भारत में पहली बार कुत्ते का स्वदेशी हिप ट्रांसप्लांट सफल: आईवीआरआई बरेली की ऐतिहासिक उपलब्धि

बरेली स्थित भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान ने देश में पहली बार पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से विकसित कृत्रिम कूल्हे (हिप) का एक श्वान में सफल प्रत्यारोपण कर पशु चिकित्सा के क्षेत्र में ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। यह सर्जरी संस्थान की ऑर्थो टीम द्वारा की गई, जिससे भारत अब इस तकनीक में आत्मनिर्भर बना है। अब तक ऐसे प्रत्यारोपण के लिए महंगा विदेशी विकल्प ही उपलब्ध था।

Jun 8, 2025 - 17:38
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भारत में पहली बार कुत्ते का स्वदेशी हिप ट्रांसप्लांट सफल: आईवीआरआई बरेली की ऐतिहासिक उपलब्धि
वह श्वान, जिसका आवीआरआई ने स्वदेशी तकनीक से हिप ट्रांसप्लांट किया है।

देश की पहली स्वदेशी तकनीक से हिप ट्रांसप्लांट सर्जरी

-आरके सिंह-

बरेली। यहां स्थित भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) ने पशु चिकित्सा के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी उपलब्धि हासिल की है। संस्थान की ऑर्थो टीम ने देश में पहली बार पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से विकसित किए गए कृत्रिम कूल्हे (हिप) का एक श्वान में सफल प्रत्यारोपण कर नया इतिहास रच दिया।

विदेशी निर्भरता से मुक्ति दिलाएगी नई तकनीक

आईवीआरआई के वैज्ञानिक डॉ. रोहित कुमार और उनकी टीम द्वारा तैयार की गई यह तकनीक न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि व्यावहारिक रूप से भी बेहद किफायती है। अब तक ऐसे कूल्हे विदेशों से आयात करने पड़ते थे, जिनकी कीमत 5 लाख रुपये तक होती थी। लेकिन इस स्वदेशी डिजाइन से यह इलाज अब भारतीय श्वानों के लिए बेहद सस्ता और सुलभ हो सकेगा।

तीन साल की रिसर्च, बरेली से देहरादून तक सफलता की कहानी

डॉ. रोहित कुमार के नेतृत्व में यह तकनीक तीन साल के गहन अनुसंधान के बाद विकसित हुई। इसमें ह्यूमन ऑर्थो सर्जन डॉ. आलोक सिंह की विशेषज्ञता और बरेली मेडिकेयर के योगेश और देवेश सक्सेना की तकनीकी सहायता से गुजरात की लाइफ ऑर्थो केयर कंपनी के साथ मिलकर डॉग-स्पेसिफिक इम्प्लांट और उपकरण विकसित किए गए। तकनीक की पहली सफल सर्जरी देहरादून में, दूसरी बरेली और तीसरी संभल पुलिस के श्वान पर की गई।

कम लागत में बेहतर इलाज, देश के हर कोने में पहुंचेगी सुविधा

आईवीआरआई निदेशक डॉ. त्रिवेणी दत्त ने इस उपलब्धि को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि इस तकनीक को शीघ्र ही आम स्वान पालकों तक पहुंचाया जाएगा और इंडस्ट्री को हस्तांतरित कर इसे देशभर में लागू किया जाएगा। यह उपलब्धि ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में पालतू पशुओं की देखभाल में बड़ी क्रांति साबित होगी।

शोध और समर्पण से बनी मिसाल

यह परियोजना एआईएनपी-डीआईएमएससीए (डिमस्का) के अंतर्गत चलाई गई जिसमें डॉ. रोहित कुमार, डॉ. अमरपाल, डॉ. एसी सक्सेना और डॉ. एएम पावड़े की टीम शामिल थी। शोधार्थियों डॉ. टी साई कुमार और डॉ. कमलेश कुमार ने उपकरणों के तकनीकी डिजाइन तैयार किए। इस समर्पित टीम की मेहनत से भारत अब इस तकनीक में आत्मनिर्भर बन चुका है।

SP_Singh AURGURU Editor