पर्यावरण दिवस पर एक सवाल: उद्योग आखिर कब होंगे ज़िम्मेदार?
भारत के औद्योगिकीकरण ने विकास को रफ्तार दी, लेकिन पर्यावरण पर भारी असर डाला। वायु, जल और मिट्टी प्रदूषण के मुख्य स्रोत अब थर्मल प्लांट, रसायन उद्योग और निर्माण क्षेत्र बन चुके हैं। नदियां औद्योगिक कचरे से विषैली हो रही हैं, और उपजाऊ ज़मीन बंजर हो रही है। पर्यावरण दिवस के मौके पर यह ज़रूरी है कि उद्योग ग्रीन टेक्नोलॉजी, रिन्युएबल एनर्जी और रीसायकलिंग जैसे समाधानों को अपनाएं।
-बृज खंडेलवाल-
भारत में पिछले कुछ दशकों में औद्योगिकीकरण ने देश की आर्थिक प्रगति को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। कारखानों, बुनियादी ढांचे और तकनीकी विकास ने लाखों लोगों को रोज़गार दिया और भारत को वैश्विक बाज़ार में मज़बूत किया। लेकिन इस चमकती प्रगति के पीछे एक कड़वी सच्चाई छिपी है—पर्यावरण को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। उद्योग-धंधे आज वायु, जल और मिट्टी के प्रदूषण के सबसे बड़े कारणों में से एक हैं। विश्व पर्यावरण दिवस, जो हर साल 5 जून को मनाया जाता है, हमें इस संकट पर विचार करने और ठोस कदम उठाने का अवसर देता है।
वायु प्रदूषण में तीस फीसदी उद्योगों की वजह से
औद्योगिक इकाइयां, खासकर थर्मल पावर प्लांट, सीमेंट कारखाने और निर्माण क्षेत्र, वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोत हैं। इनसे निकलने वाले धुएँ में सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर (PM2.5 और PM10) जैसे खतरनाक तत्व होते हैं। दिल्ली-एनसीआर इसका जीता-जागता उदाहरण है, जहाँ सर्दियों में हवा इतनी ज़हरीली हो जाती है कि लोग साँस लेने में तकलीफ महसूस करते हैं। सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में वायु प्रदूषण का लगभग 27-30% हिस्सा औद्योगिक गतिविधियों से आता है। इस समस्या से निपटने के लिए सख्त उत्सर्जन नियमों और स्वच्छ ईंधन के उपयोग को बढ़ावा देना ज़रूरी है।
नदियों को जहरीले रसायनों से बचायें
भारत की नदियां, जो हमारी संस्कृति और अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, आज औद्योगिक कचरे से जूझ रही हैं। गंगा, यमुना, गोदावरी और कावेरी जैसी नदियाँ प्रदूषण की चपेट में हैं। कानपुर की चमड़ा उद्योग इकाइयाँ (टेनरियाँ) और वाराणसी व आसपास के कपड़ा कारखाने बिना उचित उपचार के जहरीले रसायन और अपशिष्ट नदियों में बहा रहे हैं। नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल (NGT) की एक रिपोर्ट के अनुसार, गंगा नदी में 60-70% प्रदूषण औद्योगिक और शहरी अपशिष्ट से आता है। इससे न सिर्फ़ जलजीव प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि पीने का पानी और खेती भी खतरे में पड़ रही है। उद्योगों को अपशिष्ट जल शोधन संयंत्र (ईटीपी) लगाने और नियमों का पालन करने के लिए मजबूर करना होगा।
ठोस कचरा उपजाऊ जमीन के लिए घातक
केमिकल कारखानों, खनन और भारी धातु उद्योगों से निकलने वाला ठोस कचरा मिट्टी को बंजर बना रहा है। सीसा, कैडमियम और आर्सेनिक जैसी भारी धातुएँ ज़मीन में मिलकर उसे जहरीला कर देती हैं। इससे उपजाऊ खेती की ज़मीन सिकुड़ रही है, जो भारत जैसे कृषि-प्रधान देश के लिए चिंता की बात है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के आँकड़े बताते हैं कि देश में हर साल लाखों हेक्टेयर ज़मीन प्रदूषण और अति-उपयोग से प्रभावित हो रही है। खाद्य सुरक्षा को बचाने के लिए उद्योगों को ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और ज़मीन के पुनर्जनन पर ध्यान देना होगा।
