चालाक अमेरिका और नाटो को अब उनके ही हाल पर छोड़ दो...
अमेरिका द्वारा भारत पर 25% टैरिफ लगाने की घोषणा के बाद भारत को अब अपने हित सर्वोपरि रखने चाहिए, न कि पश्चिमी शक्तियों के दबाव में आना चाहिए। रूस से सस्ते और भरोसेमंद संसाधन प्राप्त करना भारत के हित में है, और अमेरिका की नीतियाँ स्वार्थ से प्रेरित हैं।
-डॉ (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान-
अमेरिका अकेला नहीं है, जो अपने लिए मौकों का हमेशा इंतजार करता हुआ लगता है। उसका इंतजार आज खत्म हुआ, और उसने एक कारण ढूंढ कर भारत पर 25% टैरिफ (शुल्क) लाद दिया है (फिलहाल एक सप्ताह टाल दिया है)। यह ठीक वैसा ही है, जैसा कि हम यहां पिछले कई वर्षों से लगातार देखते आए हैं कि कुछ लोग इंतजार करते हैं कि ज़रा सी तेज़ हवा चल जाए, बारिश हो जाए, या पर्यावरण का कोई नया मुद्दा उछल जाए, तो आलू, प्याज, टमाटर के भाव फटाक से बढ़ जाते हैं। अमेरिका भी ऐसे ही किसी मुद्दे का इंतजार करता प्रतीत होता है।
ऐसा ही मुद्दा है रूस द्वारा पेट्रोलियम तेल और गैस की 'महा सेल' शुरू करने से पैदा हो रही परिस्थितियों का। याद करें कि वह अमेरिका और नाटो देशों के गठबंधन के बढ़ते दायरे का ही नतीजा था कि यूक्रेन नाटो के झांसे में उलझ गया। उससे पहले कुछ और देश नाटो और अमेरिका ने अपने ग्रुप में शामिल कर लिए थे, जबकि नाटो और अमेरिका का रूस के साथ समझौता था कि नाटो रूस की तरफ आगे नहीं बढ़ेगा। पर वो बढ़ता गया और यूक्रेन को बहलाने-फुसलाने-उकसाने लगा। तब शायद रूस को लगा कि पानी नाक के ऊपर जाने लगा है।
अमेरिका और नाटो ने अनेक प्रलोभन और वायदे दिए होंगे यूक्रेन को। मजबूत साथ और नाटो की ताकत भी, जिनकी वजह से उस रूसी गुट का राष्ट्र यूक्रेन, अमेरिका और नाटो के झांसे में फंसता चला गया। इतना कि नाटो और अमेरिका के बहकावे में रूस से दुश्मनी तक मोल ले ली।
अब जो भी हाल है यूक्रेन का, वह ठीक उसी तरह है जैसा लंका की जनता ने लंका-दहन के बाद कहा था कि, "एहीं अवसर को हमहि उबारा।"
लगता है अपने फायदे के अलावा अमेरिका को किसी भी बात का कोई फर्क नहीं पड़ता। हाल ही में जब चीन के थोड़ा सा खौंखियाने से उसने अपने वर्षों पुराने तरकश के तीर ‘ताइवान’ के राष्ट्रपति का अमेरिका में न्यूयॉर्क और वॉशिंगटन रुकते हुए दक्षिण अमेरिका जाने का कार्यक्रम रद्द करवा दिया। देखा जाए, तो वह अभी भी चाहता है कि ताइवान और अमेरिका के लिए भारत पहले भिड़े चीन से।
बात रूसी पेट्रोलियम और गैस की हो रही थी। इसी पर लौटते हैं। यदि नाटो के देश रूस से पेट्रोलियम उत्पाद और गैस अपनी ज़रूरत व क्षमता के हिसाब से लेते रहें, तो किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। पर यदि भारत उसी ‘सुपर सेल’ से देश के लिए कुछ रूस से हासिल करता है, तो आसमान फट जाता है। अमेरिका तब सबसे ज्यादा खुश होगा, जब तेल और गैस हम अमेरिका से ऊंचे दाम पर खरीदें, या किसी अन्य देश से- जो महंगा भी हो, आंखें तरेर कर दिया गया हो, और न जाने कब उससे सप्लाई बंद हो जाए।
भारत अपना फायदा देखेगा, या अमेरिका और नाटो का?
