सिर्फ कानून नहीं, समाज भी दे सजाः नकली दवा कारोबारियों का सामाजिक बहिष्कार ही असली दंड
शहर में नकली दवाओं का कारोबार अब गहरी जड़ें जमा चुका है। पिछले एक दशक में कई कारोबारी पकड़े गए, जेल भी गए, लेकिन कारोबार थमा नहीं। हैरानी यह है कि शहर का बड़ा कारोबारी तबका न केवल इन नक्कालों का बहिष्कार करने से कतराता है बल्कि निजी बातचीत में इनके लिए सहानुभूति तक जताता है। चंद व्यापारियों की यह सोच बेहद शर्मनाक है कि सिर्फ पैसा कमाओ। कैसे भी कमाओ। चाहे किसी को नकली दवा खिलाकर मौत के मुंह में क्यों न धकेलना पड़े। आगरा की कारोबारी छवि पर यह सबसे बड़ा कलंक है।
-बड़ा सवाल- आगरा की साख पर धब्बा लगाने वाले नकली कारोबारियों को धिक्कारने और अलग-थलग करने के लिए आगे क्यों नहीं आता व्यापारी समाज?
- एक बार को कानून के शिकंजे से तो बचा जा सकता है, लेकिन समाज की नफरत और धिक्कार से बच निकलने का कोई रास्ता नहीं होता, नक्काल सहानुभूति के पात्र नहीं
-एसपी सिंह-
आगरा। आगरा का नाम देश और दुनिया में ऐतिहासिक धरोहरों के साथ-साथ कारोबारी गतिविधियों के लिए भी जाना जाता है। लेकिन यह बेहद दुखद और चिंताजनक है कि यही आगरा अब नकली दवाओं के कारोबार का गढ़ बनता जा रहा है। पिछले एक दशक में यहां नकली दवा कारोबारियों के खिलाफ छापे, गिरफ्तारियां और जेल यात्राएं हुईं, पर यह धंधा रुका नहीं, बल्कि और ज्यादा संगठित होता जा रहा है।
कारोबारी समाज की चुप्पी सबसे खतरनाक
सबसे ज्यादा निराशा इस बात से है कि आगरा का एक बड़ा कारोबारी तबका इस गंदे धंधे के खिलाफ आवाज उठाने की बजाय खामोश बैठा है। इतना ही नहीं, निजी बातचीत में कई कारोबारी नकली दवा कारोबारियों के लिए चिंता जताते हैं और कहते हैं- ‘भई, फलां की मदद करो। वह मुसीबत में है।‘ यह सोच बताती है कि कारोबार का एकमात्र ध्येय पैसा कमाना रह गया है, चाहे उसके लिए नकली दवा बेचकर किसी के प्राण क्यों न लेने पड़ें।
सामाजिक बहिष्कार का असर कानून से ज्यादा
नकली दवाओं से लोगों की जान जा रही है। कोई भी कानून इन अपराधियों पर शिकंजा कस सकता है, लेकिन कानून के दांवपेंच अपनाकर वे अक्सर बच निकलते हैं। असल में सबसे बड़ा दंड सामाजिक बहिष्कार है। यदि कारोबारी समाज ही इन नक्कालों का सार्वजनिक बहिष्कार कर दे, तो यह सजा किसी भी कानूनी दंड से ज्यादा कड़ी और प्रभावी होगी। कानून से बचने की गुंजाइश हो सकती है, लेकिन समाज की नफरत और धिक्कार से बच निकलने का कोई रास्ता नहीं होता।
शहर में अभी तक कोई ऐसा उदाहरण सामने नहीं आया है, जब कारोबारी जगत ने शहर की कारोबारी छवि को बट्टा लगाने वाले किसी नकली दवा कारोबारी के पकड़े जाने पर उसे सामाजिक दंड दिया हो। नकली दवाओं के अलावा और भी वस्तुओं के नकली कारोबारियों के पकड़े जाने पर भी व्यापारी वर्ग ने अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी है।
नकली कारोबार सिर्फ दवाओं तक सीमित नहीं
दुखद सच्चाई यह है कि आगरा में नकली कारोबार सिर्फ दवाओं तक सीमित नहीं है। नकली मसाले, नकली घी, नकली मोबिल ऑयल और न जाने कितनी मिलावटी वस्तुएं यहां बन रही हैं। यह सब मिलकर आगरा की कारोबारी छवि पर ऐसा कलंक लगा रहे हैं, जिसे मिटाना आसान नहीं होगा।
ढिठाई और काली कमाई का खेल
नकली कारोबारियों की हिम्मत इतनी बढ़ चुकी है कि वे जेल जाकर भी सुधरते नहीं। वजह साफ है। यह कारोबार उन्हें रातोंरात करोड़पति और अरबपति बना देता है। काली कमाई के सहारे वे न केवल कानून से बच निकलते हैं, बल्कि समाज में रसूखदार भी बन जाते हैं। यही ढिठाई उनकी असली ताकत है।
पूर्वजों की बनाई साख को मिट्टी में मिला रहे चंद लोग
कारोबार में नैतिकता हमेशा से सबसे बड़ी पूंजी रही है। आगरा के कारोबारियों को यह नहीं भूलना चाहिए कि उनके पूर्वजों ने ईमानदारी, साख और नैतिक मूल्यों के सहारे ही इस शहर के बाजारों की प्रतिष्ठा बनाई थी। लेकिन अफसोस, आज उसी साख को कुछ लोग अनैतिक और गंदे कारोबार से धूल में मिला रहे हैं। और सबसे निराशाजनक बात यह है कि व्यापार जगत का एक बड़ा तबका इस सोच के साथ चुप्पी साधे बैठा है कि क्या हुआ, यह तो धंधा है। जब समाज का प्रभावशाली वर्ग गलत को गलत कहने का साहस भी खो दे, तो वह चुप्पी अपराध से भी बड़ा अपराध बन जाती है। कारोबार में नैतिकता का क्षरण केवल एक शहर नहीं, बल्कि पूरे समाज की आत्मा को खोखला कर देता है।
समाधान: कानून और समाज दोनों का प्रहार
अगर आगरा की कारोबारी छवि को बचाना है तो सिर्फ कानून से नहीं, समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। कड़ा कानून बनाकर नकली दवाओं का कारोबार करने वालों की संपत्ति जब्त हो और उन्हें लंबे समय तक जेल में रखा जाए। व्यापारी समाज को साफ-साफ खड़ा होना होगा और नकली कारोबारियों को हर मंच से धिक्कारना होगा।
कलंक को मिटाने के लिए खड़ा हो व्यापारी समाज
नकली दवा माफिया आगरा की पहचान को शर्मनाक ढंग से बदल रहा है। जब लोग स्वास्थ्य लाभ की उम्मीद में दवाएं खाते हैं और उसमें जहर परोसा जाता है, तो यह केवल अपराध नहीं, बल्कि इंसानियत के खिलाफ युद्ध है। सवाल यह है कि क्या आगरा का कारोबारी समाज अपनी आंखें खोलकर इस कलंक को मिटाने के लिए खड़ा होगा, या फिर आने वाली पीढ़ियां हमें इसी शर्मनाक पहचान के साथ याद करेंगी?