आगरा मूल के डॉ. संजीव गुप्ता ने मंगल पर जीवन के संकेतों की खोज में निभाई अहम भूमिका

आगरा। क्या हम ब्रह्मांड में अकेले हैं? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसने सदियों से वैज्ञानिकों और आम जनता दोनों को आकर्षित किया है। अब मंगल पर हुई एक नई खोज शायद हमें इसके उत्तर के पहले से कहीं अधिक करीब ले आई है। मंगल पर जीवन की संभावनाओं से जुड़ी अब तक की सबसे बड़ी इस खोज में आगरा मूल के भूवैज्ञानिक डॉ. संजीव गुप्ता का नाम अग्रणी वैज्ञानिकों में शामिल है। नासा के पर्सिवेरन्स रोवर ने हाल ही में एक चट्टान का नमूना इकट्ठा किया है जिसमें सूक्ष्मजीव गतिविधि के संभावित बायोसिग्नेचर पाए गए हैं। यदि यह पुष्टि होती है तो यह इस बात का ऐतिहासिक सबूत होगा कि मंगल पर कभी जीवन था।

Sep 13, 2025 - 12:43
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आगरा मूल के डॉ. संजीव गुप्ता ने मंगल पर जीवन के संकेतों की खोज में निभाई अहम भूमिका
आगरा मूल के भूवैज्ञानिक डॊ. संजीव गुप्ता।

नासा की खोज और भारतीय जुड़ाव

नासा ने बीते बुधवार को घोषणा की थी कि मंगल की सतह से जुटाए गए नमूनों में पहली बार संभावित जीवन संकेत मिले हैं। यह उपलब्धि नेचर पत्रिका में प्रकाशित हुई है। इसके पीछे एक अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक टीम है। इस खोज का भारत के आगरा से भी गहरा संबंध है। इसके पीछे हैं आगरा में जन्मे एक भूवैज्ञानिक डॊ. संजीव गुप्ता, जो पिछले एक दशक से मंगल पर जीवन की तलाश कर रहे हैं। डॉ. संजीव गुप्ता वर्तमान में लंदन के इम्पीरियल कॉलेज में डिपार्टमेंट ऑफ अर्थ साइंस एंड इंजीनियरिंग में प्रोफेसर हैं।

डॊ. संजीव गुप्ता का आगरा से लंदन तक का सफर

आगरा में जन्मे डॉ. गुप्ता छह साल की उम्र में ब्रिटेन चले गए थे। उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से भूविज्ञान (जियोलॉजी) की पढ़ाई की, जबकि उनके पिता चाहते थे कि वे डॉक्टर बनें। प्रोफेसर गुप्ता बताते हैं, जैसे हर भारतीय पिता चाहता है, वैसे ही मेरे पिता भी चाहते थे कि मैं मेडिसिन चुनूं। लेकिन मैंने भूविज्ञान चुना और उसी पर डटा रहा। वे 2012 से नासा के क्यूरियोसिटी रोवर और बाद में पर्सिवेरन्स मिशन से जुड़े हुए हैं।

प्रोफेसर संजीव गुप्ता ने अपना पूरा करियर चट्टानों के अध्ययन में लगाया है और इस खोज में अहम भूमिका निभाई है। 2012 से प्रोफेसर गुप्ता नासा के क्यूरियोसिटी रोवर के साथ मंगल की सतह और चट्टानों का अध्ययन कर रहे हैं। जब 2020 में परसिवरेंस लॉन्च हुआ तो वह एक बार फिर अग्रिम पंक्ति में थे और अब तक जुटाए गए नमूनों का गहराई से अध्ययन कर रहे हैं, जिन्हें भविष्य में पृथ्वी पर लाने की योजना है।

चेयावा फॉल्स नमूना और जीवन संकेत

2024 में पर्सिवेरन्स द्वारा एकत्र किया गया चेयावा फॉल्स चट्टान नमूना अब तक का सबसे रोमांचक साबित हुआ। इसमें कार्बनिक अणु और रेडॉक्स रिएक्शन जैसी रासायनिक विशेषताएं मिलीं, जो पृथ्वी पर अक्सर सूक्ष्मजीवों से जुड़ी होती हैं। हालांकि यह सीधे जीवन का प्रमाण नहीं है, लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार यह संभावित जीवन का संकेत जरूर है।

परसिवरेंस 2021 से मंगल की सतह पर चल रहा है और टाइटेनियम ट्यूबों में नमूने इकट्ठे और सुरक्षित कर रहा है ताकि उन्हें भविष्य में पृथ्वी पर लाया जा सके। 2024 में रोवर ने भूवैज्ञानिकों के लिए सोने की खान जैसा नमूना जुटाया था।

