ट्रेड वॉर से हार्ले डेविडसन तक : अमरीका-भारत रिश्तों का बदलता समीकरण

अमरीका भारत पर टैरीफ वॉर और दबाव की रणनीति अपनाता रहा है, लेकिन मोदी सरकार ने उसे नाकाम कर दिया है। भारत रूस और चीन के करीब हो रहा है। भारत को वैश्विक संतुलन साधने के लिए नेहरू की निरपेक्ष नीति से भी सबक लेना चाहिए।

Sep 6, 2025 - 12:38
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ट्रेड वॉर से हार्ले डेविडसन तक : अमरीका-भारत रिश्तों का बदलता समीकरण

-डॉ. (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान-

अमरीका अपने हित साध रहा है और भारत अपने। बात यदि रूसी तेल की नहीं होती तो कोई अन्य बिंदु मिल जाता। ठीक वैसे ही जैसे एक आदमी अपनी पत्नी से उलझ गया दो अंडों के कारण, जिस अंडे का ऑमलेट बनाना था, उसे उबाल दिया और जिसे उबालना था, उसका ऑमलेट बना दिया।

अमरीका भारत पर हावी होना चाहता है, लेकिन भारत और प्रधानमंत्री मोदी यह होने नहीं दे रहे। पिछले दिनों अमरीका ने एक के बाद एक कई कोशिशें कीं, पर मोदी जी के सामने उसकी दाल नहीं गल पाई। अब वह हताश है, उसके दंभ पर चोट पहुंची है। इस बीच भारत रूस और चीन के और करीब जाता दिखाई दे रहा है। बात उल्टी होती देखी गई, जब भारत और चीन के बीच सुलह की शुरुआत हुई। अमरीका भारत के कंधों पर रखकर ताइवान के लिए चीन पर बंदूक साधना चाहता था, पर भारत की बेरुखी ने उसे झटका दे दिया और चीन से अपने रिश्ते सुधारने की शुरुआत कर दी।

भारत के इस वैश्विक विकल्प से अमरीका हतप्रभ है। यहां तक तो ठीक है, पर भारत को अंदर झांकने की जरूरत है कि क्या हम नेहरू जी के समय की निरपेक्ष नीति में सूखे रह गए थे, या फिर किसी एक के चक्कर में पड़ गए। यह भी संभव है कि हम दो पाटों में फंस जाएं।

डोनाल्ड ट्रम्प के दिमाग में इन दिनों सबसे ज्यादा हार्ले डेविडसन मोटरसाइकिल घूम रही है। यह उनके लिए ईगो प्रॊब्लम बन चुकी है। सवाल यह है कि भारत का क्या बिगड़ेगा यदि अमरीका से हार्ले डेविडसन के आयात को बेहद सस्ता कर दिया जाए? डरने की कोई बात नहीं। यह मोटरसाइकिल एक लीटर पेट्रोल में केवल 15–18 किलोमीटर ही चलती है। भारतीय वही गाड़ी खरीदता है, जो उसके पैसे वसूल करवा दे। हार्ले डेविडसन की ओर मुश्किल से 1% भारतीय ही सोच पाएंगे।

हमारी भारतीय मोटरसाइकिलें कहीं बेहतर हैं, और दुनिया भर में बिक रही हैं। एशिया, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका में, जबकि हार्ले डेविडसन की बिक्री उन क्षेत्रों में न के बराबर है। ऐसे में बेहतर यही होगा कि भारत उनके ईगो  को संतुष्ट करने के लिए सिर्फ यही मोटरसाइकिल आने दे। हो सकता है इससे ट्रम्प का नजरिया बदल जाए।

भारत अमरीका से भी बेहतर और दोस्ताना रिश्ते चाहेगा। लेकिन चीन से दोस्ती कितनी टिकेगी, यह कोई राजनीतिक पंडित यकीन से नहीं कह सकता। सबसे पहले सीमांकन का मसला हल करना होगा, क्योंकि चीन से सबसे बड़ी समस्या हमेशा यही रही है। रूस से रिश्ते ठीक-ठाक हैं, लेकिन वह भी कई मौकों पर खुलकर भारत के साथ नहीं आया।

ऐसे में हार्ले डेविडसन को भारत आने देना कोई बड़ी समस्या नहीं है। आने वाली पीढ़ियां शायद इन मोटरसाइकिलों पर उछल-कूद का मज़ा ले सकेंगी, जब वे धूल फांकती पड़ी होंगी और रिपेयर तक नहीं हो पाएगा। नेहरू जी के नजरिये से अंतरराष्ट्रीय संबंधों को थोड़ी देर के लिए देखना और समझना बुरा नहीं होगा।

(लेखक इंडियन आर्मी से सेवानिवृत्त हैं और कई पुस्तकों के लेखक हैं)

SP_Singh AURGURU Editor