ईद-उल-अज़हा: कुर्बानी रस्म नहीं, रूह की तालीम है

ईद-उल-अज़हा सिर्फ़ रस्म नहीं, बल्कि तक़्वा, सादगी और इंसाफ़ का पैग़ाम है। इसका मक़सद गोश्त ज़िब्ह करना नहीं, बल्कि अपने अंदर के घमंड, लालच और नफरत को कुर्बान करना है। नबी की सुन्नत से हमें सिखने को मिलता है कि कुर्बानी में नीयत और गरीबों की भागीदारी सबसे अहम है। यह पर्व हमें इंसानियत, मोहब्बत और बराबरी के साथ समाज सुधार की ओर प्रेरित करता है।

Jun 7, 2025 - 11:18
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ईद-उल-अज़हा: कुर्बानी रस्म नहीं, रूह की तालीम है

जब भी ईदुल अज़हा आती है, मेरा दिल क़ुरआन की उन आयतों और हदीसों की तरफ़ खिंच जाता है जहां अल्लाह और उसके रसूल ने कुर्बानी का सही मतलब बताया है। आज मैं सिर्फ़ गोश्त बांटने की बात नहीं कर रहा हूं, मैं उस तक़्वा की बात कर रहा हूं जो अल्लाह को प्यारी है।

क़ुरआन पाक फरमाता है, न अल्लाह को उनका गोश्त पहुंचता है, न उनका ख़ून, बल्कि अल्लाह तक तुम्हारा तक़्वा पहुंचता है। (सूरह हज्ज: 37)

हमारे नबी की कुर्बानी का तरीक़ा

रसूलुल्लाह हर साल दो दुम्बे (मेंढ़े) कुर्बान करते थे। एक अपनी तरफ़ से और एक अपनी उम्मत की तरफ़ से।

रसूल ने दो सींग वाले सफेद और स्याह धब्बों वाले मेंढ़े ज़िब्ह किए। दोनों को अपने हाथ से ज़िब्ह किया और बिस्मिल्लाह व अल्लाहु अकबर कहा।

(सहीह मुस्लिम: हदीस 1966)

उन्होंने कुर्बानी से पहले जानवर को अच्छे से पानी पिलाया, ज़ुल्म नहीं किया, और ज़िब्ह के वक़्त दुआ पढ़ी, ऐ अल्लाह! यह मेरी और मेरी उम्मत की तरफ़ से है।

(मुस्नद अहमद)

नबियों की कुर्बानियों का सिलसिला

हज़रत आदम अ. के बेटों हाबील और क़ाबील ने पहली कुर्बानी दी। अल्लाह ने हाबील की कुर्बानी क़ुबूल की, क्योंकि उसकी नीयत सही थी।

(सूरह मायदाः 27)

हज़रत इब्राहीम अ. ने अल्लाह के हुक्म पर अपने बेटे इस्माईल अ. को कुर्बान करने का इरादा किया, और ये ईमान की बुलंदी थी।

हमारे नबी मुहम्मद ने फ़क़्र और सादगी के बावजूद हमेशा उम्मत की तरफ़ से कुर्बानी दी।

आज के हालात और ज़रूरी आंकड़े

भारत में हर साल तक़रीबन 2 करोड़ से ज़्यादा कुर्बानियां होती हैं (सरकारी व गैर सरकारी संगठनों के अनुमान)।

इसमें से 30-35% गोश्त ग़रीबों तक नहीं पहुंच पाता, क्योंकि बांटने का सही निज़ाम नहीं है।

तक़रीबन 70% मुसलमान किराए के मकानों में रहते हैं, जहां कुर्बानी करना मुमकिन नहीं होता। यह मौलिक ज़रूरतें हैं जिन्हें सुलझाना क़ौमी फ़र्ज़ है।

आज ज़रूरत है कि हम इस त्योहार को मोहब्बत, इंसाफ़ और बराबरी का पैग़ाम बनाएं।

गुज़ारिश

ईदुल अज़हा का मतलब सिर्फ़ जानवर ज़िब्ह करना नहीं, बल्कि अपने “मैं”, घमंड, लालच और तास्सुब को भी अल्लाह की राह में कुर्बान करना है।

इस ईद पर यही दुआ है कि हम ज़ुल्म और ज़्यादती के ख़िलाफ़ आवाज़ बनें। हम ग़रीब और बेघर लोगों की ज़रूरतों को अपनी कुर्बानी का हिस्सा बनाएं हम नबी के तरीक़े पर चलें, सादगी, तक़्वा और मोहब्बत के साथ।

कुर्बानी जानवर की नहीं, अपने दिल के अंदर की बुराई की हो, ताकि अल्लाह राज़ी हो और समाज संवर जाए।

-शब्बीर अब्बास

वरिष्ठ क़ायद, समाजवादी पार्टी, आगरा

SP_Singh AURGURU Editor