राम मंदिर के शिखर पर धर्मध्वज स्थापित होना आत्म-गौरव पुनर्स्थापना का दिवस, अशोक सिंघल को शांति मिली होगी
अयोध्या में राम मंदिर के शिखर पर जब धर्मध्वज सुशोभित हुआ, पूरा परिसर एक अनोखी आध्यात्मिक तरंग से भर उठा। इसी पवित्र क्षण के बाद उपस्थित सनातनियों को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि आज का दिन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सदियों की तपस्या, संघर्ष और आस्था के सार्थक होने का दिन है। उन्होंने कहा कि अनगिनत लोग जिन्होंने राम मंदिर के स्वप्न के लिए अपना जीवन अर्पित किया, जिनमें अशोक सिंघल, महंत रामचंद्र दास परमहंस और अनेक अन्य शामिल हैं, आज उनकी आत्माओं को अवश्य शांति मिली होगी, क्योंकि मंदिर निर्माण की शास्त्रीय प्रक्रिया आज पूर्ण हो चुकी है।
संघ प्रमुख डॊ. मोहन भागवत ने धर्मध्वज की आध्यात्मिक महत्ता पर विस्तार से बोलते हुए कहा कि जिस ध्वज ने अतीत में दुनिया को शांति का संदेश दिया, आज वही ध्वज नीचे से उठकर मंदिर के शिखर तक स्थापित हुआ, हमारी परंपरा, साहस और धर्मनिष्ठा की यात्रा का प्रतीक बनकर। इसे हमने अपनी इसी देह से देखा। उन्होंने बताया कि इस ध्वज पर अंकित रघुकुल का प्रतीक कोविदार वृक्ष, जिसे कचनार और पारिजात की दिव्यता से भी जोड़ा जाता है, धर्म, मर्यादा और त्याग का चिह्न है।
अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि आज करोड़ों लोगों की आस्था मूर्त रूप में सामने है, और जिस प्रकार मंदिर के शिखर पर धर्मध्वजा फहराई गई है, उसी प्रकार सनातन धर्म की ध्वजा को भी विश्व के शिखर तक ले जाना हमारा कर्तव्य है।
भागवत ने कहा कि कभी भारत विश्वगुरु था, मगर आक्रांताओं ने हज़ार वर्षों तक इसे रौंदा। अब वह समय बीत चुका है और भारत अपनी विरासत, संस्कृति और गौरव को फिर से स्थापित करने के लिए तैयार है। उन्होंने इस दिन को भारत की सच्ची आज़ादी की स्थापना का क्षण बताया, जहां सदियों के संघर्ष के बाद आत्म-गौरव पुनर्जीवित हुआ है।
उन्होंने कामना की कि भारत पुनः विश्वगुरु बने और हर भारतीय अपने जीवन को सार्थक, धर्मनिष्ठ और कल्याणकारी दिशा में आगे बढ़ाए।