चालान माफी पर सुप्रीम सख्तीः 10 लाख ट्रैफिक अपराधियों को राहत पर उठा संवैधानिक सवाल, यूपी सरकार का अध्यादेश भी सर्वोच्च न्यायालय को संतुष्ट नहीं कर पाया

आगरा/नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश में लाखों ट्रैफिक चालानों को बिना जुर्माना और बिना सुनवाई समाप्त करने के मामले ने अब गंभीर संवैधानिक और सड़क सुरक्षा बहस का रूप ले लिया है। वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सड़क सुरक्षा एक्टिविस्ट केसी जैन की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा लाए गए नए अध्यादेश पर भी असंतोष जाहिर किया है। अदालत ने साफ कहा कि मामला केवल प्रशासनिक सुविधा का नहीं बल्कि कानून, समानता और सड़क सुरक्षा से जुड़ा अत्यंत गंभीर विषय है, जिस पर गहन विचार-विमर्श आवश्यक है।

May 15, 2026 - 21:38
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चालान माफी पर सुप्रीम सख्तीः 10 लाख ट्रैफिक अपराधियों को राहत पर उठा संवैधानिक सवाल, यूपी सरकार का अध्यादेश भी सर्वोच्च न्यायालय को संतुष्ट नहीं कर पाया

सुप्रीम कोर्ट में यह सुनवाई 13 मई 2026 को न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ द्वारा की गई। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि वह अगली सुनवाई में यह स्पष्ट करे कि अध्यादेश लागू होने के बाद कितने ट्रैफिक मामले दोबारा जीवित होंगे और उनके निस्तारण की क्या व्यवस्था होगी। मामले की अगली विस्तृत सुनवाई अब 3 सितम्बर 2026 को होगी।

2023 के कानून से लाखों चालान हुए खत्म

उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 2023 में एक कानून बनाकर 1 जनवरी 2017 से 31 दिसम्बर 2021 के बीच मोटर वाहन अधिनियम के अंतर्गत लंबित लाखों यातायात मामलों को स्वतः समाप्त कर दिया था। सरकार का तर्क था कि पुराने मामलों का बोझ कम करना जरूरी है, लेकिन सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों और कानूनी जानकारों ने इसे कानून के पालन की भावना के खिलाफ बताया था।

याचिकाकर्ता अधिवक्ता के.सी. जैन ने 14 मई 2024 को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर इस कानून को चुनौती दी। उनका कहना था कि ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने वालों को बिना किसी दंड के राहत देना सड़क सुरक्षा के लिए खतरनाक संदेश है।

अध्यादेश लाकर भी नहीं बच सकी सरकार

याचिका पर बढ़ते दबाव के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने 8 अप्रैल 2026 को नया अध्यादेश पेश किया। इसमें तीन श्रेणियों के मामलों को चालान माफी से बाहर रखा गया। ये हैं- गैर-शमनीय अपराध, अनिवार्य कारावास वाले अपराध और पुनरावृत्ति वाले ट्रैफिक अपराध।

सरकार को उम्मीद थी कि इस संशोधन के बाद विवाद समाप्त हो जाएगा, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अध्यादेश को पर्याप्त नहीं माना। अदालत ने कहा कि यह जानना जरूरी है कि आखिर कितने मामले अब भी समाप्त माने जाएंगे और कितने मामलों में कार्रवाई होगी।

10 लाख से ज्यादा आरोपी बिना जुर्माने बरी

सुनवाई के दौरान अधिवक्ता केसी जैन ने परिवहन आयुक्त, उत्तर प्रदेश के आधिकारिक आंकड़े अदालत के समक्ष रखे। इनके अनुसार वर्ष 2017 से 2021 के बीच कुल 30,52,090 ई-चालान हुए थे। इनमें से 10,84,732 मामले न्यायालयों में लंबित थे, जिन्हें बिना सुनवाई और बिना जुर्माना वसूले समाप्त कर दिया गया। यह कुल मामलों का लगभग 42.37 प्रतिशत हिस्सा था।

यही आंकड़ा अब पूरे विवाद का केंद्र बन गया है। सवाल यह उठ रहा है कि यदि लाखों लोगों को बिना दंड राहत मिल सकती है तो फिर ट्रैफिक नियमों की वैधानिक शक्ति कितनी प्रभावी रह जाएगी।

