्वजनिक मंच बना देने, आत्मप्रदर्शन और दिखावे की प्रवृत्ति को बढ़ावा देने वाला माध्यम भी बन गया है। यह मंच अब भावनाओं से अधिक सेल्फी, ट्रेंड, एंगेजमेंट और इन्फ्लुएंसर आधारित हो गया है। सोशल मीडिया का विवेकपूर्ण और संतुलित उपयोग ही इसे वरदान बनाए रख सकता है।
आज सोशल मीडिया सिर्फ संवाद का साधन नहीं रहा, यह इमोशन, इन्फ्लुएंस, ब्रांडिंग, कंटेंट और वायरलिटी का सबसे बड़ा मंच बन चुका है। यह एक ऐसा खट्टा-मीठा अचार है जो आदमी को विश्वभर से जोड़ता तो है, पर कई बार सच्चाई और झूठ के बीच की रेखा को धुंधला भी कर देता है।
जहां पहले विचार और संवेदनाएं मन की बात होती थीं, अब वे स्टेटस अपडेट बन गई हैं। हर खुशी, हर ग़म, हर निजी क्षण, चाहे वो चाय की प्याली हो या जीवन का सबसे बड़ा फैसला, अब पब्लिक डोमेन में डालने में लोग गौरव महसूस करते हैं। लोगों को व्यक्तिगत अहसास और ऋण को भी सार्वजनिक करने में बहुत आनंद प्रतीत होता है। यहां तक कि लोग अब अपनी चादर की सिलवटें भी पूरी दुनिया को दिखाने में शर्म महसूस नहीं करते।
सोशल मीडिया ने हजारों अभिलाषी महिलाओं और धर्माचार्यों को एक नई पहचान दी है। यह न केवल प्रसिद्धि का माध्यम बना है बल्कि आर्थिक सशक्तिकरण का भी जरिया साबित हुआ है। यूट्यूब चैनल, इंस्टाग्राम रील्स, फेसबुक लाइव्स और ट्विटर थ्रेड्स ने लोगों को अपनी स्वयं की महिमा मंडित ब्रांडिंग का अवसर दिया है।
परंतु इस चमकते मंच के पीछे एक गहरा अंधेरा भी है। विचारों का मतभेद अब मनभेद बन जाता है। अफवाहें, फेक न्यूज और ट्रोल संस्कृति समाज को बांटने में भूमिका निभा रही है। डिजिटल दुनिया में यह तय करना मुश्किल हो गया है कि कौन सी बात ‘सच’ है और कौन ‘चालाकी से परोसी गई झूठ’।
फिर भी, सोशल मीडिया आज की दुनिया का आईना है जिसमें हर चेहरा, हर भावना, हर छल और हर छलकता उत्साह दिखता है। बस ज़रूरत है इसे संतुलन और संवेदना के साथ इस्तेमाल करने की।
-राजीव गुप्ता, 'जनस्नेही कलम'