आगरा में 28 वर्षों से इंसानियत की मिसाल : अज्ञात मृतकों की अस्थियों का संरक्षण और गंगा विसर्जन
आगरा की श्री क्षेत्र बजाजा कमेटी कल (25 अगस्त को) को सोरों में ऐसे अज्ञात और असहाय मृतकों की अस्थियों का गंगा में विसर्जन करने जा रही है, जिनका अंतिम सांस लेते समय शायद अपना कोई नहीं था। श्री क्षेत्र बजाजा कमेटी हर तीन साल में ऐसे ही अज्ञात और असहाय मृतकों की अस्थियों का गंगा में विसर्जन करती है।
आगरा। श्री क्षेत्र बजाजा कमेटी इस बार यह नौवीं अस्थि विसर्जन यात्रा निकलने जा रही है। यह अस्थि विसर्जन यात्रा केवल एक सामान्य अनुष्ठान नहीं, बल्कि इंसानियत की वह मिसाल है जिसमें 28 वर्षों से अज्ञात और असहाय मृतकों की अस्थियों को सम्मानपूर्वक गंगा में प्रवाहित किया जा रहा है। इस बार 2526 मृतकों की अस्थियाँ पुलिस सलामी और पूर्ण विधि-विधान के साथ सोरों स्थित गंगा जी की गोद में समर्पित की जाएंगी।
अज्ञात मृतकों की अस्थियों के गंगा में विसर्जन का यह सर्विस प्रोजेक्ट जून 1985 में आगरा की राजा की मंडी स्टेशन पर छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद जन्मा। इस भीषण रेल दुर्घटना के बाद बाद जब श्मशान घाट में चीख-पुकार और सन्नाटे के बीच दाह संस्कार हो रहे थे, तब आगरा के एक समाजसेवी अशोक गोयल ने मृतकों की इंडिविजुअल फ़ोटोग्राफ़्स लेकर अस्थि-फूल परिजनों को सौंपे थे। यहीं से विचार उठा कि अज्ञात मृतकों की अस्थियों को सुरक्षित रखा जाए, ताकि पहचान होने पर वस्त्र/फोटो के साथ अस्थि-फूल भी उनके परिवारीजनों को सौंपे जा सकें।
विचार से परंपरा: रिकॉर्ड के साथ अस्थि-संरक्षण
यह भाव एक यूनिक इनिशिएटिव बन गया। अशोक गोयल के प्रस्ताव पर ही श्री क्षेत्र बजाजा कमेटी ने इसे व्यवस्थित रूप दिया।। हर अज्ञात मृतक की अस्थियां सुरक्षित की जाने लगीं। साथ में थाने का नाम, कांस्टेबल नंबर और तारीख भी दर्ज की जाती। पहचान मिलते ही अस्थि-फूल परिजनों को सौंपे जाते हैं। अशोक गोयल कहते हैं, सेवा अकेले नहीं होती, क्षेत्र बजाजा कमेटी के साथियों का संबल और प्रभु की कृपा ही इस प्रोजेक्ट की ताकत है।
‘नाले’ से ‘चिता’ तक: पुलिस की मुश्किल का हल
कभी पुलिस के पास संसाधन न होने से लावारिस लाशें नाले में फेंक दी जाती थीं। श्री क्षेत्र बजाजा कमेटी के उप मंत्री के रूप में अशोक गोयल ने मोक्षधाम के पास एक ऐसा ही दृश्य देखा जब पुलिस कांस्टेबल एक अज्ञात के शव को नाले में डाल रहे थे। पूछने पर इन्होंने कहा कि अज्ञातों के दाह संस्कार के लिए सरकार से कोई धन नहीं मिलता। इसके बाद अशोक गोयल ने क्षेत्र बजाजा कमेटी के तत्कालीन कोषाध्यक्ष शंकर लाल माहेश्वरी से चर्चा की। अज्ञात शवों के लिए 200 रुपये के कूपन से लकड़ी जुटाने का प्रस्ताव रखा। समिति ने नीतिगत निर्णय लिया। नि:शुल्क लकड़ी पहले समिति देगी। कमी होने पर समाज से सहयोग लिया जाएगा। इसके बाद शहर के सभी थानों को सूचना भेजी गई। तब से आज तक आगरा में हर अज्ञात शव का विधि-विधान से अंतिम संस्कार होता है, पुलिस पर कोई बोझ नहीं।
भागवत कथा, रथ-निमंत्रण और सर्वधर्म प्रार्थना
