बांकीपुर उपचुनाव के नतीजे ने भाजपा नेतृत्व को आईना दिखाया है- मनमाने फैसले थोपने का अंजाम हार के रूप में सामने आता है
राजनीति का सबसे बड़ा सत्य यही है कि कोई भी सीट स्थायी रूप से किसी दल की नहीं होती। जनता हर चुनाव में नया फैसला सुनाती है और कार्यकर्ता उस फैसले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी होता है। बिहार के बांकीपुर ने भाजपा को यही आईना दिखाया है।
बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव का परिणाम केवल एक सीट की हार नहीं, बल्कि भाजपा नेतृत्व के लिए एक गंभीर राजनीतिक संदेश है। यह संदेश स्पष्ट करता है कि अहंकार में लिए गए मनमाने फैसले किसी भी परंपरागत गढ़ को पराजय में बदल सकते हैं। टिकट वितरण में यदि समर्पित कार्यकर्ताओं की भावनाओं और स्थानीय संगठन की राय की अनदेखी कर निर्णय ऊपर से थोपे जाएंगे, तो सबसे मजबूत माने जाने वाले राजनीतिक किले भी ढह सकते हैं। यह परिणाम बताता है कि लोकतांत्रिक दलों में संगठन की ताकत केवल शीर्ष नेतृत्व से नहीं, बल्कि जमीनी कार्यकर्ताओं के विश्वास और सहभागिता से बनती है।
बांकीपुर वर्षों से भाजपा का अभेद्य गढ़ माना जाता रहा है। यह वही सीट है, जहां से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन लगातार पांच बार विधायक चुने गए। इससे पहले उनके पिता भी इस सीट का प्रतिनिधित्व करते रहे। ऐसे में यह स्वाभाविक था कि भाजपा इस सीट को अपनी सबसे सुरक्षित सीटों में गिने। लेकिन राजनीति में अति आत्मविश्वास अक्सर सबसे बड़ी भूल साबित होता है और बांकीपुर ने यही साबित कर दिया।
सबसे बड़ा सवाल टिकट चयन को लेकर उठता है। पहले ऐसे चेहरे को उम्मीदवार बनाया गया, जिसके पारिवारिक अतीत को लेकर पार्टी के भीतर ही असहजता थी। विरोध बढ़ने पर जल्दबाजी में मंडल अध्यक्ष नीरज सिन्हा को उम्मीदवार घोषित कर दिया गया। यह निर्णय ऐसे समय लिया गया, जब सामने प्रशांत किशोर जैसे रणनीतिकार की चुनौती मौजूद थी। प्रत्याशी चयन में अति आत्मविश्वास और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों की अनदेखी का असर मतदान में साफ दिखाई दिया।
सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह रहा कि कुछ महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को इस क्षेत्र में लगभग 62 प्रतिशत वोट मिले थे, लेकिन उपचुनाव में पार्टी का वोट प्रतिशत घटकर लगभग 34 प्रतिशत रह गया। यही नहीं, मतदान का प्रतिशत भी सात प्रतिशत गिरा। इतने कम समय में मत प्रतिशत में आई यह बड़ी गिरावट केवल विपक्ष की मजबूती नहीं, बल्कि भाजपा के अपने संगठन और समर्थक वर्ग की नाराजगी का भी संकेत मानी जा रही है।
यह घटना केवल बांकीपुर तक सीमित नहीं है। लगभग हर राज्य में भाजपा की कुछ ऐसी सीटें हैं, जिन्हें पार्टी का पारंपरिक गढ़ माना जाता है। दशकों से इन सीटों पर भाजपा जीत दर्ज करती रही है। यही कारण है कि कई बार इन सीटों पर स्थानीय कार्यकर्ताओं की अपेक्षा संगठन के प्रभावशाली नेताओं या निर्णय प्रक्रिया से जुड़े संघ के पदाधिकारियों की पसंद को प्राथमिकता मिल जाती है। इससे लंबे समय से क्षेत्र में सक्रिय और स्वाभाविक दावेदार कार्यकर्ताओं में असंतोष पैदा होता है।
लोकतांत्रिक दलों की वास्तविक ताकत उनका कार्यकर्ता होता है। यदि वही स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगे तो चुनावी मशीनरी कमजोर पड़ जाती है। कार्यकर्ता खुलकर विरोध भले न करे, लेकिन उसकी निष्क्रियता भी चुनावी परिणाम बदलने के लिए पर्याप्त होती है। बांकीपुर के नतीजे इसी मनोविज्ञान की ओर संकेत करते हैं।
यह भी स्पष्ट हो गया कि केवल किसी बड़े नेता का नाम या पार्टी का चुनाव चिह्न जीत की गारंटी नहीं है। मतदाता अब उम्मीदवार की स्वीकार्यता, स्थानीय सक्रियता और संगठन की कार्यशैली को भी बराबर महत्व दे रहे हैं। राजनीतिक दलों, खासकर कैडर वाली भाजपा के लिए यह संकेत है कि टिकट वितरण में पारदर्शिता, स्थानीय कार्यकर्ताओं का सम्मान और जमीनी समीकरणों का सही आकलन पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है।
बांकीपुर का उपचुनाव भाजपा के लिए आत्ममंथन का अवसर है। यदि पार्टी इस संदेश को गंभीरता से लेकर संगठन की भावनाओं और कार्यकर्ताओं के सम्मान को प्राथमिकता देती है, तो यह हार भविष्य की रणनीति को और मजबूत बना सकती है। लेकिन यदि इसे केवल एक अपवाद मानकर नजरअंदाज किया गया, तो ऐसे परिणाम अन्य पारंपरिक गढ़ों में भी दोहराए जा सकते हैं।