खेत पर सांड के रूप में मौत ने दी थी दस्तक, एसएन के डॉक्टर्स ने फिर रच दी ज़िंदगी की कहानी

आगरा। एसएन मेडिकल कॉलेज एक बार फिर जीवन रक्षा का प्रतीक बनकर सामने आया है। एटा जनपद के एक किसान के साथ जो हादसा हुआ, उसमें उसके बचने की उम्मीद छोड़ दी गई थी। पर एसएन के डॉक्टरों की सूझबूझ, समर्पण और विशेषज्ञता ने उस किसान को फिर से जीवनदान दे दिया।

Aug 7, 2025 - 17:29
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खेत पर सांड के रूप में मौत ने दी थी दस्तक, एसएन के डॉक्टर्स ने फिर रच दी ज़िंदगी की कहानी
किसान को नई जिंदगी देने वाली एसएन मेडिकल कॊलेज के चिकित्सकों की टीम के साथ सतेंद्र। 

-एटा के किसान की सांड के हमले से छलनी हो गई थी छाती, अंग बाहर आ गए थे, तीन घंटे की सर्जरी से मिली नई ज़िंदगी

खेत में काम करते समय हुआ हादसा

एटा जिले के गांव नगला गुलाबी के निवासी 33 वर्षीय सतेन्द्र कुमार प्रतिदिन की तरह खेत पर कार्य कर रहे थे। अचानक खेत में मौजूद एक सांड बेकाबू हो गया और अपने तीखे सींगों से सतेन्द्र की छाती को इस तरह भेद गया कि छाती से होते हुए पेट तक घाव पहुंच गया।

यह चोट इतनी भीषण थी कि सतेन्द्र की आंतें, यकृत (लीवर), प्लीहा (स्प्लीन) और अन्य अंग छाती की ओर खिसक गए। कुछ आंतें शरीर से बाहर तक निकल आईं। यह दृश्य देख कर गांव में कोहराम मच गया। परिजन चीख-पुकार करने लगे। सभी ने मान लिया कि अब सतेन्द्र की जान नहीं बच पाएगी।

एसएन लाए जाने तक सांसे थीं धीमी

एटा के एक अस्पताल में प्राथमिक उपचार के बाद सतेन्द्र को तुरंत एसएन मेडिकल कॉलेज, आगरा रेफर किया गया। यहां उसकी हालत गंभीरतम श्रेणी में थी। समय के एक-एक पल के साथ उसकी सांसें कमजोर होती जा रही थीं।

डॉ. सुशील सिंघल की टीम ने समय पर लिया निर्णय

एसएन के वरिष्ठ कार्डियोथोरेसिक एवं वैस्कुलर सर्जन डॉ. सुशील सिंघल ने जैसे ही मरीज़ की स्थिति देखी, तुरंत आपातकालीन सर्जरी का निर्णय लिया। बिना समय गंवाए ऑपरेशन थिएटर में पूरी टीम के साथ मरीज़ को ले जाया गया।

सांसें थमा देने वाली 3 घंटे की जटिल सर्जरी

सर्जरी के दौरान पहले छाती को खोला गया। पेट से छाती में पहुंचे सभी अंगों को अत्यंत सावधानीपूर्वक पुनः पेट की गुहा (एब्डोमिनल कैविटी) में स्थापित किया गया। इसके बाद फट चुकी डायाफ्राम (छाती और पेट के बीच की झिल्ली) की मरम्मत की गई। यह काम अत्यंत सूक्ष्मता और धैर्य के साथ किया गया।

प्रत्येक टांका उस किसान की जीवन रेखा था। यह सर्जरी लगभग 3 घंटे तक चली। इसके पश्चात सतेन्द्र को सीटीवीएस आईसीयू में स्थानांतरित किया गया।

छह दिन बाद जब मुस्कुराया सतेन्द्र...

सर्जरी के बाद लगातार 5-6 दिन तक गहन निगरानी में उसे रखा गया। छठे दिन जब सतेन्द्र स्वयं उठकर बैठा और मुस्कुराया, तो वह केवल एक मरीज नहीं बल्कि चिकित्सा विज्ञान की एक अनूठी सफलता का प्रतीक बन गया।

चिकित्सकों ने बताया अत्यंत दुर्लभ मामला

डॉ. सुशील सिंघल ने बताया कि यह मामला चिकित्सा के इतिहास में अत्यंत दुर्लभ माना जाएगा। ऐसे मामलों में व्यक्ति केवल शारीरिक रूप से ही नहीं, मानसिक और आत्मिक रूप से भी पूरी तरह टूट जाता है। पर समय पर लिया गया निर्णय, अनुभवी चिकित्सकों की समर्पित टीम और आधुनिक संसाधनों की उपलब्धता ने इस जीवन को फिर से सुरक्षित कर दिया।

यह रहे जीवनदाता चिकित्सक

सीटीवीएस टीम: डॉ. सुशील सिंघल, डॉ. श्याम, डॉ. सुहैल और डॉ. अर्पिता। एनेस्थीसिया टीम: डॉ. अतिहर्ष, डॉ. रजनी यादव, डॉ. रविंद्र और डॉ. मनीष। रेडियोलॉजी टीम: डॉ. हरी सिंह, डॉ. निखिल शर्मा (जिनकी सीटी स्कैन रिपोर्ट ने सर्जरी की रणनीति तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई)। इसके साथ ही सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. प्रशान्त लवानिया ने तकनीकी मार्गदर्शन और सहयोग प्रदान किया।

संस्थान का बढ़ता मान

एसएन मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. प्रशान्त गुप्ता ने इस सफलता पर कहा कि अब एसएन मेडिकल कॉलेज में अति जटिल आपातकालीन सर्जरी भी विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम द्वारा सफलतापूर्वक की जा रही हैं। यह संस्थान अब उत्तर प्रदेश में आकस्मिक चिकित्सा की दृष्टि से एक सशक्त केंद्र बन चुका है।

SP_Singh AURGURU Editor