चुनावी चक्रव्यूह में फंसा भारत: वोट बैंक की राजनीति में उलझा लोकतंत्र, धीमा पड़ा राष्ट्र निर्माण और विकास की दौड़ में आगे निकला चीन!

लगातार चुनावी माहौल और वोट बैंक केंद्रित राजनीति ने भारत में दीर्घकालिक विकास की गति को प्रभावित किया है। जहां चीन, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, ताइवान और वियतनाम जैसे देशों ने अनुशासित शासन, स्पष्ट नीतियों, शिक्षा, उद्योग और आधारभूत ढांचे पर निरंतर काम कर तेज प्रगति हासिल की, वहीं भारत में कई महत्वपूर्ण फैसले राजनीतिक जोखिम और चुनावी समीकरणों में उलझ जाते हैं। नीतियों की स्थिरता, प्रशासनिक दृढ़ता और कठिन निर्णय लेने की इच्छाशक्ति की कमी के कारण विकास असंतुलित और धीमा दिखाई देता है। सवाल यही है कि क्या देश स्थायी चुनावी राजनीति से ऊपर उठकर दीर्घकालिक राष्ट्र निर्माण की दिशा में निर्णायक कदम उठा पाएगा।

May 15, 2026 - 11:56
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चुनावी चक्रव्यूह में फंसा भारत: वोट बैंक की राजनीति में उलझा लोकतंत्र, धीमा पड़ा राष्ट्र निर्माण और विकास की दौड़ में आगे निकला चीन!

-बृज खंडेलवाल-

एक चुनाव खत्म। दूसरे की तैयारी शुरू। पोस्टर अभी उतरे नहीं कि नए बैनर छपने लगे। माइक ठंडे नहीं हुए कि अगली रैली की तारीख तय हो गई। सरकारें फाइलों से ज्यादा चुनावी गणित में डूबी हुई हैं। देश स्थायी “इलेक्शन मोड” में जी रहा है। किसी को नाराज नहीं करना। हर जाति चाहिए। हर बिरादरी चाहिए। हर वोट चाहिए।

कल तक जो नेता एक दूसरे को लोकतंत्र का दुश्मन बता रहे थे, आज साथ मंच साझा कर रहे हैं। रातों रात दोस्त दुश्मन बन जाते हैं। दुश्मन गले लग जाते हैं। बयान थूक कर चाट लिए जाते हैं। विचारधारा अब मौसम की तरह बदलती है।

और इस बीच देश? वह ट्रैफिक में फंसा खड़ा है। भारत में सरकारें बदलती रहती हैं। नारे बदलते हैं। योजनाओं के नाम बदलते हैं। लेकिन क्या शासन बदलता है?

यही असली सवाल है। और शायद यहीं भारत की विकास कहानी लड़खड़ा जाती है। दुनिया के सामने आज दो मॉडल खड़े हैं।

एक चीन, जिसने गरीबी से निकलकर दुनिया की फैक्ट्री, इंफ्रास्ट्रक्चर महाशक्ति और टेक्नोलॉजी ताकत बनने तक का सफर तय कर लिया।

दूसरा भारत, जहां हर फैसले के पीछे चुनावी कैलकुलेटर बैठा रहता है। यहां सड़क से ज्यादा सीटों की चिंता होती है। नीति से ज्यादा जाति की।भविष्य से ज्यादा अगले चुनाव की।

भारत में “गवर्नमेंट” बहुत है, “गवर्नेंस” कम। सरकार यानी कुर्सी पर बैठे लोग। गवर्नेंस यानी फैसले लेने, उन्हें लागू करने और व्यवस्था चलाने की क्षमता। और जब फैसले ले लिए जाएं तब अदालतें समीक्षात्मक कार्यवाही करें। बस यहीं भारत बार बार अटक जाता है।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब एशिया और अफ्रीका के देश आजाद हुए, तब लगभग सबकी हालत खराब थी। गरीबी, बीमारी, टूटी अर्थव्यवस्था, कम शिक्षा। दक्षिण कोरिया, ताइवान, सिंगापुर, चीन, मलेशिया, वियतनाम: सब कभी गरीब थे। लेकिन उन्होंने कठिन फैसले लिए। दशकों तक अनुशासन बनाए रखा। शिक्षा, उद्योग, निर्यात और इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर दिया।

