गन्ने के खेत बने बाघ-तेंदुओं का ठिकाना, नेपाल से हाथियों की दस्तक; पीलीभीत में बढ़ा मानव-वन्यजीव संघर्ष का खतरा
-आरके सिंह- बरेली। पीलीभीत टाइगर रिजर्व (पीटीआर) से सटे इलाकों में बाघ और तेंदुओं की बढ़ती गतिविधियों तथा नेपाल से आने वाले हाथियों के झुंडों से मानव-वन्यजीव संघर्ष की चुनौती गंभीर होती जा रही है। घने गन्ने के खेत जंगल से बाहर निकलने वाले बाघों और तेंदुओं को छिपने के लिए अनुकूल ठिकाना उपलब्ध करा रहे हैं, वहीं हाथियों के झुंड किसानों की गन्ने समेत अन्य फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। वन्यजीवों की बढ़ती आवाजाही को देखते हुए ग्रामीणों की सुरक्षा, फसल क्षति का त्वरित मुआवजा और निगरानी तंत्र मजबूत करना जरूरी माना जा रहा है।
पीटीआर के प्रभागीय वनाधिकारी मनीष सिंह के अनुसार संरक्षित क्षेत्र में बाघों की संख्या बढ़ने के साथ वन्यजीवों की गतिविधियों पर लगातार निगरानी जरूरी हो गई है। वन विभाग का प्रयास है कि ग्रामीणों और वन्यजीवों के बीच टकराव की स्थिति पैदा होने से पहले सूचना मिल सके और जरूरत पड़ने पर त्वरित कार्रवाई की जा सके।
नेपाल से आने वाले हाथियों ने बढ़ाई किसानों की परेशानी
बरेली के मुख्य वन संरक्षक पीपी सिंह ने बताया कि नेपाल की ओर से आने वाले हाथियों के झुंड भी पीटीआर से सटे गांवों में किसानों के लिए परेशानी का कारण बन रहे हैं। जनवरी 2026 में नेपाल के गौरीफंटा क्षेत्र से आए हाथियों के झुंड ने पीटीआर से सटे कई गांवों में सैकड़ों बीघा गन्ने की फसल को नुकसान पहुंचाया था। इसके बाद किसानों ने आर्थिक नुकसान की शिकायत करते हुए मुआवजे की मांग की थी।
वन अधिकारियों के अनुसार जंगल और कृषि क्षेत्र के बीच बढ़ता संपर्क मानव-वन्यजीव संघर्ष की प्रमुख वजहों में शामिल है। पीलीभीत-दुधवा-कतर्नियाघाट परिदृश्य में जंगलों, खेतों और मानव बस्तियों के बीच वन्यजीवों की लगातार आवाजाही से ग्रामीणों और बड़े मांसाहारी वन्यजीवों के बीच टकराव की आशंका बढ़ रही है।
गन्ने के खेतों में छिप रहे बाघ और तेंदुए
पीलीभीत के ग्रामीण इलाकों में शाम ढलने के बाद गन्ने की घनी फसल के बीच वन्यजीवों की मौजूदगी का खतरा बढ़ जाता है। जंगल से सटे खेतों में काम करने वाले किसान और मजदूर बाघ और तेंदुओं की मौजूदगी को लेकर विशेष रूप से सतर्क रहते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार गन्ने के खेत घने वनस्पति क्षेत्र जैसा वातावरण उपलब्ध कराते हैं। इनमें बड़े मांसाहारी वन्यजीवों को छिपने और शिकार करने में आसानी होती है। यही वजह है कि जंगल से निकलने वाले बाघ और तेंदुए कई बार गन्ने के खेतों में लंबे समय तक छिपे रह सकते हैं।
पीटीआर में बाघों की संख्या बढ़ने के साथ उनका जंगल से बाहर निकलकर खेतों और मानव आबादी के नजदीक पहुंचना वन विभाग के लिए नई चुनौती बन रहा है।
ग्रामीणों की भागीदारी पर जोर
मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए वन विभाग ने स्थानीय ग्रामीणों की भागीदारी वाले ‘बाघ मित्र’ मॉडल को मजबूत किया है। इसके तहत ग्रामीण बाघ और अन्य वन्यजीवों की गतिविधियों की सूचना वन विभाग को तत्काल देते हैं। इससे वन विभाग को संभावित खतरे वाले क्षेत्रों में समय रहते निगरानी और आवश्यक कार्रवाई करने में मदद मिलती है।
विशेषज्ञों और वन विभाग के स्तर पर माना जा रहा है कि आने वाले वर्षों में वन्यजीव संरक्षण के साथ ग्रामीणों की सुरक्षा पर समान रूप से ध्यान देना होगा। इसके लिए फसल क्षति का त्वरित मुआवजा, वन्यजीवों की प्रभावी निगरानी और त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र को मजबूत करना जरूरी है।
स्थानीय समुदायों को साथ लेकर चलने की रणनीति को भी मानव-वन्यजीव संघर्ष कम करने का महत्वपूर्ण उपाय माना जा रहा है। पीटीआर के आसपास बढ़ती वन्यजीव गतिविधियों को देखते हुए जंगल और ग्रामीण आबादी के बीच सुरक्षित सह-अस्तित्व की व्यवस्था बनाना आने वाले समय की बड़ी चुनौती होगी।