बांकीपुर उपचुनाव के मायने

सत्येंद्र सिंह

Aug 5, 2026 - 19:18
 0
बांकीपुर उपचुनाव के मायने

  बिहार के बांकीपुर विधान सभा उपचुनाव में जन सुराज पार्टी के प्रत्याशी और पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर को खोने के लिए कुछ नहीं था। इसलिए अगर वे चुनाव हार जाते तो वह ज्यादा ध्यान नहीं खींचता। हां, विपक्षी राजनीति के लिहाज से उनकी जीत अवश्य महत्वपूर्ण है, लेकिन उनकी जीत से ज्यादा महत्वपूर्ण भाजपा की पराजय है।

ऐसा दो कारणों से है। एक, यह सीट भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के पास थी। यहां भाजपा पिछले करीब तीन दशकों से चुनाव जीतती आ रही थी। अब जब भाजपा यह सीट बचा नहीं सकी, तो राष्ट्रीय अध्यक्ष के बारे में आम आदमी कह सकता है कि वे अपनी सीट बचा नहीं सके, तो राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के लिए क्या उपलब्धि अर्जित कर सकते हैं।

यही वह पहलू है जो भाजपा आलाकमान को चिंतित करने वाला होगा। दूसरी बात यह है कि इससे मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की लोकप्रियता को भी परखा जा रहा है। हाल ही के चुनाव में प्रचंड जीत हासिल करने वाले एनडीए और उसके हिस्सेदार भाजपा के गढ़ में यह पराजय राज्य सरकार के बारे में सकारात्मक धारणा पैदा नहीं करती, हालांकि अभी इसके आधार पर कोई बड़ा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। अभी प्रश्न यह है कि भाजपा की यह पराजय क्यों हुई? इसके क्या मायने हैं?  

  इन सवालों का उत्तर ढूंढने के लिए चुनाव के समाजशास्त्र पर ध्यान देना होगा। भाजपा का परंपरागत वोटर कथित अगड़ी जातियां यूजीसी रेगुलेशन के कारण उससे दूरी बनाने लगी हैं। यह वही समूह है, जो भाजपा के पक्ष में नैरेटिव गढ़ने में अहम भूमिका निभाता था। अगर भाजपा यह समझती है कि वह अपने कार्यकर्ताओं के बूते चुनाव जीत जाती है, तो वह भ्रम में है। धारणा की लड़ाई लड़ने में वे विपक्षी पार्टियों से कमजोर पड़ते हैं। यह बात उस समय और महत्वपूर्ण हो जाती है, जब शीर्ष नेतृत्व की साख गिरने लगी है। बांकीपुर में अगड़ी जातियां की पर्याप्त संख्या होने के बावजूद भाजपा की पराजय का आखिर क्या अर्थ निकाला जा सकता है?

शीर्ष नेतृत्व को इस चुनाव के जरिए अगड़ी जातियां का संदेश यही है कि अगर भाजपा उसकी चिंता नहीं करती, तो वे भाजपा की चिंता क्यों करें। यहां जेन जी जैसे कारक ज्यादा अहमियत नहीं रखते, क्योंकि युवा कोई सामाजिक समूह नहीं है। क्या आरक्षण पर उनकी कोई एक राय है? दरअसल, विपक्ष या मीडिया की एजेंडबाजी के कारण इसे जरूरत से ज्यादा महत्व दिया जा रहा है। पश्चिमी देशों से आयातित इस अवधारणा की जड़ें भारतीय समाज में गहरी नहीं हैं, इसलिए यह टिकाऊ नहीं होगी।  बहरहाल, राजद का परंपरागत वोटर भी जन सुराज की तरफ फिलहाल खिसक गया, हालांकि यह किसी प्रवृत्ति का परिचायक नहीं है।

यहां यह बात समझ में नहीं आई कि पार्टी ने इस चुनाव में जोर क्यों नहीं लगाई। जो भी हो, इससे इतना तो स्पष्ट है कि इससे बिहार की राजनीति में नया विमर्श शुरू होगा। राजद के सामने सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि क्या वह विपक्ष की राजनीति में जन सुराज को जगह देने के लिए तैयार होगा? दूसरी ओर ऐसा नहीं लगता कि राजद के सहयोगी कांग्रेस को जन सुराज को स्वीकार करने में ज्यादा कठिनाई होगी। अगर विपक्षी राजनीति में कोई नया समीकरण बनता है, तो क्या उसका सामाजिक आधार क्या होगा? दूसरी ओर चुनौती एनडीए गठबंधन को एकजुट रखने की भी होगी। बेशक प्रशांत किशोर अब ज्यादा ऊर्जा से एक नया विमर्श गढ़ने की कोशिश करेंगे और अब उन्हें गंभीरता से सुना भी जाएगा।

अब उनसे कोई यह नहीं पूछेगा कि आप खुद चुनाव क्यों नहीं लड़ते। यह सवाल अब खत्म हो चुका है। लेकिन जन सुराज संस्थापक प्रशांत किशोर से बिहार की जनता की यह जानने की अपेक्षा अवश्य रहेगी कि उनका विकास माडल पूंजीवादी ही रहेगा या कोई और? अगर उनका माडल पूंजीवादी ही रहता है, तो यह अन्य पार्टियों से अलग कैसे समझी जाएगी? उनकी धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा वही होगी, जो कांग्रेस, राजद जैसी पार्टियों की है? सवाल यह भी हो सकता है कि वे हिंदुत्व के साथ हैं या उसके खिलाफ? जातिगत प्रतिस्पर्धा के इस माहौल में सामाजिक न्याय का प्रश्न भी उन्हें परेशान करेगा, जहां उन्हें संतुलन साधने की चुनौती होगी। विकास की आड़ में सामाजिक मसलों को हाशिए पर धकेलने की कोशिश उनकी  'रणनीतिक चालाकी' ही समझी जाएगी।

 विश्लेषकों की नजर इस बात पर भी रहेगी कि उनके निशाने पर सिर्फ भाजपा प्रदेश नेतृत्व ही रहेगा या केंद्रीय नेतृत्व भी। बहरहाल, प्रशांत किशोर को मंच तो मिल गया है, लेकिन उड़ान भरने की चुनौती अभी बरकरार है। अब देखना यह होगा कि उनकी राजनीति में कोई नयापन दिखता है या वह पुरानी राह पर ही दौड़ती है।