महाराष्ट्र की सियासत में विरासत बनाम रणनीतिः सुनेत्रा पवार की ताजपोशी के बाद शरद पवार की चूक और ‘अदृश्य हाथ’ की बहस तेज

महाराष्ट्र की राजनीति में अजित पवार के आकस्मिक निधन के बाद सत्ता और संगठन की जो तस्वीर उभरी, उसने शरद पवार जैसे अनुभवी रणनीतिकार को भी चौंका दिया है। जिस तेजी से सुनेत्रा पवार ने उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, उसने केवल भावनात्मक सहानुभूति नहीं, बल्कि ठोस राजनीतिक संदेश दिया कि विरासत खाली नहीं है। राजनीतिक गलियारों में अब यह सवाल तैर रहा है कि यह कदम स्वतःस्फूर्त था या किसी बड़ी रणनीति का हिस्सा?

Feb 2, 2026 - 22:12
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महाराष्ट्र की सियासत में विरासत बनाम रणनीतिः सुनेत्रा पवार की ताजपोशी के बाद शरद पवार की चूक और ‘अदृश्य हाथ’ की बहस तेज

शरद पवार की गणना में कहां चूक हो गई?

राजनीतिक जानकारों के अनुसार, शरद पवार यह मानकर चल रहे थे कि अजित पवार के न रहने की स्थिति में दोनों एनसीपी गुटों का विलय लगभग स्वाभाविक हो जाएगा। शायद उनका सोचना था कि अजित पवार की पार्टी के संगठन को अनुभवहीन नेतृत्व नहीं संभाल पाएगा, और अंततः पार्टी की बागडोर वरिष्ठ हाथों (शरद पवार) में लौटेगी। संभवतः इसी रणनीति के तहत शरद पवार ने बयान दिया कि अजित पवार पार्टी के दोनों धड़ों का विलय चाहते थे। इसी क्रम में यह भी कहा गया कि 12 फरवरी को दोनों गुटों का विलय तय हो चुका था। इसी अनुमान के आधार पर परिवार की बैठक बुलाई गई। लेकिन सुनेत्रा पवार का उस बैठक में न पहुंचना, और अगले ही दिन डिप्टी सीएम की शपथ, यह विलय को लेकर संकेतात्मक असहमति थी।

शपथ लेने की तत्परता ने यह साफ किया कि सुनेत्रा पवार के साथ ही अजित पवार के साथ कदमताल करने वाले नेताओं, प्रफुल्ल पटेल, छगन भुजबल आदि ने ‘अंतरिम व्यवस्था’ की भूमिका स्वीकार नहीं की। एनसीपी (अजित पवार) की ओर से शरद पवार को यह संदेश दे दिया गया कि वे केवल संवेदना की प्रतीक नहीं, बल्कि राजनीतिक उत्तराधिकारी हैं। इस कदम ने शरद पवार के उस नैरेटिव को काट दिया, जिसमें अजित पवार की विरासत अंततः उनके पास लौटती।

क्या यह अमित शाह की रणनीति थी?

महाराष्ट्र में एनसीपी के आंतरिक घटनाक्रम के पीछे क्या केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की रणनीति थी? यह प्रश्न इसलिए उठता है क्योंकि हाल के वर्षों में महाराष्ट्र में दल-विभाजन से सत्ता-संतुलन की रणनीति दिखी है। शिवसेना के बाद एनसीपी का विभाजन और अब यदि एनसीपी के दोनों गुटों के विलय की संभावना को शुरुआती चरण में ही निष्प्रभावी कर दिया जाना, तो क्या यह केंद्र की राजनीति के लिए अनुकूल परिदृश्य बनाता है?
सुनेत्रा पवार की त्वरित ताजपोशी से शरद पवार का ‘री-एंट्री प्लान’ कमजोर पड़ा और यही वह बिंदु है जहां राजनीतिक विश्लेषक एक अदृश्य समन्वय की आशंका जताते हैं।

शरद पवार का सुप्रिया सुले फैक्टर

शरद पवार की दीर्घकालिक योजना में केंद्र सरकार में सुप्रिया सुले की भूमिका अहम मानी जाती रही है। एनसीपी का विभाजन भी इसी बात को लेकर हुआ था जब शरद पवार ने अपनी बेटी सुप्रिया सुले को पार्टी की कमान सौंपने की कोशिश की थी जबकि अजित पवार युवावस्था से ही पार्टी के लिए धरातल पर काम कर रहे थे। अब भी शरद पवार की चिंता अपनी बेटी को लेकर है। वे चाहते हैं कि सुप्रिया सुले केंद्र की राजनीति में स्थापित हो जाएं। पार्टी के दोनों गुटों पर पुनः नियंत्रण के बिना यह संभव नहीं था। लेकिन घटनाक्रम की रफ्तार ने फिलहाल उस खिड़की को बंद कर दिया है।

यह पूरा प्रकरण बताता है कि महाराष्ट्र की राजनीति में अनुभव अब हथियार नहीं। समय, प्रतीक और निर्णायक कदम, तीनों ने मिलकर सुनेत्रा पवार को बढ़त दी। यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि इसके पीछे किसका हाथ था, लेकिन इतना स्पष्ट है कि शरद पवार की सबसे बड़ी हार दूसरे पक्ष की अप्रत्याशित गति से हुई।

SP_Singh AURGURU Editor