नया आयकर अधिनियम-2025: अर्थव्यवस्था को नई गति तो देगा लेकिन सख्त प्रावधान बढ़ा सकते हैं मुश्किलें
नया आयकर अधिनियम-2025 भारत की कर व्यवस्था को सरल, पारदर्शी और डिजिटल बनाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। इससे मध्यम वर्ग को कर राहत, निवेश और उपभोग को बढ़ावा तथा कारोबारी माहौल को मजबूती मिलने की उम्मीद है। वहीं दूसरी ओर ऑडिट रिपोर्ट में देरी पर तय लेट फीस जैसे सख्त प्रावधान ईमानदार करदाताओं के लिए चिंता का विषय भी बन सकते हैं।
— पराग सिंहल —
नये आयकर अधिनियम-2025 का भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इस पहलू पर भी गंभीरता से विचार किया जाना आवश्यक है। कहा जा सकता है कि आयकर अधिनियम-2025 घरेलू उपभोग को बढ़ावा देने, कॉरपोरेट निवेश को सुव्यवस्थित करने और कर अनुपालन में सुधार के माध्यम से भारत की आर्थिक शक्ति को नई दिशा देने की पूरी क्षमता रखता है।
नये आयकर अधिनियम-2025 के माध्यम से सरकार ने व्यक्तिगत करदाताओं के लिए लगभग 12.75 लाख रुपये तक की आय को प्रभावी रूप से कर-मुक्त बनाते हुए कर राहत का दायरा बढ़ाया है। इससे मध्यम वर्ग की व्यय योग्य आय में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। परिणामस्वरूप घरेलू उपभोग को सीधा प्रोत्साहन मिलेगा, जो देश की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि का एक प्रमुख आधार है।
कॉरपोरेट कर ढांचे को भी अधिक तर्कसंगत बनाया गया है। विदेशी कंपनियों की कर दर 40 प्रतिशत से घटाकर 35 प्रतिशत किए जाने से भारत वैश्विक निवेशकों के लिए अधिक आकर्षक गंतव्य बन सकता है। इससे केंद्र सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ जैसी योजनाओं को भी नई गति मिलने की संभावना है।
अर्थ विशेषज्ञों का मानना है कि नया आयकर अधिनियम देश में ‘कर अनुपालन की संस्कृति’ को मजबूत करेगा। लगभग 64 वर्ष पुराने आयकर अधिनियम-1961 के स्थान पर आयकर अधिनियम-2025 लागू होने से नौकरशाही संबंधी जटिलताएं कम होंगी, मुकदमेबाजी घटेगी और स्वैच्छिक कर अनुपालन को बढ़ावा मिलेगा। इससे करदाताओं का दायरा बढ़ेगा और सरकार के राजस्व में दीर्घकालिक स्थिरता आएगी।
इस अधिनियम से छोटे व्यवसायों को भी राहत मिलने की संभावना है। किराये की आय और ब्याज जैसी मदों पर स्रोत पर कर कटौती (TDS) की सीमा बढ़ाने से छोटे कारोबारियों की तरलता और कार्यशील पूंजी में सुधार होगा।
नया आयकर अधिनियम-2025 प्रत्यक्ष कर व्यवस्था को आधुनिक बनाने की दिशा में एक व्यापक सुधार है। कर दरों में स्थिरता बनाए रखते हुए वेतनभोगी वर्ग पर कर का बोझ कम किया गया है। डिजिटल जांच व्यवस्था को और मजबूत बनाया गया है तथा पुरानी जटिल शब्दावली को भी सरल बनाया गया है।
नई कर व्यवस्था के अंतर्गत मानक कटौती (Standard Deduction) को बढ़ाकर 75,000 रुपये कर दिया गया है, जिसका लाभ बिना किसी अतिरिक्त दस्तावेज के लिया जा सकेगा। साथ ही धारा-87ए के अंतर्गत मिलने वाली कर छूट में वृद्धि के कारण प्रभावी कर-मुक्त आय सीमा लगभग 12 लाख रुपये तक पहुंच गई है।
