मायावती की मास्टरस्ट्रोक पॉलिटिक्स : अशोक सिद्धार्थ की वापसी से साबित हुई बेहतरीन पकड़

लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) सुप्रीमो मायावती ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि पार्टी के भीतर उनकी पकड़ और नेतृत्व को चुनौती देने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। भतीजे आकाश आनंद के ससुर और पूर्व सांसद अशोक सिद्धार्थ की सार्वजनिक माफी और फिर पार्टी में वापसी ने न सिर्फ़ संगठनात्मक स्तर पर अनुशासन और नेतृत्व की ताक़त को दिखाया है, बल्कि यह भी संदेश दिया है कि बीएसपी में अंतिम फैसला केवल और केवल मायावती का ही होता है।

Sep 7, 2025 - 11:43
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मायावती की मास्टरस्ट्रोक पॉलिटिक्स : अशोक सिद्धार्थ की वापसी से साबित हुई बेहतरीन पकड़

सार्वजनिक माफी और वापसी

अशोक सिद्धार्थ, जो फरवरी 2025 में गुटबंदी और विरोधाभासी गतिविधियों के आरोपों में पार्टी से बाहर कर दिए गए थे, ने सोशल मीडिया पर अपना सार्वजनिक माफीनामा जारी किया। उन्होंने स्वीकार किया कि उनसे जानबूझकर या दूसरों के प्रभाव में गलतियां हुईं। इसके साथ ही उन्होंने भविष्य में पार्टी अनुशासन में रहने का वचन भी दिया। मायावती ने इस पश्चाताप को स्वीकार कर उन्हें पुनः पार्टी में शामिल कर लिया।

मायावती का संदेश : अनुशासन सर्वोपरि

इस घटनाक्रम ने पार्टी कार्यकर्ताओं को साफ संदेश दिया है कि चाहे कोई कितना भी क़रीबी क्यों न हो, यदि वह अनुशासन तोड़ेगा तो सज़ा तय है। साथ ही यदि कोई गलती मानकर माफी मांगता है तो सुप्रीमो का दिल बड़ा भी है। यानी, बीएसपी में दंड और क्षमा दोनों का अधिकार मायावती के पास ही सुरक्षित है।

रणनीतिक पॉलिटिक्स और पंचायत चुनाव

विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला केवल भावनात्मक नहीं बल्कि रणनीतिक भी है। आगामी पंचायत चुनावों और 2027 में होने वाले विधान सभा चुनाव की तैयारियों के बीच मायावती ने अशोक सिद्धार्थ जैसे वरिष्ठ और अनुभवी दलित चेहरे को वापसी का अवसर देकर संगठन को मज़बूत करने का प्रयास किया है। इससे यह भी साफ़ हो गया है कि पार्टी की बिसात पर हर मोहरे को मायावती ही चलाती हैं।

आकाश आनंद और परिवारिक समीकरण

गौरतलब है कि अशोक सिद्धार्थ, मायावती के भतीजे और बीएसपी के राष्ट्रीय संयोजक आकाश आनंद के ससुर हैं। आकाश पहले ही अप्रैल में बसपा में वापसी कर चुके थे और 29 अगस्त को राष्ट्रीय संयोजक बनाए गए, जो पार्टी का दूसरा सबसे बड़ा पद है। सिद्धार्थ की वापसी से साफ़ है कि मायावती पारिवारिक समीकरणों को भी संतुलित रखते हुए पार्टी हित को प्राथमिकता देती हैं।

मायावती की पकड़ और जनाधार

इस पूरे घटनाक्रम से एक बात और भी स्पष्ट हो गई है कि बीएसपी में मायावती ही अंतिम निर्णयकर्ता हैं और उनका वजूद संगठन पर हावी है। कार्यकर्ताओं और नेताओं के लिए यह संकेत है कि जनाधार अब भी उन्हीं के पीछे है और पार्टी के भविष्य की दिशा तय करने का अधिकार उन्हीं के पास है।

अशोक सिद्धार्थ की वापसी मायावती की “मास्टरस्ट्रोक पॉलिटिक्स” का ताज़ा उदाहरण है। इससे न केवल पार्टी की अनुशासनात्मक व्यवस्था मज़बूत हुई है बल्कि यह भी सिद्ध हो गया है कि मायावती की मौजूदगी में बीएसपी को चुनौती देना असंभव है।

SP_Singh AURGURU Editor