सड़क हादसों में 1.5 लाख रुपये कैशलेस इलाज सीमा पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाये सवाल, बढ़ सकती है अवधि और राहत की रकम

सड़क दुर्घटना पीड़ितों को मिलने वाले कैशलेस इलाज की मौजूदा सीमा पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं, जिससे आने वाले समय में इलाज की राशि और अवधि दोनों बढ़ने की संभावना बन गई है।

Apr 9, 2026 - 19:31
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सड़क हादसों में 1.5 लाख रुपये कैशलेस इलाज सीमा पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाये सवाल, बढ़ सकती है अवधि और राहत की रकम

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नई दिल्ली/आगरा। सड़क दुर्घटना पीड़ितों को मिलने वाली कैशलेस इलाज सुविधा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अहम सुनवाई करते हुए मौजूदा व्यवस्था पर गहरी चिंता जताई। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.बी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने इस बात पर सवाल उठाया कि जब बीमा कंपनियों की देनदारी असीमित है, तो इलाज की सीमा 1,50,000 रुपये और सात दिन तक ही क्यों तय की गई है।

फिलहाल नियमों के तहत किसी भी सड़क दुर्घटना पीड़ित को अधिकतम 1,50,000 रुपये तक और सात दिन की अवधि तक कैशलेस इलाज की सुविधा मिलती है। लेकिन कोर्ट की टिप्पणी के बाद इस सीमा को बढ़ाए जाने की उम्मीद तेज हो गई है।

कोर्ट ने 6 अप्रैल को प्रस्तुत की गई समिति की रिपोर्ट पर विचार किया। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया कि सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय इस बात की निगरानी करे कि मौजूदा सीमा के भीतर पीड़ितों का समुचित इलाज हो पा रहा है या नहीं।

सुनवाई के दौरान आगरा के वरिष्ठ अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता के.सी. जैन ने पक्ष रखते हुए कहा कि मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 162(1) के तहत बीमा कंपनियों को अलग से व्यापक योजना बनानी चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि जब थर्ड पार्टी बीमा में देनदारी की कोई मौद्रिक सीमा नहीं है, तो इलाज पर 1,50,000 रुपये या सात दिन की सीमा लगाना न्यायसंगत नहीं है।

उन्होंने यह भी कहा कि मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) के अंतिम अवार्ड में बीमा कंपनियां पूरा खर्च वहन करती हैं, ऐसे में पीड़ित को शुरुआती समय में बेहतर और पूर्ण इलाज से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

कोर्ट ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए न्याय मित्र गौरव अग्रवाल को निर्देश दिया कि वह सड़क परिवहन मंत्रालय और समिति के साथ विचार-विमर्श कर अगली सुनवाई में स्पष्ट मत प्रस्तुत करें।

समिति की रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि लगभग 98 प्रतिशत मामलों में इलाज का खर्च 60,000 रुपये के भीतर ही रहता है, लेकिन एक्सप्रेसवे और राष्ट्रीय राजमार्गों पर होने वाले गंभीर हादसों में यह सीमा बेहद कम साबित होती है। ऐसे मामलों के मद्देनज़र समिति ने भी कैशलेस इलाज की सीमा बढ़ाने की आवश्यकता जताई है।

इसी दौरान उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 2019 से 2021 के बीच मोटर व्हीकल नियम उल्लंघन के मामलों को समाप्त करने के लिए बनाए गए कानून का मुद्दा भी अदालत में उठा। राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि इस संबंध में आदेश जल्द जारी किया जाएगा और मंत्रिपरिषद इसकी मंजूरी दे चुकी है।

हालांकि, गैर-शमनीय अपराधों और बार-बार नियम उल्लंघन से जुड़े मामलों को दोबारा खोला जाएगा और उन पर न्यायालय में पुनः सुनवाई होगी।

अधिवक्ता के.सी. जैन ने इस कानून की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा कि राष्ट्रपति की मंजूरी के बिना इस प्रकार का कानून लागू करना उचित नहीं है। उन्होंने यह भी चेताया कि उत्तर प्रदेश लंबे समय से सड़क दुर्घटनाओं में मौत के मामलों में शीर्ष पर रहा है, ऐसे में ट्रैफिक नियमों के प्रति भय समाप्त करना गंभीर परिणाम ला सकता है।

कोर्ट ने इस पूरे मामले की अगली सुनवाई 12 मई 2026 को तय की है। इसी दिन कैशलेस इलाज की सीमा बढ़ाने को लेकर अहम फैसला आने की संभावना जताई जा रही है।

SP_Singh AURGURU Editor