बरेलीः प्यार में घर छोड़ा…लेकिन एसआईआर ने जोड़ दिए दिल! 15–15 साल बाद माता-पिता को आए बच्चों के फोन

-आरके सिंह- बरेली। मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लोग साधारण प्रशासनिक प्रक्रिया मानते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में यह दस्तावेज़ी कवायद कई टूटे रिश्तों और बिछड़े परिवारों के लिए भावनात्मक सेतु बन गई है। बरेली से लेकर बुलंदशहर और आंवला तक, ऐसे अनगिनत प्रेमी–युगल, जो प्रेम विवाह के बाद परिवार वालों से वर्षों तक बातचीत तक नहीं करते थे, एसआईआर फार्म भरने के लिए पिता–माता का एपिक नंबर खोजते-खोजते उसी घर का नंबर मिलाने को मजबूर हुए, जिसे उन्होंने कभी छोड़ दिया था। 15 साल से लेकर 9–10 साल बाद आए इन फोन कॉल्स ने कई घरों में रूठे दिलों को पिघला दिया और ममता की आंखें छलका दीं।

Dec 1, 2025 - 13:07
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बरेलीः प्यार में घर छोड़ा…लेकिन एसआईआर ने जोड़ दिए दिल! 15–15 साल बाद माता-पिता को आए बच्चों के फोन

15 साल बाद स्नेहलता को याद आए मम्मी–पापा

जोगी नवादा, बरेली की स्नेहलता (40) प्रेमी के साथ भागकर ओमकार चौधरी से शादी कर चुकी थीं। इसके बाद घरवालों से रिश्ता पूरी तरह खत्म हो गया था। कोई फोन नहीं, कोई त्योहार नहीं, न कोई हाल–चाल।

एसआईआर के दौरान जब बूथ अधिकारी ने 2003 की मतदाता सूची से माता–पिता की ईपीआईसी आईडी मांगी तो 15 साल से बंद पड़ा दिल का एक कोना अचानक खुल गया। स्नेहलता ने कांपती आवाज़ में मायके का नंबर मिलाया-
‘मम्मी… आपकी वोटर लिस्ट में कौन-सा नंबर था?’
उधर से कुछ पल की चुप्पी… और फिर रोती हुई मां की आवाज़-  ‘बेटी… तू है न?’ स्नेहलता का गला भर आया। एसआईआर ने वह पुल बना दिया जिसे समय तोड़ नहीं पाया था।

बुलंदशहर की सुलेखा बनी रिहाना10 साल बाद मां से पहली बातचीत

सुलेखा ने फरीदपुर के नवाब हसन से प्रेम विवाह कर धर्म परिवर्तन कर लिया था। अब वह दो बच्चों की मां है। उसका नया नाम है रिहाना। 10 साल में उसने कभी मायके वालों से बात नहीं की। मतदाता सूची प्रपत्र में पिता का नाम, भाग संख्या, ईपीआईसी आईडी पूछा गया और रिहाना की दुनिया जैसे ठहर गई। उसने झिझकते हुए मां को फोन लगाया- मां की रुंधी आवाज़ आई,
‘कौन…?’ रिहाना फुसफुसाई- ‘अम्मा… मैं सुलेखा…’ फोन के दोनों छोर पर सिसकियों की लंबी बातचीत हुई।

ठिरिया निजावत खां—जहां SIR ने सबसे ज्यादा जोड़ दिए बिछड़े रिश्ते

इस नगर पंचायत में 80% मुस्लिम + 20% हिंदू आबादी है  और यहां के युवक दिल्ली, ओडिशा, बिहार, बंगाल से लड़कियां लाकर विवाह कर चुके हैं। कई लड़कियां घरवालों से सारे रिश्ते तोड़कर नया जीवन जी रही थीं। लेकिन एसआईआर में मूल निवास, पिता का नाम, घर का बूथ नंबर, 2003 की सूची की जानकारी मांगी गई। इन सबने उन्हें बिछड़े परिवारों से फिर संपर्क करने पर मजबूर कर दिया।

एक बूथ लेवल अधिकारी ने कहा कि इस बार वोटर लिस्ट से ज्यादा, दिलों की गिनती हो रही है।

गुजरात से दस साल बाद आया बेटा अवधेश का फोन

खेड़ा गांव, बिथरी चैनपुर के रामवीर सिंह लगभग 10 साल से बेटे अवधेश को खो चुके थे। अवधेश गांव की लड़की को लेकर भाग गया था। दोनों ने नंबर तक बदल लिया था। अचानक भावनगर, गुजरात से फोन आया- बाबूजी… मैं अवधेश। दो बच्चे हैं। मतदाता सूची में नाम जोड़ना है…2003 की लिस्ट चाहिए।

रामवीर सिंह की आंखें भर आईं। बहू ने भी पहली बार फोन पकड़कर अपनी सास से बात की। घर में जैसे फिर दीपक जल उठे।

आंवला के बिलपुर में 9 साल बाद खिल उठा पिता–बेटी का रिश्ता

केशवजी की बेटी 9 साल पहले मामा के लड़के के साथ भाग गई थी। परिवार से सारे रिश्ते खत्म गये थे। लेकिन एसआईआर का फॉर्म भरते समय
पैतृक बूथ नंबर और पिता की ईपीआईसी आई चाहिए थी। लड़की ने 9 साल बाद पहली बार फोन किया- पापा… एक मदद चाहिए…। उसकी आवाज़ इतनी दीन–हीन थी कि मां बेकाबू होकर रो पड़ी। केशवजी बोले- एसआईआर ने हमारी बेटी की आवाज़ फिर सुना दी।

आम तौर पर सरकारी कागज़ी प्रक्रिया लोगों को परेशान करती है, लेकिन इस बार एसआईआर ने बिछड़े रिश्तों को जोड़ने का चमत्कार कर दिखाया। वोटर लिस्ट के एपिक नंबर ढूंढते-ढूंढते लोग अपने घर, अपने माता–पिता और अपनी जड़ों तक लौट आए- कम से कम एक फोन कॉल के जरिये ही सही।

SP_Singh AURGURU Editor