आगरा मेट्रो: आरबीएस से आगरा कॉलेज तक भूमिगत अप लाइन ट्रैक तैयार, फिनिशिंग अंतिम चरण में

आगरा। आगरा मेट्रो परियोजना के प्रथम कॉरिडोर में आरबीएस रैंप से आगरा कॉलेज तक अप लाइन के ट्रैक बिछाने का कार्य पूरा हो गया है। शेष चार भूमिगत स्टेशनों पर फिनिशिंग कार्य अंतिम चरण में है, जबकि थर्ड रेल, सिग्नलिंग और अन्य सिस्टमों का काम भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। इस काम के साथ ही आईएसबीटी से सिकंदरा तक एलिवेटेड खंड पर सिविल कार्य जारी है, ताकि शहर को समय पर विश्व स्तरीय मेट्रो सुविधा प्रदान की जा सके।

Aug 20, 2025 - 19:56
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आगरा मेट्रो: आरबीएस से आगरा कॉलेज तक भूमिगत अप लाइन ट्रैक तैयार, फिनिशिंग अंतिम चरण में

आरबीएस कॉलेज रैंप से आगरा कॉलेज की दिशा में लगभग 1.5 कि.मी. ट्रैक स्लैब की कास्टिंग पूरी हो गई है। इसके साथ ही आरबीएस रैंप से आगरा कॉलेज मेट्रो स्टेशन तक लॉन्ग वेल्डेड रेल तैयार हो गई है। अप और डाउन लाइन में ट्रैक का काम पूरा होने के बाद थर्ड रेल, सिग्नलिंग आदि प्रणालियों पर काम  किया जाएगा। आईएसबीटी से सिकंदरा तक शेष एलिवेटेड खंड पर सिविल कार्य भी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।

इसी प्रकार दूसरे कॉरिडोर आगरा कैंट से कालिंदी विहार तक का निर्माण कार्य भी तेजी से किया जा रहा है। ताकि परियोजना को समय पर पूरा किया जा सके और आगरा के लोगों को समयबद्ध तरीके से विश्व स्तरीय मेट्रो प्रणाली प्रदान की जा सके।

ऐसे होता है भूमिगत ट्रैक का निर्माण

भूमिगत मेट्रो निर्माण हेतु सबसे पहले स्टेशन का निर्माण किया जाता है।  स्टेशन का ढांचा तैयार होने के बाद लॉन्चिंग शाफ्ट का निर्माण कर टनल बोरिंग मशीन लॉन्च की जाती है। टीबीएम मशीन के जरिए गोलाकार टनल बनकर तैयार होती है। टनल का आकार गोल होने के कारण सीधे ट्रैक बिछाना संभव नहीं है, इसलिए यहां ट्रैक स्लैब की कास्टिंग की जाती है। इसके बाद इसी समतल ट्रैक स्लैब बैलास्टलेस ट्रैक बिछाया जाता है।

बैलास्टलैस ट्रैक निर्माण के दौरान कॉन्क्रीट बीम (प्लिंथ बीम) पर पटरियों को बिछाया जाता है। पारंपरिक तौर पर प्रयोग होने वाले ट्रैक की तुलना बैलास्टलैस ट्रैक अधिक मजबूत होता है एवं इसका मेन्टिनेंस भी काफी कम है।

हेड हार्डेंड रेल से ट्रैक को मजबूती

बता दें कि रेलवे की तुलना में मेट्रो प्रणाली में पटरियों पर गाड़ियों का आवागमन अधिक होता है। यहां मेट्रो रेल औसतन पांच मिनट के अंतर पर चलती हैं। ऐसे में तेजी से ट्रेन की स्पीड पकड़ने और ब्रेक लगाने की स्थिति में ट्रेन के पहिये और पटरी के बीच अधिक घर्षण होता है। जिसके कारण सामान्य रेल जल्दी घिस सकती है, जिससे पटरी टूटने, क्रेक आदि समस्या आ सकती है, लेकिन हेड हार्डेंड रेल के अधिक मजबूत होने के कारण ऐसी कोई समस्या नहीं आती है।

ऑटोमैटिक ट्रैक वेल्डिंग मशीन से बनती है लॉन्ग वेल्डेड रेल

भूमिगत भाग में ट्रैक बिछाने के लिए सबसे पहले क्रेन की मदद से ऑटोमेटिक ट्रैक वेल्डिंग मशीन को शाफ़्ट में पहुंचाया जाता है। इसके बाद पटरी के भागों को वेल्डिंग के जरिए जोड़कर लॉन्ग वेल्डिड रेल बनाई जाती है। इसके बाद टनल में ट्रैक स्लैब की कास्टिंग कर उस पर लॉन्ग वेल्डिड रेल बिछाई जाती है। वहीं बैलास्टिड ट्रैक के लिए समतल भूमि पर गिट्टी एवं कॉन्क्रीट के स्लीपरों पर पटरी बिछाई जाती हैं।

SP_Singh AURGURU Editor