रश्मि की पांच साल तक नहीं टूटी आस, मांग का सिंदूर नहीं मिटाया, भरोसे ने पति से फिर मिलाया

कुशीनगर की रश्मि का पति रविन्द्र पांच साल पहले मानसिक बीमारी के कारण लापता हो गया था। समाज के दबाव के बावजूद रश्मि ने पति की वापसी की उम्मीद नहीं छोड़ी। जून 2024 में बरेली में भटकते मिले रविन्द्र को मनोसमर्पण संस्था और मानसिक चिकित्सालय ने उपचार देकर ठीक किया। अब एक साल बाद, रश्मि को उसका पति वापस मिला। यह घटना विश्वास, प्रेम और मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता की मिसाल है।

Jun 8, 2025 - 19:21
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रश्मि की पांच साल तक नहीं टूटी आस, मांग का सिंदूर नहीं मिटाया, भरोसे ने पति से फिर मिलाया
रश्मि, पांच साल से लापता पति रविन्द्र और उनका आठ साल का बेटा, अब एक साथ।

-आरके सिंह-

बरेली। कुशीनगर की रहने वाली रश्मि को दुनिया ने समझाया, टोका, तकलीफ़ दी… पर उसने न तो अपने मांग का सिंदूर मिटाया, न ही पति की वापसी की उम्मीद छोड़ी। आज उसके उसी विश्वास ने पांच साल बाद उसे अपने मानसिक रूप से बीमार पति रविन्द्र से दोबारा मिला दिया।

रविवार को मानसिक चिकित्सालय, बरेली में एक भावुक पल देखने को मिला, जब डॉ. पुष्पा पंत त्रिपाठी और डॉ. आलोक शुक्ला की निगरानी में रश्मि को उसका खोया हुआ पति सौंपा गया। साथ में उनका 8 वर्षीय बेटा भी था, जिसे अब पिता का साथ मिलेगा।

भटकते हुए मिला था शाहजहांपुर रोड पर

15 जून 2024 को शाहजहांपुर रोड, बरेली पर एक 40 वर्षीय व्यक्ति असहाय अवस्था में घूमता मिला था। पुलिस ने मनोसमर्पण सेवा संस्थान के जरिए उसे रेस्क्यू किया और 24 जून 2024 को न्यायालय के आदेश पर मानसिक चिकित्सालय में भर्ती कराया गया। लगभग एक साल की चिकित्सा और काउंसलिंग के बाद जब रविन्द्र ने अपना नाम-पता बताया तो संस्था ने कुशीनगर में उसके परिवार की तलाश की।

सिंदूर की लाज रखी भगवान ने

रश्मि की आंखों में आंसू थे पर जुबान पर सुकून,  उससे लोगों ने कहा था मांग का सिंदूर मिटा दो, पति अब लौटेगा नहीं, पर मैंने अपना श्रृंगार कभी नहीं छोड़ा… अगर ऐसा करती तो अनर्थ हो जाता।
रश्मि ने बताया कि गांव के लोगों के ताने झेलने के बावजूद उसने हर रोज़ अपने पति के नाम का श्रृंगार किया।

मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता की जरूरत

मनोसमर्पण सेवा संस्थान के फाउंडर और साइकोलॉजिस्ट शैलेश शर्मा ने कहा कि मानसिक रोगियों के प्रति समाज की सोच बदलनी चाहिए। समय पर इलाज और सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार से ये मरीज भी सामान्य जीवन में लौट सकते हैं।

यह कहानी सिर्फ पुनर्मिलन की नहीं, एक स्त्री के अटूट विश्वास, अडिग प्रेम और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ उसके संघर्ष की मिसाल है।

SP_Singh AURGURU Editor