चार साल बाद गहलोत-पायलट की मुलाकात: क्या सुलह के पीछे है सत्ता की रणनीति?
जयपुर। राजस्थान की राजनीति में दो दिन पहले एक नई सरगर्मी उस वक्त पैदा हुई जब सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच चार साल बाद अचानक मुलाकात हुई। कभी एक ही पार्टी में दो ध्रुवों के रूप में देखे जाने वाले इन नेताओं के बीच यह मुलाकात केवल औपचारिक नहीं मानी जा रही, बल्कि इसके गहरे राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं।
साल 2020 की सियासी उठापटक में तब के डिप्टी सीएम सचिन पायलट ने गहलोत सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। हालांकि अशोक गहलोत ने अपने मजबूत राजनीतिक कौशल से सरकार को गिरने नहीं दिया। उसके बाद से दोनों नेताओं के बीच बर्फीला रिश्ता कायम रहा। एक-दूसरे के खिलाफ तीखी टिप्पणियों और तंज़ों की सियासत चलती रही। तल्खी इतनी ज्यादा थी कि दोनों के बीच संवाद भी नहीं हो रहा था।
अब क्यों मिले गहलोत और पायलट?
इस मुलाकात को लेकर सियासी हलकों में चर्चाएं तेज़ हैं। एक ओर इसे गिले-शिकवे दूर करने की पहल बताया जा रहा है, तो दूसरी ओर इसे सचिन पायलट की रणनीतिक चाल भी माना जा रहा है। दरअसल, राजस्थान में हर चुनाव में सरकार बदलने का ट्रेंड रहा है और अगली बार अगर कांग्रेस को सत्ता मिलती है, तो मुख्यमंत्री पद की रेस में सचिन पायलट का दावा सबसे मज़बूत माना जा रहा है।
आखिरी रुकावट दूर करना चाहते हैं पायलट
विश्लेषकों का मानना है कि पायलट अब उस आखिरी रुकावट को भी हटाना चाहते हैं, जो कई वर्षों से उनके राजनीतिक रास्ते में खड़ी है। ये हैं अशोक गहलोत। यही वजह है कि यह मुलाकात, केवल मुलाकात नहीं, बल्कि एक सियासी समझौते की भूमिका भी हो सकती है।
कांग्रेस नेतृत्व का भी है एकजुटता पर जोर
इधर कांग्रेस नेतृत्व भी राजस्थान में लगातार एकजुटता पर ज़ोर दे रहा है, खासकर 2024 लोकसभा चुनाव में प्रदर्शन के बाद। पायलट को लेकर युवा चेहरा और सॉफ्ट हिंदुत्व लाइन को आगे बढ़ाने की रणनीति भी चर्चाओं में है। गहलोत यदि संगठनात्मक भूमिका में जाते हैं, तो पायलट के लिए रास्ता साफ हो सकता है।
गहलोत की पहले जैसी इमेज नहीं रही
वैसे भी अशोक गहलोत पार्टी नेतृत्व की नजरों में खुद को गिरा चुके हैं। राजस्थान के विवाद को सुलझाने के लिए तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मौजूदा अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और अजय माकन को जयपुर भेजा था। दोनों पर्यवेक्षक राजस्थान के कांग्रेस विधायकों के साथ बैठक करना चाहते थे। अशोक गहलोत के इशारे पर एक भी विधायक इन दोनों नेताओं की बैठक में नहीं पहुंचा था। अजय माकन तो उस समय ही अशोक गहलोत पर बहुत लाल-पीले हुए थे।
कांग्रेस अध्यक्ष पद के साथ शर्त नागवार गुजरी थी गांधी परिवार को
इसके बाद एक और घटना हुई, जिससे अशोक गहलोत गांधी परिवार का विश्वास खो बैठे। गांधी परिवार मल्लिकार्जुन खड़गे से पहले अशोक गहलोत को ही पार्टी अध्यक्ष बनाना चाहता था। उस समय मुख्यमंत्री के रूप में गहलोत के पास एक साल का कार्यकाल बचा था। अशोक गहलोत ने अध्यक्ष बनने के लिए तो हामी भर दी थी, लेकिन यह शर्त जोड़ दी थी कि वे मुख्यमंत्री पद नहीं छोड़ेंगे। उनकी यह शर्त गांधी परिवार को स्वीकार नहीं थी। दरअसल अशोक गहलोत जानते थे कि वे कांग्रेस अध्यक्ष बने तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर सचिन पायलट विराजमान हो जाएंगे, जो वे होने नहीं देना चाहते थे।
सुलह असली है या दिखावा, साफ हो जाएगा
माना जा रहा है कि कांग्रेस नेतृत्व ही सचिन पायलट को राजस्थान के अगले नेता के रूप में तैयार कर रहा है। यह भी संभव है कि कांग्रेस नेतृत्व के इशारे पर ही सचिन पायलट मिलने के लिए अशोक गहलोत के पास पहुंचे हों।
कुल मिलाकर दोनों नेताओं की यह मुलाकात राजस्थान की आगामी राजनीतिक तस्वीर को नए रंग दे सकती है। अगर यह सुलह असली है, तो यह कांग्रेस के लिए राहत की बात है और अगर केवल दिखावा है, तो भविष्य की टकराव अलग ही तस्वीर सामने आ सकती है।