सस्ते रूसी तेल का खेल: कहीं अपने ही देश की नाव डुबो तो नहीं रहे हम?
रूस से सस्ते तेल की खरीद ने भारत को कूटनीतिक और आर्थिक मोर्चे पर उलझा दिया है। जनता को राहत नहीं मिली, महंगाई जस की तस है और अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ता जा रहा है। सवाल यह है कि क्या तेल के नाम पर हम अपने ही हितों को दांव पर लगा रहे हैं?
-डॉ. (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान-
आज दुनिया भर का माहौल बेहद गर्म है। यूक्रेन और रूस के युद्ध से हालात ऐसे हैं कि मानो तीसरे विश्व युद्ध की कगार पर खड़े हों। रूस हमारा मित्र है, और यूएसएसआर के अंतर्गत आने वाले देश भी हमारे मित्र रहे हैं। लेकिन क्या आज की स्थिति यह बताती है कि हमारी रूस से नजदीकियां सिर्फ प्रतिबंधित तेल और अस्त्र-शस्त्र लेने तक ही सीमित हो गई हैं?
सस्ता तेल और बढ़ता कर्ज
भारतीय तेल कंपनियां सस्ते दाम पर रूस से सस्ता तेल खरीद रही हैं। सवाल यह है कि इस आयात और विदेश में ‘प्रोसेस’ कर निर्यात करने से सरकारी मुद्रा कोष में पिछले तीन वर्षों में कितना अतिरिक्त धन आया? जब तेल कंपनियां सस्ते दामों पर कच्चा तेल खरीद रही हैं, तब पेट्रोल-डीजल के दाम आम जनता के लिए कितने कम हुए? महंगाई, मुद्रास्फीति, बस-ट्रक-ऑटो के किराए, डीजल ट्रेन का भाड़ा क्या इनमें कोई ठोस कमी आई?
110 से 120 डॉलर प्रति बैरल में बिकने वाला कच्चा तेल भारत रूस से 70 डॉलर प्रति बैरल खरीद रहा है। लेकिन जनता को राहत क्यों नहीं मिली? क्या इसका लाभ कुछेक निजी कंपनियों तक सीमित रहा? सरकारी कंपनियां जो वर्षों से घाटे में थीं, क्या अब मुनाफे में आईं और क्या सरकारी मुद्रा कोष को वास्तविक सहारा मिला?
अंतरराष्ट्रीय दबाव और भारत की स्थिति
अमेरिका और नाटो ने भारत को कई तरीकों से घेरना शुरू किया है। 50% अतिरिक्त टैरिफ लगाया जा चुका है। अमेरिका पाकिस्तान को बार-बार सहायता दिला रहा है। आईएमएफ से भी मदद करवा रहा है। यह हमारे खिलाफ खुली रणनीति जैसी प्रतीत होती है। अमेरिका पहले भी ऑपरेशन सिंदूर-1 में युद्ध में हस्तक्षेप की स्थिति बना चुका है, और चर्चा है कि यदि सिंदूर-2 हुआ तो वह पाकिस्तान के साथ भारत के खिलाफ खड़ा होगा।
क्या रूस से दोस्ती सिर्फ तेल पर आधारित है?
यदि हम रूसी तेल लेना बंद कर दें तो क्या रूस से दोस्ती भी खत्म हो जाएगी? क्यों न भारत वैकल्पिक ऊर्जा पर अधिक ध्यान दे? टेस्ला और बीवाईडी जैसे उदाहरण सामने हैं। चीन ने इस दिशा में बड़ी प्रगति की है। जब चीन से हमारे मतभेद कम हो रहे हैं, तो क्यों न उसके साथ शांति और ऊर्जा समझौते कर लें, ताकि अस्त्र-शस्त्र का अंधाधुंध भंडारण न करना पड़े।
पड़ोसियों से रिश्तों की मजबूती
भारत को अपने पड़ोसियों से रिश्ते और गहरे करने की आवश्यकता है। नेपाल, भूटान, बर्मा, श्रीलंका जैसे देशों से सौ गुना मेहनत कर दोस्ती मजबूत करनी चाहिए। नेपाली गोरखा भारतीय सेना का अभिन्न अंग रहे हैं, उन्हें और सम्मान से जोड़ा जाए। छोटे विवाद जैसे लिपुलेख, कालापानी, लिम्पियाधुरा जैसे मुद्दों को सुलझाकर स्थायी शांति स्थापित हो सकती है। थोड़े से त्याग से यदि वर्षों की दूरियां समाप्त हो जाएं तो यह सौदा बुरा नहीं होगा।
भीतरी चुनौतियां और नेतृत्व की कमी
हमने अपने ही देशभक्त मुसलमानों को संवाद की कमी से बिदका दिया है। यदि वे साथ होते, तो घुसपैठियों और फर्जी लाभार्थियों को पहले ही चिन्हित कर सरकार को सतर्क कर सकते थे। जरूरत थी स्पष्ट संवाद की, लेकिन नेतृत्व ने यह जिम्मेदारी नहीं निभाई। पॉपुलेशन कंट्रोल, संविधान की भावना, और सामाजिक संतुलन पर संवाद अभी भी बाकी है।
रक्षा और अस्त्र-शस्त्र पर सवाल
भारत पहले से ही पाकिस्तान की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली है। ऑपरेशन सिंदूर-1 में हमारी ताकत दुनिया देख चुकी है। तो फिर सवाल यह है कि क्या हम विश्व विजय पर निकलना चाहते हैं? प्रमाणित परमाणु शक्ति होने के बाद और क्या चाहिए? हर तरह की मिसाइलें, रॉकेट, विमान, हथियार। क्या यह आवश्यकता है या अंधाधुंध तैयारी?
महान अशोक ने एक बार युद्ध के बाद भारत की सीमाओं को सुरक्षित कर दिया था। क्या हम भी वही शांतिप्रिय भारत का स्वरूप नहीं दिखा सकते, जो 'सर्वे संतु सुखिनः, सर्वे संतु निरामयाः' का संदेश देता आया है?
भारत का मूल चरित्र शांतिप्रिय रहा है। जरूरी है कि हम दुनिया को वही चेहरा दिखाएं जो सबका मित्र हो, साफ नीयत रखता हो, और भीतर से बबर शेर भी हो।