बोले तो एक समय वह भी था जब यूक्रेन खुले आम पाकिस्तान को हमारे खिलाफ जंगी सामान मुहैया करवा रहा था। अमेरिका तो पाकिस्तान को जंगी जहाज व अन्य जंगी सामान देता चला आया है, उसका क्या? नाटो के कुछेक देश पाकिस्तान को भारत के खिलाफ मदद करते आए हैं, तो उसका क्या?
भारत पर 'गजवा-ए-हिन्द' का भी प्रभाव लगातार है।
तो क्या भारत उन मुल्कों के भरोसे चले और देश की कमाई उनको दे जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हम पर 'गजवा-ए-हिन्द' में मददगार हैं?
भारत अब पहले अपनी सोचेगा, या जैसा दुनिया चाहती है कि किसी चौधरी की ही सुनता रहे? यह मोदी जी का देश है। मोदी जी यूक्रेन और रूस की लड़ाई रुकवाने की कई बार पहल कर चुके हैं। आज भी मोदी जी और भारत यूक्रेन और रूस की लड़ाई से दुखी हैं। मजबूर हैं कि हमारे अलावा कोई भी लड़ाई रुकवाना नहीं चाहता, और न यथास्थिति पर लौटते देखना चाहता है।
दीवाली पर पटाखे चलाने के लिए जैसे कोई बाहरी आकर बच्चों को पटाखे भेंट कर जाता है, और उसके दाम अपने बही-खाते में उधारी के लिख लेता है, वैसा ही आज यूक्रेन के साथ उसके मददगार लोग करते प्रतीत हो रहे हैं। यूक्रेन को उन्होंने अंदर से बुरी तरह से खोखला और कर्ज में डुबो कर रख दिया है। और उनके लहूलुहान हाथों में रूस के खिलाफ झंडा ऊंचा किए रखने की प्रेरणा दूर से कूट-कूट कर भर दी है।
यही तो उनकी कूटनीति है, जिसे भारत को समझना और जूझना होगा।
क्यों खरीदे भारत F-35, जब उससे बेहद सस्ते और बेहद ताकतवर रूसी विमान और हथियार भारत को रूस से मिल रहे हैं और साथ ही उनकी समग्र तकनीक भी? सबसे बड़ी बात, कि क्यों अब भी 2025 लगने के बाद भी भारत अमेरिका और नाटो की खौफ में रहे? वो 25 मिनट याद रखिए कि क्या-क्या कांड करके न रख दिए भारत ने। पूरा बदल चुका है भारत। मोदी जी ने बदल दिया है।
यह भी तनिक सोचिएगा कि अमेरिका और नाटो देशों से पिछले दो हजार वर्ष में अब तक भारत को आखिर क्या मिला है, और आगे क्या मिलने की उम्मीद है? आज हम परेशान से घूम रहे हैं कि हाय अब क्या होगा जब अमेरिका ने 25% शुल्क लगा दिया है भारतीय आयात पर।
कितना और झुकेगा भारत, और कब तक?
हमने अपने रुपये का इस हद तक अवमूलन कर दिया है कि जो वस्तु 100 रुपये की अमेरिका में उसके असली या लागत दाम पर मिलनी चाहिए थी, वह रुपये के अवमूलन के पश्चात केवल 10 या 20 रुपये में हम अमेरिका और नाटो देशों को पहुंचा रहे हैं, और वे सेठ साब गालियाँ देते हैं और शुल्क बढ़ाते जा रहे हैं।
रुपये को वापस अपना दमखम दिखाना होगा। एक डॉलर में 20 रुपये और उससे भी कम आना होगा। ब्रिक्स की करेंसी के लिए दुबारा इसी दर पर प्रयास करें। दो तरह के मापदंड वे जहां चाहें, चलाएंगे, और भारत को रोकेंगे।
ऐसा अब तो नहीं न चलेगा। जो वे हजारों साल से करते आए हैं, वही वे अब भी करते दिख रहे हैं, केवल अपने ही फायदे को देखते हैं।
उम्मीद है कि पाठकगण एक बार अमेरिका का ताइवान और यूक्रेन के लिए स्पोर्ट को पुनः देखेंगे, और आंकलन भी शायद करेंगे। और यह भी जानेंगे कि भारत ही वह देश है जिसने यूक्रेन और रूस का युद्ध रुकवाने के अथक प्रयास किए हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं। आप रॉयटर्स द्वारा सर्टिफाइड पत्रकार भी हैं।)