पुराने कर स्लैब का पुनर्गठन करते हुए मध्यम वर्ग को कम कर दरों का लाभ दिया गया है। वहीं 20 लाख से 24 लाख रुपये तक की आय पर 25 प्रतिशत का नया कर स्लैब लागू किया गया है, जिसके बाद 30 प्रतिशत की दर प्रभावी होगी।
आयकर अधिनियम-2025 ने आयकर अधिनियम-1961 की कई जटिलताओं को समाप्त कर दिया है। कानूनी शब्दावली को सरल बनाया गया है, सैकड़ों अनावश्यक प्रावधान हटाए गए हैं और शब्दों की संख्या भी काफी कम कर दी गई है। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि ‘पिछला वर्ष’ (Previous Year) और ‘निर्धारण वर्ष’ (Assessment Year) जैसी जटिल अवधारणाओं को समाप्त कर ‘कर वर्ष’ (Tax Year) की एक समान व्यवस्था लागू की गई है। इससे भारत वैश्विक कर मानकों के और अधिक अनुरूप हो गया है।
सरलीकरण के साथ-साथ डिजिटल निगरानी को भी अधिक प्रभावी बनाया गया है। तलाशी एवं जब्ती की कार्रवाई के दौरान आयकर अधिकारियों को अब ई-मेल सर्वर, सोशल मीडिया अकाउंट और ऑनलाइन निवेश खातों जैसे डिजिटल माध्यमों तक कानूनी पहुंच का अधिकार होगा। आवश्यकता पड़ने पर वे एक्सेस कोड को भी ओवरराइड कर सकेंगे।
ऐसी स्थिति में करदाताओं के लिए यह आवश्यक होगा कि वे अपने सभी डिजिटल वित्तीय अभिलेख पूरी तरह व्यवस्थित और त्रुटिरहित रखें, ताकि भविष्य में किसी प्रकार की अनुपालन संबंधी समस्या उत्पन्न न हो।
प्रशासनिक बोझ कम करने के उद्देश्य से सरकार ने टीडीएस की कई सीमाओं में भी वृद्धि की है। उदाहरण के लिए वरिष्ठ नागरिकों के लिए बैंक ब्याज पर टीडीएस की सीमा बढ़ाकर एक लाख रुपये कर दी गई है, जबकि पेशेवर शुल्क पर टीडीएस की सीमा बढ़ाकर 50 हजार रुपये कर दी गई है।
हालांकि, नए अधिनियम के कुछ प्रावधान ऐसे भी हैं जो विशेष रूप से ऑडिट कराने वाले करदाताओं के लिए चिंता का कारण बन सकते हैं। आयकर अधिनियम-1961 की धारा-271बी का स्वरूप बदलते हुए नए अधिनियम में इसे निश्चित लेट फीस के रूप में लागू किया गया है। पहले जहां दंड का निर्धारण परिस्थितियों के अनुसार किया जाता था, वहीं अब निर्धारित समय सीमा के भीतर ऑडिट रिपोर्ट प्रस्तुत न करने पर निश्चित राशि का भुगतान करना होगा।
नये आयकर अधिनियम के अंतर्गत धारा-263 और धारा-428(सी) के तहत यदि कर लेखापरीक्षा (Tax Audit) रिपोर्ट समय पर प्रस्तुत नहीं की जाती है, तो एक महीने तक की देरी पर 75,000 रुपये तथा एक महीने से अधिक की देरी पर 1,50,000 रुपये की लेट फीस देनी होगी। यह व्यवस्था पुराने प्रतिशत आधारित दंड प्रावधान का स्थान लेती है और स्वतः लागू होगी।
यद्यपि समयबद्ध अनुपालन सुनिश्चित करने की दृष्टि से यह व्यवस्था प्रभावी मानी जा सकती है, लेकिन ऐसे ईमानदार करदाताओं के लिए यह आर्थिक रूप से कष्टदायक सिद्ध हो सकती है, जो सदैव समय पर आयकर रिटर्न दाखिल करते हैं, किंतु अपरिहार्य परिस्थितियों के कारण ऑडिट रिपोर्ट समय पर प्रस्तुत नहीं कर पाते।
ऐसी स्थिति में यदि धारा-263 एवं धारा-428(सी) के अंतर्गत निर्धारित लेट फीस को पूर्व व्यवस्था की भांति कारोबार (टर्नओवर) के आधार पर निर्धारित किया जाए, तो यह व्यवस्था अधिक व्यावहारिक, न्यायसंगत और करदाताओं के लिए स्वीकार्य सिद्ध हो सकती है।