क्या छात्र आंदोलन भी अब राजनीतिक सुविधा का विषय बन गए हैं? सवालों के घेरे में 'चयनात्मक सक्रियता'

आज जरूरत इस बात की है कि परीक्षा, भर्ती और शिक्षा से जुड़े हर मुद्दे पर राजनीतिक दल एक समान संवेदनशीलता दिखाएं। छात्रों का भविष्य किसी राज्य, किसी दल या किसी चुनावी रणनीति का विषय नहीं, बल्कि देश के भविष्य का प्रश्न है।

Aug 5, 2026 - 19:11
 0
क्या छात्र आंदोलन भी अब राजनीतिक सुविधा का विषय बन गए हैं? सवालों के घेरे में 'चयनात्मक सक्रियता'

छात्र आंदोलनों को लोकतंत्र की सबसे सशक्त आवाज माना जाता है। जब युवा सड़क पर उतरते हैं तो यह केवल किसी परीक्षा, भर्ती या नीति का विरोध नहीं होता, बल्कि व्यवस्था से जवाबदेही की मांग भी होती है। लेकिन हाल के घटनाक्रम एक नया सवाल खड़ा कर रहे हैं—क्या अब छात्र आंदोलनों पर भी राजनीतिक दलों का समर्थन सत्ता और विपक्ष की सुविधानुसार तय होने लगा है?

दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट परीक्षा पेपर लीक के मुद्दे को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में चले आंदोलन और संसद मार्च के दौरान छात्रों तथा पुलिस के बीच हुई झड़प के बाद कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने केंद्र सरकार को लगातार घेरा। इसे लोकतंत्र, युवाओं के भविष्य और परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता से जोड़कर बड़े राजनीतिक मुद्दे के रूप में प्रस्तुत किया गया।

लेकिन इसी दौरान झारखंड में चल रहे छात्र आंदोलन पर विपक्ष की चुप्पी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। झारखंड में कांग्रेस, झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के साथ सरकार में भागीदार है। ऐसे में वहां छात्रों के आंदोलन पर कांग्रेस की ओर से कोई मुखर प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। विपक्ष के कई प्रमुख चेहरे, जो दिल्ली के आंदोलन में सक्रिय दिखाई दिए, झारखंड के मुद्दे पर लगभग मौन हैं।

इसी तरह कॉकरोच जनता पार्टी के प्रमुख चेहरे अभिजीत दिपके भी सवालों के घेरे में हैं। दिपके का कहना है कि वे टाइफाइड से पीड़ित होने के कारण झारखंड नहीं जा सके। हालांकि आलोचकों का तर्क है कि यदि स्वास्थ्य कारणों से स्वयं जाना संभव नहीं था तो संगठन के अन्य प्रमुख नेताओं को वहां भेजा जा सकता था। यही कारण है कि उनके रुख पर भी सवाल उठ रहे हैं।

आलोचना केवल कांग्रेस तक सीमित नहीं है। आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव सहित विपक्ष के अन्य प्रमुख नेताओं की चुप्पी भी राजनीतिक बहस का विषय बन गई है। दूसरी ओर भाजपा इन सवालों को लेकर विपक्ष पर लगातार हमलावर है और इसे विपक्ष की चयनात्मक राजनीति बता रही है।

उधर पंजाब के कथित पेपर लीक का मामला भी राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा नहीं बन सका। वहां यह विवाद आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और अकाली दल के बीच आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित दिखाई दिया। इस मुद्दे पर भी कॉकरोच जनता पार्टी की सक्रियता नहीं दिखी, जिससे विपक्षी दलों और छात्र संगठनों की प्राथमिकताओं पर सवाल उठने लगे हैं।

इन घटनाओं के बीच सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि कौन-सा दल किस सरकार पर हमला कर रहा है। बड़ा सवाल यह है कि क्या छात्र हित भी अब राजनीतिक सीमाओं में बंटने लगे हैं? यदि एक राज्य में छात्र आंदोलन लोकतंत्र की आवाज है तो दूसरे राज्य में भी उसे समान संवेदनशीलता और समर्थन क्यों नहीं मिलना चाहिए। छात्रों के मुद्दों का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि संबंधित राज्य में सत्ता किस दल की है।

लोकतंत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी समान होती है। यदि कोई राजनीतिक दल केवल विरोधी दल की सरकार वाले राज्यों में छात्रों के पक्ष में मुखर हो और अपने सहयोगी दलों की सरकार वाले राज्यों में मौन साध ले, तो उसकी विश्वसनीयता पर स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठेंगे। इसी प्रकार यदि कोई दल केवल विपक्ष की चुप्पी को मुद्दा बनाए और स्वयं भी दूसरे राज्यों के मामलों पर अलग मापदंड अपनाए, तो उस पर भी सवाल उठेंगे।

छात्र आंदोलनों की ताकत उनकी निष्पक्षता और नैतिक आधार में होती है। जब इन आंदोलनों पर राजनीतिक सुविधा, दलगत हित या सत्ता के समीकरण हावी होने लगते हैं, तब सबसे बड़ा नुकसान उन लाखों युवाओं का होता है, जिनकी उम्मीदें इन आंदोलनों से जुड़ी होती हैं।

SP_Singh AURGURU Editor