अपनी ही सरकार में घुट रहे भाजपा पार्षद, मेयर तक पहुंच नहीं और सदन भी बेअसर, अधिकारियों की मनमानी की शिकायत किससे करें, सदन और कार्यसमिति की बैठकों में भारी कमी ने बढ़ाई निर्वाचित प्रतिनिधियों की बेबसी
आगरा नगर निगम में सत्तारूढ़ भाजपा के कई पार्षद अधिकारियों की कथित मनमानी और अपने क्षेत्रों के विकास कार्यों को लेकर असंतोष के बावजूद खुलकर आवाज नहीं उठा पा रहे हैं। पार्षदों का कहना है कि उनकी मेयर से मुलाकात और संवाद आसान नहीं है, जबकि पार्टी स्तर पर भी संवाद का मंच सीमित हो गया है। नगर निगम सदन और कार्यकारिणी की बैठकें भी नियमों के मुताबिक नहीं हो रहीं। निर्वाचित सदन कमजोर होने से नौकरशाही पर जवाबदेही का दबाव भी कम हो रहा है, ऐसा अधिकांश पार्षद मानते हैं।
आगरा। आगरा नगर निगम में सत्तारूढ़ भाजपा के पार्षद इन दिनों ऐसी राजनीतिक और प्रशासनिक घुटन से गुजर रहे हैं, जिसकी शिकायत तक वे खुलकर किसी के सामने नहीं कर पा रहे। करीब दर्जनभर पार्षदों से बातचीत में एक बात लगभग समान रूप से सामने आई कि वे अपनी मेयर से न तो आसानी से फोन पर संपर्क कर पाते हैं और न ही कैंप कार्यालय पहुंचने पर मुलाकात हो पाती है। ऐसे में नगर निगम अधिकारियों की कथित मनमानी और अपने क्षेत्रों की समस्याओं को लेकर वे आखिर किसके सामने अपनी बात रखें, यह सवाल पार्षदों को परेशान कर रहा है।
नाम न छापने की शर्त पर कुछ पार्षदों ने अपनी स्थिति को ‘चक्की के दो पाटों के बीच पिसने’ जैसी बताया। एक तरफ क्षेत्रीय जनता की अपेक्षाएं हैं। काम न होने पर जनता के सवाल और ताने सुनने पड़ते हैं। दूसरी तरफ नगर निगम अधिकारियों की कार्यप्रणाली को लेकर शिकायत करनी हो तो अपनी ही मेयर तक पहुंचना मुश्किल बताया जा रहा है। पार्षदों का कहना है कि ऐसे माहौल में वे घुटने को विवश हैं क्योंकि अपनी पीड़ा को राजनीतिक स्तर पर भी नहीं उठा पा रहे हैं।
निर्माण कार्यों में भी भेदभाव के आरोप
कुछ पार्षदों ने नगर निगम क्षेत्रों में होने वाले निर्माण कार्यों को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि जिन पार्षदों को प्रभावशाली तरीके से अपनी बात रखने में महारत हासिल है, उनके क्षेत्रों में निर्धारित कोटे से अधिक काम तक हो जाते हैं, जबकि जो पार्षद जोड़तोड़ में पीछे हैं, उनकी फाइलें महीनों ही नहीं, वर्षों तक लंबित पड़ी रहती हैं। और तो और, भाजपा के तमाम पार्षदों के मुकाबले बसपा पार्षदों के क्षेत्रों में कई गुना अधिक धनराशि के निर्माण कार्य हो चुके हैं।
पार्षदों की शिकायत है कि क्षेत्र में विकास कार्य नहीं होने का जवाब उन्हें जनता को देना पड़ता है, जबकि संबंधित अधिकारियों से काम कराने के लिए उनके पास पर्याप्त प्रभावी माध्यम नहीं बचता।
पार्टी का कोर कमेटी तंत्र भी हुआ कमजोर
भाजपा ने महानगर स्तर पर कोर कमेटी का गठन कर रखा है। इसका उद्देश्य विवादित या नीतिगत मामलों को पार्टी स्तर पर सुलझाने के लिए एक ऐसा मंच उपलब्ध कराना है, जहां पार्षद अपनी बात महानगर अध्यक्ष और अन्य वरिष्ठ नेताओं (सांसदों-विधायकों) तक पहुंचा सकें। पार्षद दल की बैठकों में मेयर के साथ महानगर अध्यक्ष की मौजूदगी भी इसी संवाद व्यवस्था का हिस्सा रही है। इस कमेटी की बैठकें भी न होने से पार्षदों के बीच पार्टी स्तर पर अपनी बात रखने के मंच को लेकर भी असंतोष बढ़ा है।
विरोध करें तो सरकार के खिलाफ, चुप रहें तो जनता के सवाल
भाजपा पार्षदों की सबसे बड़ी दुविधा यही है कि नगर निगम में चल रही कथित अव्यवस्था के खिलाफ खुलकर आवाज उठाएं तो इसे अपनी ही सरकार के खिलाफ विरोध माना जा सकता है। वहीं चुप रहें तो अपने क्षेत्र की जनता के सवालों का सामना करना पड़ता है।
पार्षदों के बीच एक और आशंका बनी हुई है कि यदि उन्होंने नगर निगम की कार्यप्रणाली के खिलाफ मुखर होकर आवाज उठाई तो इसका राजनीतिक नुकसान अगले चुनाव में टिकट कटने के रूप में उठाना पड़ सकता है। यही डर उन्हें खुलकर विरोध करने से रोक रहा है।