अज्ञात मृतकों की अस्थियों का गंगा में विसर्जन का आइडिया भी अशोक गोयल को ही आया। वे बताते हैं कि श्मशान में सुरक्षित अस्थियों के पास जाने पर उन्हें बार-बार अनुभूति हुई कि मानों अज्ञातों की अस्थियां कह रही हैं कि हमारे लिए कुछ करो। इस पर उन्होंने गुरु डॉ. चंदनलाल पाराशर से परामर्श किया और फिर श्मशान पर भागवत कथा कराने का निर्णय हुआ। कथा वाचन पंडित मदन मोहन शास्त्री ने किया। लोग सोचते थे- मौत के चौराहे (विद्युत शवदाह गृह) पर कौन कथा सुनने आएगा, वे सपत्नीक पहुंचे और शहर का जनमानस भी उमड़ पड़ा। इस महत्वपूर्ण सेवा कार्य में सुनील विकल और टीएन अग्रवाल तथा अन्य कपड़ा व्यवसायी विशिष्ट सहयोगी रहे।
भागवत कथा से पहले मोक्ष धाम ताजगंज से बैकुंठ धाम क्षेत्र में रथ यात्रा निकालकर अज्ञात आत्माओं को कथा के लिए आमंत्रित भी किया गया। कथा के उपरांत अस्थियों को मंदिर, मस्जिद, दरगाह और गुरुद्वारों में प्रार्थनाओं के साथ ले जाकर अंततः गंगा में विसर्जित किया गया। यहीं से हुई अज्ञात मृतकों के अस्थि विसर्जन यात्रा की शुरुआत, जो अब तक अनवरत जारी है।
दुनिया में अनोखा: लावारिस अस्थियों को पुलिस सलामी
उस समय आगरा के तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से आग्रह किया गया था कि अज्ञात मृतकों अस्थियों की अस्थि विसर्जन यात्रा को पुलिस गारद सलामी दे। पहले हंसी हुई, पर इस तर्क कि हम हर अज्ञात अस्थि को सुभाष चंद्र बोस की अस्थि समझते हैं, ने असर किया और एसएसपी के स्तर से अनुमति मिल गई। तब से आगरा दुनिया का पहला शहर है जहां लावारिस अस्थियों को पुलिस सलामी दी जाती है। सलामी के बाद मुक्ति रथ से सोरों ले जाकर सभी अस्थियों का मां गंगा में विसर्जन होता है। समिति की यह सेवा 28 वर्षों से निरंतर चली आ रही है।
समय के साथ बढ़ता चला गया कारवां
अस्थि विसर्जन कार्यक्रम की सोच अशोक गोयल ने दी और फिर इसे क्षेत्र बजाजा कमेटी निरंतर आगे बढ़ा रही है। इस सर्विस प्रोजेक्ट के पहले संयोजक सुनील विकल थे। इसके अलावा राजकुमार जैन, ओम टंडन, स्व, अखिल गुप्ता, स्व. विपिन गुप्ता अमरनाथ समेत और भी तमाम सेवाभावी लोग और बजाजा कमेटी के समय-समय पर रहे पदाधिकारी इसमें योगदान देते रहे हैं।
ब्रज चौरासी कोस की पावन यात्रा भी कराई
इन 28 वर्षों में एक अवसर वह भी आया जब अज्ञात मृतकों की अस्थियों को ब्रज 84 कोस यात्रा कराई गई। इसमें दुर्लभ दर्शन वाले संत स्वयं चलकर आए। शहर के सम्माननीय नागरिक ओपी अग्रवाल (ओपी चेन्स) और वीडी अग्रवाल (पुष्पांजलि ग्रुप) भी सपत्नीक इसमें सम्मिलित हुए।
नवम अस्थि विसर्जन यात्रा कल
हर तीन वर्ष में हजारों अस्थियां गंगा में प्रवाहित की जाती हैं। इस बार 25 अगस्त को नवम अस्थि विसर्जन यात्रा निकलेगी, जिसमें 2526 मृतकों की अस्थियां पुलिस सलामी के बाद मुक्ति रथ द्वारा सोरों स्थित गंगा जी में पूर्ण विधि-विधान से विसर्जित की जाएंगी। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, आत्म-शांति और परिजनों के लिए सांत्वना का सशक्त संदेश है।
सेवा की निरंतरता—मानवता का आंदोलन
28 वर्षों में हजारों अज्ञात मृतक गंगा की गोद में विश्राम पा चुके हैं; जिनकी पहचान मिली, उनके अस्थि-फूल परिजनों को सौंप दिए गए। समिति के इस कार्य में सुनील विकल, टीएन अग्रवाल सहित अनेक सहयोगियों का सतत योगदान रहा है। संदेश स्पष्ट है- हमारा अपना, सचमुच हमें मिला।