अंगदान: जीवन का अनमोल तोहफा, रूढ़िवाद और आस्थाओं को पीछे छोड़कर आगे बढ़ें

 13 अगस्त विश्व अंगदान दिवस अंगदान और अंग प्रत्यारोपण की महत्ता को रेखांकित करता है। एक अंगदाता आठ लोगों को नया जीवन दे सकता है, लेकिन भारत में मांग और उपलब्धता में भारी अंतर है। धार्मिक मान्यताओं, अज्ञानता और कानूनी जटिलताओं के कारण अंगदान की रफ्तार धीमी है। सरकार, संस्थाएं और चिकित्सक जागरूकता बढ़ाने व प्रक्रिया को आसान बनाने में जुटे हैं। अंगदान मानवता की सर्वोच्च सेवा है जो मृत्युपरांत भी जीवनदान देती है।

Aug 13, 2025 - 12:32
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अंगदान: जीवन का अनमोल तोहफा, रूढ़िवाद और आस्थाओं को पीछे छोड़कर आगे बढ़ें

आज यानि 13 अगस्त का दिन विश्व भर के लिए विशेष महत्व रखता है। अंगदान और अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में नए जीवन की शुरुआत का दिन है 13 अगस्त को मनाया जा रहा विश्व अंगदान दिवस। जब शरीर के अंग अपनी क्रियाशीलता खो देते हैं, तो जीवित रहना कठिन हो जाता है। ऐसे समय में चिकित्सा विज्ञान का चमत्कार, अंग प्रत्यारोपण, एक नया जीवन प्रदान करता है। यह केवल एक चिकित्सा प्रक्रिया नहीं, बल्कि मानवता की सर्वोच्च सेवा है।

चिकित्सा जगत के वे दिग्गज डॉक्टर, जो अपने ज्ञान और समर्पण से बीमारों के जीवन में आशा की लौ जलाते हैं, आज उन्हें हमारा सम्मान और सलाम। वे उन लोगों के लिए देवदूत साबित होते हैं जिनका शरीर किसी दुर्घटना, बीमारी या अन्य कारणों से टूट चुका होता है, पर अब वे एक स्वस्थ जीवन जी सकते हैं।

भारत में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय अंगदान दिवस 3 अगस्त को मनाया जाता है, पर विश्व अंगदान दिवस 13 अगस्त को भी इसी उद्देश्य से मनाया जाता है। अंगदान की महत्ता को समझाना और इसे बढ़ावा देना विश्व अंगदान दिवस का उद्देश्य है।

स्वस्थ व्यक्ति ही अंगदान के लिए उपयुक्त

स्वस्थ व्यक्ति ही अंगदान के लिए उपयुक्त होता है। एचआईवी, कैंसर, गंभीर संक्रमण, या अन्य गंभीर बीमारियों से पीड़ित व्यक्ति अंगदान नहीं कर सकते। 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्तियों के लिए अभिभावकों की सहमति जरूरी है। कोई रिश्तेदार अंगदान कर अपने रिश्तेदार को जीवनदान दे सकता है।  अंगदान दो प्रकार से होता है-

जीवित अंगदान- इसमें किडनी, बोन मैरो, लीवर का हिस्सा आदि परिजनों को दिया जा सकता है।

मृत्यु के बाद अंगदान- ब्रेन डेड घोषित व्यक्ति के अंगों का प्रत्यारोपण किया जाता है। इस प्रक्रिया को कैडेवर डोनर भी कहते हैं।

प्रौद्योगिकी और चिकित्सा के विकास ने अंग प्रत्यारोपण को सफल और सुरक्षित बना दिया है। ब्रेन डेड होने पर किडनी, लीवर, फेफड़े, पैंक्रियास, ओवरी, गर्भाशय, आंखें, हड्डी, त्वचा समेत कई दूसरे अंग ट्रांसप्लांट हो सकते हैं।

एक अंगदाता और आठ नए जीवन

क्या आप जानते हैं कि एक ही व्यक्ति के अंगों से आठ लोगों को नया जीवन दिया जा सकता है? यह मानवता की सबसे बड़ी सेवा है। पर अफसोस, भारत में अंगदान की मांग और उपलब्धता के बीच भारी अंतर है। किडनी के लिए 2 लाख वार्षिक मांग के मुकाबले केवल 6000 किडनियां ही उपलब्ध होती हैं। दिल की मांग 50 हजार है, पर मात्र 15 ही उपलब्ध हो पाते हैं।

