मानव कर्तव्य आयोग बना होता तो अधिकारों के लिए लड़ना ही न पड़ता
शहर के प्रमुख उद्यमी पूरन डावर एक चिंतक और विश्लेषक के रूप में भी अपनी पहचान रखते हैं। विभिन्न विषयों पर वे अपने विचार रखते रहे हैं। 26 दिसंबर को एमपीएस वर्ल्ड स्कूल में मानवाधिकार पर आयोजित एक कार्यक्रम में मुख्न्य अतिथि के रूप में पहुंचे पूरन डावर का जोर इस बात पर रहा कि मानवाधिकार आयोग के बजाय मानव कर्तव्य आयोग बनाया गया होता तो मानवाधिकारों के लिए लड़ने की नौबत ही न आती
डा. एमपीएस वर्ल्ड स्कूल में नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन (मानवाधिकार आयोग) के सचिव का छात्रों को उनके अधिकार पर सेशन था। इसमे मुझे मुख्य अतिथि के रूप में भाग लेने का अवसर मिला। आज संविधान दिवस है। देश के संविधान को नमन करता हूं। इससे भी पहले जीवन के दर्शन, जिसमें जीवन की हर समस्या का हल है, उस गीता को नमन करता हूं।
मैंने कभी राइट्स को समझने का प्रयास नहीं किया। आज भी जब मानवाधिकार आयोग के सचिव जोगिंदर सिंह जब अधिकारों पर प्रेजेंटेशन दे रहे थे, तब भी मैं अपनी सोच में था और क़तई अधिकारों को समझने का प्रयास नहीं किया। मैं मानता हूं कि गीता का ज्ञान हर मानव समस्या का हल है, जो केवल कर्म प्रधान है।
भगवदगीता के दूसरे अध्याय के श्लोक 47 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' में जीवन का सार है। हमारा कार्य केवल कर्म करने का है, उसके फल पर हमारा अधिकार ही नहीं है।
हमारे देश में मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) का गठन किया गया। मानव कर्तव्य आयोग (Nation human Duties Commission ) नहीं बनाया गया। मैं आज यह जानने के लिए जिज्ञासु था कि ऐसा क्यों हुआ। शायद संविधान की यह मंशा रही हो कि राइट्स के लिये जो महाभारत हुई, वह महाभारत न हो।
लेकिन हम फंडामेंटल्स को नहीं भूल सकते। हमारा जीवन कर्म प्रधान है। कर्म पहले है, कर्तव्य पहले है। कमीशन तो पहले NHDC बनना चाहिए कि मानव के कर्तव्य क्या हैं, ताकि राइट्स के लिये लड़ना ही न पड़े। यदि आप चाहते हैं कि हमे क़ानून का लाभ मिले तो हमें क़ानून का पालन करना सीखना होगा। यह कैसे संभव है कि हम पालन तो न करें, लेकिन उसका लाभ लें।
यही कारण है कि हमारी निचली अदालतों से लेकर उच्च न्यायालयों तक में 4.55 करोड़ केस पेंडिंग हैं। इसका मतलब यह हुआ कि 4.55 करोड़ परिवार या फिर कहें कि लगभग 24 करोड़ लोग प्रभावित हैं। देश की 20 प्रतिशत जनता क़ानूनी पचड़ों और 20 से 25 प्रतिशत जनता कहीं न कहीं बीमार या फिर अस्पतालों में।
विकसित भारत बनाना है तो हमें इससे बाहर निकलना होगा। मुझे लगता है कि गीता का ज्ञान दिया जाता और मानवाधिकार आयोग के बजाय मानव कर्तव्य आयोग (एनएचडीसी) बनाया गया होता तो स्थिति कहीं बेहतर हो सकती थी।