केंद्रीय कानून से टकराव का आरोप

अधिवक्ता के.सी. जैन ने अदालत में दलील दी कि संसद द्वारा बनाए गए मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 200 के अनुसार किसी ट्रैफिक मामले का निस्तारण केवल निर्धारित जुर्माना जमा करने के बाद ही हो सकता है।

उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश का कानून बिना भुगतान के ही मामले समाप्त कर देता है, जो सीधे तौर पर केंद्रीय कानून से टकराव की स्थिति पैदा करता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 254 के तहत समवर्ती सूची के विषय पर राज्य सरकार केंद्रीय कानून के विपरीत कानून नहीं बना सकती, जब तक राष्ट्रपति की अनुमति न हो।

याचिका में यह भी कहा गया कि उत्तर प्रदेश अधिनियम 4 वर्ष 2023 को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त नहीं हुई, जबकि अनुच्छेद 254(2) के तहत यह अनिवार्य थी।

कानून मानने वालों के साथ अन्याय?

याचिका में समानता के अधिकार का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। अधिवक्ता जैन ने अदालत से कहा कि जिन नागरिकों ने समय पर चालान जमा कर कानून का पालन किया और जिन्होंने चालान नहीं भरा, दोनों के साथ अलग व्यवहार हुआ।

उनका कहना था कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन प्रतीत होता है। यदि नियम तोड़ने के बाद भी बिना दंड राहत मिल जाए तो कानून का पालन करने वाले नागरिक स्वयं को ठगा हुआ महसूस करेंगे।

सड़क मौतों में यूपी लगातार नंबर-1

मामले की गंभीरता इस तथ्य से भी बढ़ जाती है कि उत्तर प्रदेश पिछले लगातार पांच वर्षों से सड़क दुर्घटना मौतों में देश में पहले स्थान पर बना हुआ है।

वर्ष 2020 में प्रदेश में 19,149 सड़क मौतें हुईं।
2021 में यह संख्या बढ़कर 21,227 हो गई।
2022 में 22,595 लोगों की जान गई।
2023 में 23,652 मौतें दर्ज हुईं।
जबकि 2024 में यह आँकड़ा बढ़कर 24,118 तक पहुंच गया।

ओवर-स्पीडिंग से होने वाली मौतों के मामले में भी स्थिति भयावह है। वर्ष 2024 में अकेले 12,010 लोगों की जान तेज रफ्तार के कारण चली गई।

इन आंकड़ों को आधार बनाते हुए अधिवक्ता जैन ने अदालत में कहा कि ऐसे समय में ट्रैफिक मामलों में नरमी सड़क सुरक्षा व्यवस्था को कमजोर कर सकती है।

सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने साफ संकेत दिए कि मामला केवल प्रशासनिक सुविधा का नहीं बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा और संवैधानिक व्यवस्था से जुड़ा प्रश्न है।

अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पैरवी कर रहीं अधिवक्ता रुचिरा गोयल को निर्देश दिया कि अगली सुनवाई में यह स्पष्ट किया जाए कि अध्यादेश लागू होने के बाद कितने ट्रैफिक मामले पुनर्जीवित होंगे और उनके निपटारे की क्या व्यवस्था होगी।

हर सड़क मौत किसी परिवार का स्थायी दर्द

वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सड़क सुरक्षा एक्टिविस्ट के.सी. जैन ने कहा कि सड़क पर होने वाली हर मृत्यु केवल आंकड़ा नहीं बल्कि किसी परिवार की स्थायी त्रासदी होती है।

उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार सड़क सुरक्षा के प्रति गंभीर है, इसमें संदेह नहीं, लेकिन कानून तभी प्रभावी होता है जब नियम तोड़ने वाले को यह भरोसा हो कि दंड निश्चित मिलेगा।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि 57 प्रतिशत लोगों ने जुर्माना जमा किया और शेष 43 प्रतिशत मामलों को बिना भुगतान समाप्त कर दिया गया, तो यह कानून का पालन करने वालों के साथ अन्याय जैसा प्रतीत होता है।

अधिवक्ता जैन के अनुसार वर्ष 1977 से 2021 तक अलग-अलग कानूनों के माध्यम से लाखों ट्रैफिक मामलों को समाप्त किया जाता रहा है, जो ट्रैफिक नियमों के प्रति लगातार नरमी का संकेत देता है।

उन्होंने चेतावनी दी कि सड़क सुरक्षा तभी मजबूत होगी जब नियमों का निष्पक्ष और कठोर प्रवर्तन सुनिश्चित किया जाएगा।

SP_Singh AURGURU Editor