सवाल टोल का नहीं, सोच का है: सरकार जिम्मेदारी निभाए, एहसान न जताए  

जब पहले से रोड टैक्स और जीएसटी लिया जा रहा है, तो हर 30–40 किमी पर टोल लेना बोझ है, खासकर उन टोलों पर जो अपनी लागत वसूल चुके हैं। घटिया निर्माण और भ्रष्ट टेंडरिंग से सड़कें जल्दी खराब हो रही हैं, फिर भी टोल जारी है। स्क्रैप पॉलिसी और पेट्रोल-डीजल निर्भरता पर भी सरकार को पुनर्विचार कर न्यायसंगत समाधान निकालना चाहिए।

Jun 20, 2025 - 12:15
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सवाल टोल का नहीं, सोच का है: सरकार जिम्मेदारी निभाए, एहसान न जताए   

-डॊ. राजेश चौहान-

(लेफ्टिनेंट कर्नल, सेवानिवृत्त)

अभी केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का टोल टैक्स पर नया व्याख्यान सुना। लेकिन समझ यह नहीं आया कि जब हर वाहन पर रोड टैक्स, जीएसटी और अन्य करों के नाम पर पहले ही भारी वसूली कर ली जाती है तो फिर हर 30–40 किलोमीटर पर टोल नाकों के जरिए कितना और वसूलना चाहती है सरकार?

कभी कहा गया था कि पीपीपी मॉडल पर बने पुराने टोल नाके अब बंद होंगे क्योंकि प्राइवेट कंपनियों ने अपनी लागत बहुत पहले ही वसूल ली है। तो क्या अब भी वे टोल जारी रहेंगे? क्यों नहीं ऐसे सभी टोल खत्म कर दिए जाते, जिनका वसूली लक्ष्य पूरा हो चुका है? आखिर फायदा किसे हो रहा है- मंत्रालय को, जनता को, या केवल प्राइवेट पार्टी को?

इंदौर के महू की बात करें तो वहां टोल नाके से गुजरने वाली सड़क की हालत बहुत खराब है। पुल भी प्राइवेट पार्टी ने बनाया है और उसके एवज में टोल वसूली जारी है। महू वासियों से भी टोल लिया जा रहा है, जबकि नियमों के अनुसार स्थानीय वाहनों को अपने शहर के भीतर टोल नहीं देना चाहिए। और वह सड़क, जो राज्य राजमार्ग कहलाती है, अब पतली गली जैसी हो चुकी है। जगह-जगह अतिक्रमण और स्पीड ब्रेकरों ने वाहन चालकों की हालत खराब कर रखी है।

जब स्टेट हाईवे अब दूसरी दिशा से निकल चुका है तो फिर महू में टोल वसूलने का औचित्य क्या है? यह टोल नाका हटाकर वास्तविक स्टेट हाईवे पर क्यों नहीं स्थानांतरित किया जाता?

सरकार यदि सिर्फ घोषणा न करे और वाकई काम की गुणवत्ता और समयबद्धता पर ध्यान दे, तो कॉस्ट एस्कलेशन जैसी समस्याएं स्वतः खत्म हो सकती हैं। इससे लाखों करोड़ रुपये की बचत होगी जो आज व्यर्थ बहाए जा रहे हैं।

नई सड़कों की हालत एक-दो साल में ही खराब क्यों हो जाती है? पुल उद्घाटन के तुरंत बाद टूट क्यों जाते हैं? क्या कोई क्वालिटी कंट्रोल एजेंसी है जो इसका लेखा-जोखा रखती है? यदि ईमानदारी से टेंडर प्रक्रिया पारदर्शी हो तो आधी कीमत पर बेहतर काम करने वाली छोटी कंपनियों को भी मौका दिया जा सकता है।

क्या यह मुमकिन नहीं कि यदि गुणवत्तापूर्ण और पारदर्शी निर्माण हो तो टोल टैक्स की दरें बहुत कम हो जाएं और फिर भी सड़कों की हालत कहीं बेहतर हो? यह सब करने के लिए आर्टिफिशल इंटेलिजेंस की नहीं, सिर्फ इच्छाशक्ति और जवाबदेही की जरूरत है।

मंत्रालय को यह समझना होगा कि काम करवाना उसकी जिम्मेदारी है, न कि किसी पर उपकार। जब फाइन, हेलमेट, सीट बेल्ट, स्क्रैप पॉलिसी जैसे फैसले तुरंत लिए जा सकते हैं, तो फिर कब तक पेट्रोल-डीजल के विकल्प पर चुप्पी बनी रहेगी?

ईरान और यूक्रेन जैसे युद्धों के चलते पेट्रोल, डीज़ल और गैस की कीमतें फिर बढ़ेंगी। क्या सरकार अब भी तय नहीं कर पा रही कि इससे फायदा जनता को मिले या खाड़ी देशों को?

सरकार यदि साहसिक निर्णयों के लिए जानी जाती है, तो एक डेट तय करे, जबसे भारत में सिर्फ इलेक्ट्रिक या वैकल्पिक ईंधन से चलने वाली गाड़ियां ही सड़कों पर उतरें। जो पेट्रोल-डीजल चलाना चाहें, उनसे पूरी मार्केट वैल्यू वसूली जाए, किसी तरह की सब्सिडी न दी जाए।

और अंत में, स्क्रैप पॉलिसी पर फिर से विचार होना चाहिए। हम जैसे बहुत से लोग हैं, जिनकी गाड़ियां आठ साल में मुश्किल से 25–30 हज़ार किलोमीटर चली हैं, हालत भी बेहतर है, प्रदूषण भी नहीं करतीं, फिर क्यों जबरन उन्हें कट्टी में भेजा जा रहा है?

अंग्रेजों के ज़माने की गाड़ियां आज भी रैलियों में दौड़ती हैं, लेकिन आज एक आम आदमी की गाड़ी को स्क्रैप कर देना जरूरी समझा जा रहा है। क्या भारत वाकई अम्बानी जैसे सम्पन्न लोगों का देश बन चुका है?

हर साल बीमा कंपनियों की डिक्टेशन पर गाड़ी की वैल्यू जिस रफ्तार से गिरती है, वह आम आदमी की मेहनत पर पानी फेर देती है। सरकार कब इस पर ध्यान देगी?

यूरोप, खाड़ी या अमेरिका से तुलना करने से पहले भारत की ज़मीन पर खड़े होकर उसकी हकीकत देखनी होगी, तभी कोई नीति सफल हो सकती है।

SP_Singh AURGURU Editor