पृथ्वी पर प्रयोगशालाओं में अध्ययन करना होगा

प्रोफेसर गुप्ता द्वारा अध्ययन की गई चेयावा फॉल्स नामक चट्टान से लिया गया नमूना उन पदार्थों या संरचनाओं को दिखाता है जिनका जैविक स्रोत हो सकता है। हालांकि यह कहने के लिए और अधिक डेटा की ज़रूरत है कि वास्तव में यह जीवन के संकेत हैं।

गुप्ता बताते हैं, हम यह नहीं कह रहे कि यह जीवन है। लेकिन पहली बार हमारे पास ऐसा कुछ है जो जीवन हो सकता है। हमें इन नमूनों को पृथ्वी पर प्रयोगशालाओं में अध्ययन करना होगा, तभी निश्चित हो पाएगा।

कभी जीवन योग्य वातावरण रखता था मंगल

इस नमूने का विश्लेषण परसिवरेंस के उन्नत उपकरणों से किया गया। ये उपकरण हैं प्लैनेटरी इंस्ट्रूमेंट फॉर एक्स-रे लिथोकेमिस्ट्री (पीआईएक्सआईएल) और शेरलॊक (स्कैनिंग हैबिटेबल एनवायरनमेंट्स विद रमन एंड ल्यूमिनेसेंस फॉर ऑर्गेनिक्स एंड केमिकल्स)। इनमें रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी सबसे अहम साबित हुई। डॊ. गुप्ता गुप्ता कहते हैं, मंगल पर जीवन खोजना बेहद कठिन है। परसिवरेंस को सीधे जीवन ढूंढने के लिए नहीं बनाया गया था, बल्कि यह ऐसे पत्थर इकट्ठे करने के लिए था जो जीवन के संकेतों को समेटे हों।

टीम ने चेयावा फॉल्स के नमूने में तीन चीजों की पुष्टि की कि यह क्षेत्र कभी जीवन-योग्य वातावरण रखता था। इसमें कार्बनिक अणु मौजूद थे। इसमें रेडॉक्स रिएक्शन (ऑक्सीकरण और अपचयन की प्रक्रिया) की विशेषताएं थीं।

मंगल की चट्टानों में रेडॉक्स रिएक्शन का मतलब है कि खनिजों ने इलेक्ट्रॉनों का आदान-प्रदान किया, यानी रासायनिक गतिविधि हुई। पृथ्वी पर सूक्ष्मजीव अक्सर ऊर्जा प्राप्त करने के लिए ऐसी प्रतिक्रियाएं करते हैं। मंगल पर इन्हें पाना इस बात का संकेत है कि वहां कभी सूक्ष्मजीवों के लिए अनुकूल परिस्थितियां रही होंगी, हालांकि यह सीधे जीवन का प्रमाण नहीं है।

पृथ्वी पर अध्ययन का इंतजार

वैज्ञानिक इन नमूनों को पृथ्वी पर लाकर गहराई से जांचना चाहते हैं, लेकिन मार्स सैंपल रिटर्न मिशन भू-राजनीतिक और बजटीय अड़चनों के कारण फिलहाल अटका हुआ है। डॉ. गुप्ता का कहना है कि इसमें एक दशक लग सकता है, लेकिन भारत और चीन जैसे देशों की सक्रियता से प्रक्रिया तेज हो सकती है।

डॊ. गुप्ता कहते हैं, इन नमूनों को हमारे पास आने में कम से कम एक दशक लगेगा। सैंपल रिटर्न मिशन जटिल होता है और इसके लिए नई तकनीकी खोजों की जरूरत पड़ती है। यह मिशन अभी पीछे धकेल दिया गया है, लेकिन नई अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों के साथ, और भारत व चीन द्वारा मंगल अन्वेषण बढ़ाए जाने से, यह जल्दी भी हो सकता है।

अगली चुनौती – एक्सोमार्स रोवर

जब दुनिया मंगल नमूनों का इंतजार कर रही है, प्रोफेसर गुप्ता पहले ही अपने अगले मिशन की तैयारी में जुट गए हैं। रोज़लिंड फ्रैंकलिन एक्सोमार्स रोवर, जिसे आने वाले वर्षों में लॉन्च किया जाएगा। यह रोवर ड्रिलिंग तकनीक से मंगल की सतह के नीचे तक जाएगा और प्राचीन जीवन के संकेत खोजेगा। इससे मानवता उस अंतिम ब्रह्मांडीय प्रश्न के और करीब पहुंच जाएगी कि क्या सचमुच हम ब्रह्मांड में अकेले हैं।

-इंडिया टुडे से साभार।

SP_Singh AURGURU Editor