रूढ़िवाद, धार्मिक आस्था और अज्ञानता: सबसे बड़ा रोड़ा

भारतीय समाज में अंगदान के प्रति धार्मिक मान्यताएं, अंधविश्वास और सामाजिक रूढ़िवाद इस सेवा के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा हैं। ब्रेन डेड व्यक्तियों के परिजनों का मनोबल टूट जाता है, कई बार जानकारी की कमी के कारण वे अंगदान से दूर भागते हैं। कानून की जटिलताएं, अस्पतालों और चिकित्सकों का डर, और परिजनों की भावनात्मक प्रतिक्रिया इस प्रक्रिया को और भी कठिन बना देती है।

भारत में भी आ रही जागरूकता, चल रहे प्रयास

खुशी की बात यह है कि कई सामाजिक संस्थाएं जैसे सूरत की ‘Donate Life’ इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर रही हैं। आगरा में भी अंगदान के लिए रजिस्ट्रेशन का कार्य और जागरूकता अभियान चल रहा है। Notto (राष्ट्रीय अंग और ऊतक प्रत्यारोपण संगठन) की वेबसाइट पर लोग आसानी से अपना रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं। एक अंग्रेजी अखबार भी इस दिशा में विज्ञापन और प्रचार कर लोगों को प्रेरित कर रहे हैं।

सरकार प्रत्यारोपण प्रक्रिया को सहज व सरल बनाए

अंगदान को बढ़ावा देने के लिए जरूरी है कि सरकार खर्च की चिंता किए बिना प्रत्यारोपण प्रक्रिया को सहज और सुलभ बनाए। मृत्यु के बाद अंग देने की प्रक्रिया में समय की बहुत बाध्यता होती है। मृत शरीर से अंग अलग करने से लेकर प्रत्यारोपण का समय बहुत सीमित होता है। कई दफा तो अंगदाता का त्याग निष्फल हो जाता है। इन बाधाओं को दूर करने के ले सरकार आगे आए। लावारिस शवों से अंगों का उपयोग अनिवार्य और पारदर्शी हो, और प्रत्येक सरकारी अस्पताल में टीशू बैंक बनाए जाएं। लखनऊ में एकमात्र सरकारी केंद्र जहां काडेवरिक ट्रांसप्लांट होता है, उसे और बढ़ावा देना होगा। आगरा में एसएन मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. प्रशांत गुप्ता द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयास सराहनीय हैं, जिनसे जल्द ही इस क्षेत्र में और प्रगति होगी।

अंगदान क्यों डराता है अस्पतालों को?

डॉक्टरों को कानूनी जटिलताओं, परिजनों के गुस्से, और ब्रेन डेड का सही निर्धारण करने में दिक्कत होती है। ब्रेन डेड का सही परीक्षण, दस्तावेजीकरण एक लंबी और तकनीकी प्रोसेस है। संसाधन और समय की कमी भी बड़ी बाधा है। ऐसे में प्राइवेट अस्पताल सेफ साइड रहना पसंद करते हैं। इन्हें दूर किया जाए। हालांकि ये सब चुनौतियां मिलकर भी मानवता की इस सेवा को नहीं रोक सकतीं। धीरे-धीरे जागरूकता बढ़ रही है।

आज आर्थिक तंगी और गरीबी के कारण कई गरीब लोग अंग बेचने को मजबूर हैं, जो एक भयावह स्थिति है। अंगदान को किसी भी कीमत पर व्यापार नहीं बनने देना चाहिए। प्राकृतिक तरीके से अंगदान ही सबसे बेहतर विकल्प है।

आप भी बनिए अंगदाता, दीजिए नया जीवन

अंगदान कोई डरावनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि मानवता की सबसे बड़ी सेवा है। यह न केवल जीवन बचाता है बल्कि मृत्युपरांत भी अमरता का प्रमाण बनता है। www.organdonationday.in पर जाकर आप अपना रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं और अपने परिवार व समाज को भी जागरूक कर सकते हैं।

अंत में......

याद रखें एक छोटा सा कदम, किसी के लिए जीवन भर की खुशी बन सकता है। रूढ़िवाद और धार्मिक भ्रांतियों को पीछे छोड़िए और अंगदान को अपनाइए। यह आपके लिए और समाज के लिए अमूल्य तोहफा है।

-राजीव गुप्ता- ‘जनस्नेही कलम से’

लोकस्वर, आगरा।

SP_Singh AURGURU Editor