जापान कर सकता है भारत से रक्षा समझौता, चीनी खतरे में आस्ट्रेलिया से भी मदद की दरकार, अमेरिका पर अब भरोसा नहीं
जापान करीब आठ दशक बाद सुरक्षा के लिए अमेरिका से इतर दूसरे देशों का रुख कर रहा है। इसका प्रमुख कारण चीन को लेकर अमेरिका की विदेश नीति में आया बदलाव है। इसके अलावा अमेरिका हथियारों की भारी कमी से जूझ रहा है। इससे जापान भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से नजदीकी बढ़ा रहा है।
टोक्यो। चीन से बढ़ते खतरे के बीच जापान अपनी रक्षा क्षमताओं को बढ़ाने के लिए अमेरिका से अलग विकल्प पर विचार कर रहा है। पिछले 80 साल में यह पहली बार है, जब जापान अपनी सुरक्षा के लिए गैर अमेरिकी देशों का रुख कर रहा है। इसका प्रमुख कारण राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में चीन को लेकर अमेरिकी विदेश नीति में आया बदलाव है। अमेरिका इन दिनों चीन को लेकर काफी नरम है, जबकि वह मित्र देशों के प्रति आक्रामक रवैया अपना रहा है। इस कारण जापान, भारत और ऑस्ट्रेलिया के साथ रक्षा सहयोग को बढ़ा रहा है। इन्हीं संबंधों को मजबूत करने के लिए जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी भारत आए हुए हैं।
यूरेशियन टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, जापान इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में नए सुरक्षा साझेदार तलाश रहा है। ऑस्ट्रेलिया और भारत जैसे देश गहरे रक्षा सहयोग, संयुक्त औद्योगिक परियोजनाओं और क्षेत्रीय स्तर पर प्रतिरोध के लिए अहम साझेदार के तौर पर उभर रहे हैं। जापान ऑस्ट्रेलिया, भारत और अमेरिका के साथ गठबंधन का भी हिस्सा है। हालांकि, जैसे-जैसे क्वाड में अमेरिका की दिलचस्पी और प्रतिबद्धता कम हो रही है, टोक्यो ऑस्ट्रेलिया और भारत दोनों के साथ स्वतंत्र रक्षा साझेदारियां बना रहा है। माना जा रहा है कि जापानी रक्षा मंत्री का भारत दौरा इसी सहयोग को मजबूत करने से जुड़ा हुआ है।
शिंजिरो कोइजुमी के दौरे के दौरान भारत और जापान के बीच युद्धपोतों, स्टील्थ टेक्नोलॉजी और ड्रोन समेत कई नए रक्षा समझौतों पर हस्ताक्षर होने की संभावना है। जापानी रक्षा मंत्री ने मुंबई स्थित पश्चिमी नौसेना कमान का दौरा किया है। उन्होंने नौसेना प्रमुख एडमिरल कृष्ण स्वामीनाथन और पश्चिमी नौसेना कमान के प्रमुख वाइस एडमिरल संजय वत्स्यायन से मुलाकात की। उन्होंने भारत में स्वदेशी रूप से निर्मित गाइडेड-मिसाइल विध्वंसक पोत आईएनएस चेन्नई का निरीक्षण भी किया। 20 अगस्त को वे भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ द्विपक्षीय बैठक करेंगे।
कई रिपोर्टों में चेतावनी दी गई है कि यूक्रेन और ईरान युद्ध के कारण अमेरिका के लंबी दूरी के सटीक प्रहार करने वाले हथियारों और एयर डिफेंस मिसाइल की कमी से जूझ रहा है।क्वाडमाल हो चुका है। ऐसे में अमेरिका इन अहम हथियारों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए संघर्ष कर रहा है। इससे अमेरिका की रक्षा क्षमता पर सवाल उठने लगे हैं।
विशेषज्ञों का सवाल है कि क्या अमेरिका इस समय रूस और चीन जैसे लगभग बराबरी के प्रतिद्वंद्वियों के साथ लंबे समय तक चलने वाला युद्ध लड़ सकता है, या दक्षिण चीन सागर में किसी संघर्ष की स्थिति में जापान, दक्षिण कोरिया या ताइवान जैसे अपने सहयोगियों को हथियार सप्लाई कर सकता है? वहीं, यूरोप में, यूक्रेन पहले से ही पैट्रियट मिसाइल की सप्लाई की कमी से जूझ रहा है। उसके ज्यादातर पैट्रियट लॉन्चर खाली पड़े हैं। वहीं, रूस रोजाना बैलिस्टिक मिसाइलों से यूक्रेन के शहरों को निशाना बना रहा है।