नगर आयुक्त की शिकायत लेकर पहुंचे तो मिला यह जवाब
एक भाजपा पार्षद ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि वह एक काम के सिलसिले में एक वरिष्ठ अधिकारी के पास गए थे। पार्षद के मुताबिक, उनकी फाइल तक फेंक दी गई। इस व्यवहार की शिकायत लेकर वे किसी तरह मेयर तक पहुंचे और अपनी पीड़ा बताई। पार्षद के अनुसार, वहां उन्हें यह टिप्पणी सुनने को मिली—‘ये अधिकारी पिछले वाले से तो अच्छे हैं न।’
पार्षद के लिए यह जवाब समस्या के समाधान के बजाय उसकी तुलना भर था। उनका सवाल था कि यदि निर्वाचित प्रतिनिधि के साथ ही ऐसा व्यवहार हो और शिकायत के बाद भी समाधान न मिले तो वह अपने क्षेत्र की जनता के सामने क्या जवाब दे।
नियम में हर दो महीने सदन, हर महीने कार्यकारिणी की बैठक
नगर निगम की निर्वाचित बॉडी शहर की स्थानीय सरकार के रूप में काम करती है। इसके संचालन में सदन और कार्यकारिणी समिति की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। नगर निगम अधिनियम के अनुसार हर दो महीने में सदन की सामान्य बैठक और हर महीने कार्यकारिणी समिति की बैठक होनी चाहिए।
वरिष्ठतम पार्षद रवि माथुर लंबे समय से इन बैठकों के नियमित आयोजन का मुद्दा उठाते रहे हैं। उनका कहना है कि मौजूदा नगर निगम के कार्यकाल में अब तक केवल छह सामान्य सदन की बैठकें हुई हैं, जबकि नियमानुसार 19 बैठकें हो जानी चाहिए थीं। इसी तरह कार्यकारिणी समिति की 37 बैठकें होनी चाहिए थीं, जबकि अब तक केवल 19 बैठकें हुई हैं।
रवि माथुर का कहना है कि जब निर्वाचित सदन की निर्धारित बैठकें ही समय पर नहीं होंगी तो पार्षद अपनी समस्याएं सदन में कैसे उठाएंगे और अधिकारियों को जवाबदेह कैसे बनाया जाएगा। उनके अनुसार, वह लंबे समय से इस मुद्दे को उठा रहे हैं, लेकिन कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। उल्टा उनकी शिकायत यह कहते हुए कर दी गई कि वह परेशान कर रहे हैं।
बैठक बुलाने का अनुरोध भी अनसुना, फिर अचानक सामने आई तारीख
नगर निगम की कार्यप्रणाली की स्थिति का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि भाजपा के एक वरिष्ठ पार्षद ने करीब एक माह पहले मेयर से अनुरोध किया था कि लंबे समय से सदन की बैठक नहीं हुई है, इसलिए बैठक बुला ली जाए। पार्षद के मुताबिक, उनके अनुरोध पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
इसके बाद बसपा पार्षद दल के नेता ने सदन की बैठकें न होने का मुद्दा सार्वजनिक रूप से उठाया। इसके बाद 9 सितंबर को सदन की बैठक बुलाए जाने की जानकारी सामने आई। हालांकि 8 सितंबर की शाम तक कई पार्षदों को यह स्पष्ट नहीं था कि 9 सितंबर को वास्तव में सदन की बैठक होगी या नहीं। उनका कहना था कि बैठक का एजेंडा तक उनके पास नहीं पहुंचा था। कुछ पार्षदों ने जानकारी जुटाई तो उन्हें सदन की बैठक नहीं होने की बात भी पता चली। इस ऊहापोह ने नगर निगम की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल और गहरा दिए।
सदन कमजोर तो नौकरशाही पर कैसे बने दबाव
पार्षदों का कहना है कि निर्वाचित सदन ही वह मंच है जहां वे सामूहिक रूप से अधिकारियों के सामने अपने क्षेत्रों की समस्याएं रख सकते हैं और जवाब मांग सकते हैं। यदि सदन की बैठकें नियमित नहीं होंगी तो पार्षदों की सामूहिक आवाज कमजोर होगी और इसका सीधा लाभ नौकरशाही को मिलेगा।
यही वजह है कि भाजपा के पार्षदों की मौजूदा स्थिति सिर्फ व्यक्तिगत नाराजगी का मामला नहीं रह गई है। सवाल नगर निगम की उस व्यवस्था का है, जिसमें जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों को अपनी ही सरकार के अधिकारियों के सामने प्रभावी ढंग से बात रखने के लिए पहले अपनी पहुंच और मंच तलाशना पड़ रहा है। जब मेयर तक पहुंच मुश्किल हो, पार्टी स्तर पर संवाद सीमित हो और सदन की बैठकें भी नियमित न हों, तो फिर पार्षद अपनी जनता के सवालों का जवाब आखिर किस मंच से दें—यह सवाल अब नगर निगम की व्यवस्था पर सबसे तीखा सवाल बनकर उभर रहा है।