सुनने की क्षमता है संवाद का पुलः एसएन मेडिकल कॉलेज में कॉक्लियर इम्प्लांट पर हुई सीएमई
एस.एन. मेडिकल कॉलेज, आगरा के ईएनटी विभाग में आयोजित CME (सी-एम-ई) कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि सुनने की क्षमता केवल ध्वनि तक सीमित नहीं—यह व्यक्ति को दुनिया से जोड़ने वाला जीवंत Bridge (ब्रिज) है। विशेषज्ञों ने बताया कि कॉक्लियर इम्प्लांट जैसी तकनीक न केवल सुनने की शक्ति लौटाती है, बल्कि भावनाएँ, रिश्ते और सामाजिक जुड़ाव भी वापस लाती है। इस मौके पर ईएनटी विभाग ने अपनी नई टेम्पोरल बोन डिसेक्शन लैब की औपचारिक शुरुआत की। साथ ही जल्द ही संस्थान में पूर्ण कॉक्लियर इम्प्लांट प्रोग्राम शुरू करने की घोषणा भी की गई।
आगरा। एस.एन. मेडिकल कॉलेज, आगरा के ईएनटी विभाग द्वारा ब्रिजिंग साइलेंस: अन्डरस्टैन्डिंग हियरिंग ऐंड द रोल ऑफ़ कॉक्लियर इम्प्लान्ट्स (Bridging Silence: Understanding Hearing and the Role of Cochlear Implants) विषय पर एक महत्वपूर्ण सी-एम-ई आयोजित की गई। कार्यक्रम का नेतृत्व विभागाध्यक्ष डॉ. प्रो. रितु गुप्ता ने किया। अध्यक्षता प्रिंसिपल डॉ. प्रो. प्रशांत गुप्ता ने की तथा संचालन डॉ. सलोनी सिंह ने किया।
कार्यक्रम का विचार यह था कि सुनना मानव जीवन का बुनियादी ब्रिज है, जो व्यक्ति को दुनिया, संवाद और सामाजिक बातचीत से जोड़ता है। विशेषज्ञ वक्ताओं ने सुनने की कमी को सायलेंट डिसैबिलिटी बताया और भारत में यूनिवर्सल न्यूबॉर्न हियरिंग स्क्रीनिंग को अनिवार्य रूप से लागू करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
कॉक्लियर इम्प्लांट पर हुई तकनीकी चर्चा
विशेषज्ञों ने बताया कि जिन मरीजों में कॉक्लिया की हेयर सेल्स खराब हो जाती हैं, उनमें कॉक्लियर इम्प्लांट एक ऐसी तकनीक है जो सीधे ऑडिटरी नर्व को स्टिम्युलेट कर सुनने की क्षमता बहाल करती है। इसे एक परिवर्तनकारी नवाचार के रूप में बताया गया, जो आवाज़ से आगे बढ़कर भावनाएं और सामाजिक जुड़ाव तक लौटा देता है।
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में पद्मश्री डॉ. जे.एम. हंस उपस्थित रहे, जिन्होंने अब तक 3500 से अधिक कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी कर वैश्विक पहचान हासिल की है।
भारत में कॉक्लियर इम्प्लांट से जुड़ी चुनौतियों पर भी चर्चा
कार्यक्रम में दो प्रमुख समस्याओं पर गंभीर चर्चा हुई। पहली कॉक्लियर इम्प्लांट की अत्यधिक लागत और दूसरी बच्चों में सुनने की कमी का देर से पता चलना। बताया गया कि सरकारी मेडिकल कॉलेज में ये सेवाएं शुरू होने से लागत और समय, दोनों संबंधी चुनौतियों को काफी हद तक कम किया जा सकेगा। इससे ज़रूरतमंद बच्चों को जीवन बदलने वाला उपचार समय पर मिल सकेगा।
कार्यक्रम में लोगों से आग्रह किया गया कि यदि बच्चा 2–3 वर्ष की उम्र तक बोलना शुरू नहीं करता, या ऐसा लगे कि वह आवाज़ों पर सामान्य प्रतिक्रिया नहीं दे रहा, तो इसे हल्के में न लें और तुरंत ईएनटी विशेषज्ञ से संपर्क करें।
सरल जांचों से यह पता लगाया जा सकता है कि बच्चा सही तरह सुन पा रहा है या नहीं। यदि कमी पाई जाती है, तो कॉक्लियर इम्प्लांट समय पर करवाने से बच्चे का भविष्य पूरी तरह बदल सकता है।
कार्यक्रम में सीनियर प्रोफेसर डॉ. धर्मेंद्र कुमार, डॉ. सौमिता नीरज और अन्य पीजी छात्रों ने आयोजन में सक्रिय भूमिका निभाई। अंत में धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अखिल ने प्रस्तुत किया।