उद्योग अपनी कार्यप्रणाली सुधारें
विश्व पर्यावरण दिवस पर अक्सर पेड़ लगाने, सेमिनार करने और जागरूकता अभियानों का शोर सुनाई देता है। ये कदम सराहनीय हैं, लेकिन असली बदलाव तब आएगा जब उद्योग अपनी कार्यप्रणाली में सुधार लाएँ। कंपनियों को चाहिए कि वे कागज़ी वादों से आगे बढ़कर हरित तकनीकों को अपनाएँ। मसलन, सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों में निवेश, कचरे को रीसायकल करना और ऊर्जा-कुशल मशीनों का उपयोग करना। सरकार को भी सख्त नियम लागू करने और अनुपालन की निगरानी करने की ज़रूरत है।
कचरे का दोबारा इस्तेमाल कर संसाधनों की बर्बादी रोकें
शहर दुनिया के 70% से ज़्यादा संसाधनों का उपभोग करते हैं और भारी मात्रा में कचरा पैदा करते हैं। उद्योग इस कचरे को दोबारा इस्तेमाल कर संसाधनों की बर्बादी रोक सकते हैं। निर्माण कंपनियाँ पुरानी ईंटों, कंक्रीट और लकड़ी को रीसायकल कर नई इमारतें बना सकती हैं। इसी तरह, इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियाँ ई-वेस्ट को कम करने के लिए उत्पादों को रीसायकल-योग्य डिज़ाइन कर सकती हैं। स्मार्ट सिटी परियोजनाएँ, जैसे कचरा प्रबंधन सिस्टम और ऊर्जा-बचत वाली इमारतें, इस दिशा में बड़ा बदलाव ला सकती हैं।
उद्योग कर्मचारियों को ग्रीन टेक्नोलॊजी की ट्रेनिंग दें
कई कंपनियाँ पर्यावरण संरक्षण की बात तो करती हैं, लेकिन उनके पास न तो जानकारी है और न ही कुशल कर्मचारी। इसके लिए उद्योगों को अपने कर्मचारियों को ग्रीन टेक्नोलॉजी, कार्बन उत्सर्जन कम करने और टिकाऊ व्यवसाय के तौर-तरीकों की ट्रेनिंग देनी होगी। कॉलेजों और प्रशिक्षण संस्थानों के साथ मिलकर विशेष पाठ्यक्रम शुरू किए जा सकते हैं। कंपनियों के भीतर “ग्रीन टीमें” बनाकर नए और टिकाऊ विचारों को बढ़ावा देना भी कारगर होगा।
ये छोटे-छोटे कदम भी बहुत प्रभावी
पर्यावरण को बचाने के लिए हमेशा बड़े निवेश की ज़रूरत नहीं होती। छोटे-छोटे कदम भी प्रभावी हो सकते हैं। बिजनेस लीडर्स निम्न उपाय आज़मा सकते हैं:
- ऑफिस में ऊर्जा-बचत वाली एलईडी लाइट्स और उपकरण लगाएँ।
- प्लास्टिक बैग की जगह कागज़ या कपड़े के थैले इस्तेमाल करें।
- कागज़ का कम उपयोग कर डिजिटल दस्तावेज़ीकरण को बढ़ावा दें।
- वर्क-फ्रॉम-होम नीतियों से यात्रा और इससे होने वाले प्रदूषण को कम करें।
साथ ही, सप्लायर्स और ग्राहकों को भी जागरूक कर पर्यावरण के प्रति ज़िम्मेदारी को बढ़ाया जा सकता है।
रोज़मर्रा के फैसलों में पर्यावरण को प्राथमिकता
हर व्यावसायिक निर्णय, चाहे कच्चा माल खरीदना हो या उत्पादन बढ़ाना—पर्यावरण को प्रभावित करता है। कंपनियों को चाहिए कि वे टिकाऊ कच्चे माल का चयन करें, ऐसे उत्पाद बनाएँ जो लंबे समय तक चलें और पर्यावरण-अनुकूल प्रोजेक्ट्स में निवेश करें।
उद्योग ही पर्यावरण संरक्षण की असली ताकत बन सकते हैं। अगर कंपनियाँ ईमानदारी से छोटे-बड़े कदम उठाएँ, तो हम एक स्वच्छ, हरा-भरा और टिकाऊ भविष्य बना सकते हैं। विश्व पर्यावरण दिवस हमें याद दिलाता है कि अब सिर्फ़ बातें करने का नहीं, बल्कि ठोस कदम उठाने का समय है।