जनकपुरी महोत्सव में पार्षदों का सत्ता नृत्य: वो सब कुछ हो रहा जो कभी नहीं हुआ

आगरा। शहर के श्रीजनकपुरी महोत्सव में इस बार श्रद्धा और परंपराओं की जगह सियासत और अहम की जंग हावी रही। कमला नगर क्षेत्र के दो भाजपा पार्षद पूरे आयोजन में हावी रहे। और तो और, जनकपुरी महोत्सव समिति के दूसरे पदाधिकारी भी तमाशबीन बनकर रह गये। आयोजन से चंद दिन पहले तक पदों की बंदरबांट, मंच पर उपेक्षा और बाउंसरों की तैनाती ने पूरे आयोजन की गरिमा पर सवालिया निशान लगा दिए। अब हर कोई यही कह रहा है कि सत्ता पक्ष के दो पार्षदों की वजह से श्रद्धा के रंग फीके पड़ गए।

Sep 20, 2025 - 12:40
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जनकपुरी महोत्सव में पार्षदों का सत्ता नृत्य: वो सब कुछ हो रहा जो कभी नहीं हुआ
ये हैं जनकपुरी में तैनात किये गये बाउंसर्स। आखिर धर्म के काम में इनकी जरूरत क्यों पड़ी।

इस बार की जनकपुरी में बाउंसरों की मौजूदगी चर्चा का विषय बनी हुई है। बताते हैं कि मंच के आसपास व्यवस्थाएं बनाने के लिए चार बाउंसर तो श्रीजनकपुरी महोत्सव कमेटी ने बुलाए हुए थे। इसके साथ ही राजा जनक और राजा दशरथ स्वरूपों ने भी अपने-अपने बाउंसर बुला रखे थे।

आगरा में श्रीजनकपुरी महोत्सव का उद्देश्य भक्ति, परंपरा और सांस्कृतिक समरसता का प्रतीक रहा है। लेकिन इस बार का आयोजन चर्चा में तो आ रहा है, लेकिन विवादों की वजह से। इस बार तो शुरुआत ही विवाद से हुई, जब कमला नगर क्षेत्र के भाजपा पार्षद पंकज अग्रवाल और प्रदीप अग्रवाल ने महोत्सव समिति के अध्यक्ष मुरारी प्रसाद अग्रवाल के खिलाफ सोशल मीडिया पर अभियान छेड़ दिया। उनके हटाए जाने की मांग ने आयोजन को एक विवाद का रंग दे दिया।

पदों की रेवड़ी बांटने का खेल

कारोबारी जगत से जुड़े मुरारी प्रसाद को समझ नहीं आ रहा था कि इस असहमति के पीछे असली मकसद क्या है। सांसद नवीन जैन और दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री राकेश गर्ग के हस्तक्षेप से विवाद थमा तो सही, लेकिन इसकी कीमत पदों की रेवड़ी बांटकर चुकानी पड़ी। पंकज अग्रवाल को संयोजक और प्रदीप अग्रवाल को महामंत्री बना दिया गया। यही नहीं, जिस-जिस ने आंखें तरेरीं, उन्हें कोई न कोई पद अंतिम समय तक थमाए जाते रहे। परिणाम यह हुआ कि महोत्सव की कमेटी एक जम्बो कमेटी में बदल गई, जिसमें हर किसी को एडजस्ट कर शांत करने का खेल आयोजन से एक सप्ताह पहले तक चलता रहा।

मंच पर अपमान और परंपराओं का पतन

रामबरात के जनकपुरी पहुंचने के बाद मिथिला महल मंच के पर हालात और भी शर्मनाक रहे। राजा दशरथ स्वरूप अजय अग्रवाल ने सार्वजनिक रूप से अपनी पीड़ा जताई कि उनका स्थान छीनकर राजा जनक स्वरूप राजेश अग्रवाल ने कब्जा कर लिया। कुल मिलाकर जनकपुरी कमेटी के पदाधिकारी हों या फिर राजा दशरथ परिवार, यहां भी चेहरों को चमकाने की होड़ मची रही। राजा दशरथ स्वरूप अजय अग्रवाल ने यह भी पीड़ा जताई है कि वे मंच पर कोने में खंभे के पीछे उपेक्षित बैठे रहे और किसी ने सुध तक नहीं ली।

कोषाध्यक्ष को धकियाने और बाउंसरों का विवाद

इतना ही नहीं, महोत्सव कमेटी के कोषाध्यक्ष को मंच से धकियाए जाने का आरोप भी इन्हीं दोनों पार्षदों में से एक पर लगा। और तो और, मीडियाकर्मी भी आयोजन से जुड़े कुछ लोगों की अभद्रता का शिकार हो गये। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि आयोजन में इस बार बाउंसरों की तैनाती की गई। जबकि सुरक्षा व्यवस्था के लिए पहले से ही 200 स्वयंसेवक और पुलिस मौजूद थी। सवाल यह उठता है कि जब पर्याप्त व्यवस्था थी तो फिर मंच के पास बाउंसर क्यों? इससे साफ है कि कुछ लोग आयोजन को अपनी पकड़ में रखना चाहते थे।

श्रीरामलीला और श्रीजनकपुरी महोत्सव की पहचान अब तक भक्ति और परंपरा रही है। स्वरूप निभाने वाले पात्र हमेशा इस भाव से मंच पर आते रहे हैं मानो वे स्वयं दशरथ या जनक हों। लेकिन इस बार सत्तापक्ष के पार्षदों ने आयोजन को अपनी ताकत और प्रभाव दिखाने का मंच बना डाला। सेवाभाव और परंपराओं की जगह पदों की लूट, अपमान और अव्यवस्था ने पूरे महोत्सव की गरिमा को ठेस पहुंचाई। इस बार परंपरा को किनारे कर, चेहरों और पदों की राजनीति ने सबको निराश किया। श्रद्धा का उत्सव सत्ता के खेल में तब्दील हो गया।

SP_Singh AURGURU Editor