‘भारत-विरोधी’ को मिला कांग्रेस का प्रतिष्ठित पुरस्कार: इंदिरा गांधी शांति सम्मान पर क्वेश्चन मार्क?
कांग्रेस द्वारा मिशेल बैशलेट को इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार देने का फैसला एक विवादास्पद और राजनीतिक संकेत है। बैशलेट ने यूएन मानवाधिकार प्रमुख रहते हुए भारत की संप्रभुता, कश्मीर नीति और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बार-बार आलोचनात्मक रुख अपनाया, जिससे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि प्रभावित हुई। ऐसे व्यक्ति को सम्मानित करना कांग्रेस की वैचारिक दिशा और उसकी राजनीतिक रणनीति पर सवाल खड़े करता है। इससे कांग्रेस भारत-विरोधी माने जाने वाले वैश्विक नैरेटिव को वैधता देती दिखती है। यह कांग्रेस की नीति-भ्रम और राष्ट्रीय संवेदनाओं से दूरी को भी दर्शाता है।
-बृज खंडेलवाल-
"क्या हमारे राष्ट्रीय सम्मान अब भारत-विरोधी ध्रुवों का समर्थन बन गए हैं? जब कांग्रेस ने मिशेल बैशलेट जैसी लेफ्ट लिबरल टाइप हस्ती को उन विचारों के लिए नवाज़ा, जिन्होंने बार-बार भारत की संप्रभुता, लोकतांत्रिक संस्थाओं और सुरक्षा पर सवाल उठाए, तो यह केवल एक पुरस्कार समारोह नहीं रहा बल्कि यह एक खुला राजनीतिक ऐलान बन गया है। 19 नवंबर 2025 को सोनिया गांधी द्वारा प्रस्तुत इंदिरा गांधी शांति, निशस्त्रीकरण व विकास पुरस्कार की गूंज देश की आत्मा तक पहुंच रही है: क्या कांग्रेस सचमुच भारत-विरोधी झुकाव को पुरस्कारों की आड़ में वैधता दे रही है?"
अब सवाल सिर्फ एक रस्मी सम्मान का नहीं रह गया है; कांग्रेस का 2024 का इंदिरा गांधी शांति, निशस्त्रीकरण और विकास पुरस्कार मिशेल बैशलेट को देना एक सीधा, तीखा और दूरगामी राजनीतिक संदेश है। जैसे ही सोनिया गांधी ने यह सम्मान उन्हें भेंट किया, भाजपा समेत तमाम आलोचकों ने कांग्रेस पर ‘भारत-विरोधी सोच’ को बढ़ावा देने का आरोप लगाया। यह निर्णय ऐसे समय आया है, जब देश को मज़बूत राष्ट्रीय सहमति की ज़रूरत है, और बैशलेट जैसी शख्सियत को सम्मान देने से कई सवाल स्वाभाविक रूप से उठ खड़े हुए हैं।
यूएन मानवाधिकार प्रमुख (2018–2022) रहते हुए बैशलेट ने बार-बार कश्मीर समेत भारत के आंतरिक मामलों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उछालकर एक ऐसे नैरेटिव को हवा दी, जिसका लाभ पाकिस्तान और ओआईसी ने तुरंत उठाया। अनुच्छेद 370 हटाने पर उनके ‘गहरी चिंता’ वाले बयान पाकिस्तान की शब्दावली की हूबहू नकल लगते थे। आतंकवाद, कश्मीरी पंडितों का विस्थापन, सीमा पार से होने वाली हिंसा—इन मुद्दों पर वे लगभग हमेशा मौन रहीं, जबकि भारत की संप्रभुता को अंतरराष्ट्रीय "मॉनिटरिंग" के नाम पर कमतर दिखाने में उन्हें कोई हिचक नहीं हुई।
पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं, "कश्मीर ही नहीं, भारतीय लोकतंत्र, अल्पसंख्यक, नागरिक समाज, एनजीओ और कृषि आंदोलन—हर मुद्दे पर बैशलेट की टिप्पणियाँ और रिपोर्टें उसी लेफ़्ट-लिबरल वैश्विक धारा का विस्तार थीं, जो लगातार यह छवि गढ़ती है कि भारत एक 'संकटग्रस्त लोकतंत्र' है। मोदी सरकार की हर नीति पर कठोर टिप्पणी और भारत के संस्थानों पर संदेह प्रकट करना उनके कार्यकाल की पहचान बन गया था।"
ऐसे में कांग्रेस का उन्हें सम्मानित करना सिर्फ एक सांस्कृतिक-अकादमिक चयन नहीं, बल्कि एक रणनीतिक राजनीतिक संकेत है, देश के भीतर और बाहर, भारत की आलोचक आवाज़ों को वैधता देना और अपनी राजनीतिक लड़ाई को अंतरराष्ट्रीय रंग देना।
राहुल गांधी के "भारत में लोकतंत्र खतरे में है" वाले वैश्विक दौरों, बालाकोट स्ट्राइक पर शंका पैदा करने और विदेश में भारत की छवि पर सवाल उठाने की शैली को देखें, तो बैशलेट को सम्मान देना उसी ‘पॉलिटिकल लाइन’ से प्रेरित कदम लगता है।
इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार कभी उन हस्तियों को मिलता था, जिन्होंने भारत के हितों, सुरक्षा, शांति और विकास को मज़बूती दी। लेकिन इस बार के चयन ने ऐसा संकेत दिया है कि कांग्रेस अब उन अंतरराष्ट्रीय आलोचकों को गले लगाना चाहती है, जो भारत की हर कमजोरी को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं और इसके लोकतांत्रिक ढांचे पर बार-बार अविश्वास जताते हैं। कहीं यह चयन कांग्रेस की आत्म-संदिग्धता और मज़बूत भारत की अवधारणा से असहजता का संकेत तो नहीं?
और इसमें सबसे बड़ी भूमिका निभाता है कांग्रेस का 'थिंक-टैंक', जिसकी दिशा और सोच पिछले कुछ वर्षों में लगातार उलझी, असंबद्ध और राष्ट्रीय संवेदना से कटती हुई दिखाई देती है। यह वही थिंक-टैंक है जिसने 2024 चुनावों से पहले ‘भारत जोड़ो’ के नाम पर विभाजन की राजनीति को हवा देने वाली रणनीतियाँ बनाईं, सैन्य कार्रवाईयों पर सवाल उठाने की सलाह दी, और अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत-विरोधी नैरेटिव गढ़ने वालों को सम्मानित करने का औचित्य गढ़ रहा है।
नीतिगत स्पष्टता के बजाय भ्रम, रणनीति के बजाय प्रतिक्रियात्मक राजनीति, और राष्ट्रहित के बजाय प्रतिद्वंद्विता—कांग्रेस के इन बौद्धिक सलाहकारों की यही पहचान बन चुकी है। बैशलेट को सम्मान देना उसी मानसिकता का ताज़ा उदाहरण है, जो न सिर्फ कांग्रेस को कमजोर करती है बल्कि यह संदेश भी देती है कि पार्टी की विचार प्रक्रिया अब जनता की संवेदनाओं से बहुत दूर जाकर किसी अलग ही वैचारिक ग्रह पर विचरण कर रही है।