भारत ने भी कोशिश की। लेकिन यहां राजनीति अक्सर अर्थव्यवस्था के ऊपर बैठ गई। भारत में हर नीति के पीछे पहला सवाल होता है- वोट मिलेगा या नहीं? अगर अतिक्रमण हटाना हो, तो वोट बैंक नाराज हो सकता है। अगर बिजली चोरी रोकनी हो, तो चुनाव प्रभावित हो सकता है। अगर मुफ्त योजनाएं सीमित करनी हों, तो विपक्ष हमला कर देगा। अगर कृषि, श्रम, जनसंख्या, प्रदूषण या शहरी नियोजन पर कठोर कदम उठाने हों, तो राजनीतिक जोखिम बढ़ जाता है।

नतीजा? फैसले टलते रहते हैं। समस्याएं बढ़ती रहती हैं। देश अवसर खोता रहता है।

चीन ने 1978 के बाद बाजार आधारित सुधार किए। विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया। उद्योगों को बढ़ाया। करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकाला। वहां लोकतंत्र नहीं था, इसलिए शासन में निरंतरता थी। हर नीति रोज टीवी डिबेट और चुनावी रैली में नहीं फंसती थी।

भारत में हाईवे कोर्ट में फंस जाते हैं।फैक्ट्रियां आंदोलनों में अटक जाती हैं।मेट्रो परियोजनाएं वर्षों खिंचती रहती हैं। और नेता अगले चुनाव की रणनीति में लगे रहते हैं।

लोकतंत्र जरूरी है। बहुत जरूरी है। लेकिन क्या चुनावी उन्माद विकास को खा रहा है? यह सवाल अब खुलकर पूछा जाना चाहिए।

दक्षिण कोरिया ने शिक्षा को राष्ट्रीय मिशन बनाया। सिंगापुर ने मेरिट और अनुशासन को सर्वोच्च रखा। ताइवान ने टेक्नोलॉजी पर दांव लगाया। वियतनाम ने युद्ध के बाद भी व्यावहारिक आर्थिक सुधार किए।

और भारत में? यहां विश्वविद्यालय कई बार राजनीति के अखाड़े बन गए। शहर बिना योजना के फैलते गए। मुफ्त योजनाओं की बारिश होती रही। और राष्ट्र निर्माण धीरे धीरे “इलेक्शन मैनेजमेंट” में बदलता गया।

आज भारत में ऐसा लगता है जैसे शासन नहीं, लगातार चुनाव चल रहे हों। पंचायत चुनाव। नगर निगम। विधानसभा। लोकसभा। उपचुनाव।गठबंधन। जातीय समीकरण। नीति की उम्र यहां अक्सर चुनावी मौसम से ज्यादा नहीं होती।

भारत ने 1991 के बाद  प्रगति तो की। लेकिन विकास अ समान और अ व्यवस्थित रहा। शहर अ राजक होते गए। प्रदूषण बढ़ा। ट्रैफिक विकराल हुआ। प्रशासनिक सुस्ती और राजनीतिक हिचकिचाहट विकास की रफ्तार को खाती रही।

भारत का लोकतंत्र जीवंत है। लेकिन शासन  दिशाहीन  है। भारत को यह जरूर समझना होगा कि विकास केवल चुनाव जीतने से नहीं आता। विकास आता है दीर्घकालिक सोच, संस्थागत क्षमता और कठिन फैसलों से।

हर चीज वोट बैंक से नहीं चल सकती। अगर हर नीति का लक्ष्य केवल अगला चुनाव होगा, तो अगली पीढ़ी हार जाएगी।

दुनिया की विकास दौड़ में सफल देशों ने साबित किया है कि राष्ट्र निर्माण नारों से नहीं, सक्षम और निरंतर शासन से होता है।

भारत के पास प्रतिभा है, युवा आबादी है, बाजार है, उद्यमिता है और लोकतंत्र है। जो कमी दिखती है, वह है राजनीतिक साहस। कड़वी दवा से डरने वाला समाज अक्सर लंबी बीमारी झेलता है। भारत को तय करना होगा: क्या हम हमेशा चुनाव लड़ते रहेंगे, या कभी देश भी चलाएंगे?

SP_Singh AURGURU Editor