आधुनिकता की दौड़ में भूख का विरोधाभास: थाली भरी, शरीर बीमार, कम खाना-कम रोग, ज्यादा खाना-ज्यादा मुसीबतें!!
आधुनिक जीवनशैली में हर समय खाने की आदत, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड भोजन और बैठा हुआ जीवन डायबिटीज़ व अन्य लाइफस्टाइल रोगों की जड़ हैं। भारतीय परंपरा में सीमित, समयानुकूल और सादा भोजन शरीर के अनुकूल था। आज विज्ञान भी उसी संतुलन- कम, सही समय पर और साबुत भोजन की पुष्टि कर रहा है। असली समाधान इतिहास को कोसना नहीं, बल्कि खाने पर नियंत्रण वापस लेना है।
-बृज खंडेलवाल-
ठीक दोपहर 1 बजे पारसनाथ की स्मार्टवॉच फिर कांपती है, लंच टाइम।
45 वर्षीय पारसनाथ मुंबई में सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। सुबह नाश्ता, बीच में स्नैक, दोपहर लंच में चावल-राजमा, शाम को बिस्कुट-चाय, रात को भारी डिनर विद ड्रिंक्स। कैलेंडर भरा है, और पेट भी। पर शरीर थका हुआ है। शुगर बढ़ती जा रही है। वे भारत के उस बढ़ते वर्ग में शामिल हैं, जहां डायबिटीज विद बीपी अब “बीमारी” नहीं, रूटीन बन चुकी है। ताज़ा अनुमानों के मुताबिक भारत में 10 करोड़ से अधिक लोग डायबिटीज से जूझ रहे हैं और 2030 तक यह संख्या और बढ़ने वाली है।
क्या यह व्यक्तिगत लालच है? या विरासत में मिली बीमारी? जवाब प्लेट से आगे है, घड़ी, बाज़ार और हमारी बदली हुई भूख में। कभी भारत में लोग भूख के संकेत पर खाते थे, अलार्म पर नहीं। सूरज उगता था तो काम शुरू होता, ढलता था तो रसोई बंद। खेत, जंगल और कारीगरी में शरीर रोज़ 10–12 हज़ार कदम चलता। भोजन सादा था, मोटा अनाज, ज्वार, बाजरा, रागी; मौसमी सब्ज़ियां, थोड़ी छाछ, थोड़ा घी। रात का खाना हल्का या कई बार छोड़ा हुआ। उपवास कोई “डिटॉक्स ट्रेंड” नहीं था, शरीर को आराम देने की परंपरा थी। परिणाम, दुबले बदन, मजबूत मांसपेशियां, और जीवनशैली रोग अपवाद।
फिर औपनिवेशिक दौर आया। अंग्रेज़ों ने सिर्फ़ ज़मीन नहीं छीनी, समय भी छीन लिया। फैक्टरियों को टाइम-टेबल चाहिए था, रेलवे को घड़ी देखकर काम करने वाले मज़दूर। तीन टाइम का खाना, डबल रोटी, ब्रेकफास्ट, लंच, डिनर, अनिवार्य बना। मोटे अनाज पीछे छूटे; गेहूं-चावल आगे आए, भंडारण आसान, टैक्स आसान, नियंत्रण आसान। रसोई बाज़ार में बदली, इंसान प्रोडक्शन यूनिट में। यह न्यूट्रिशन साइंस नहीं, आर्थिक असेंबली लाइन थी। 1947 में आज़ादी आई, पर सिस्टम वोही रह गया।
ग्रीन रेवोल्यूशन ने भूख से लड़ाई जीती, अकाल थमे, उम्र बढ़ी। पर थाली एकरंगी हो गई। रिफाइंड कार्ब्स हावी हुए। शहर फैले, शरीर बैठ गया। आज औसत शहरी भारतीय 4,000 कदम भी नहीं चलता, खेती के दौर के आधे से भी कम। और चुपचाप रोग भीतर आ गए, मोटापा, हाई बीपी, फैटी लिवर, हार्ट अटैक। अस्पताल बढ़े, फार्मा और इंश्योरेंस फले-फूले। हम बैटरी बन गए, खाओ–काम करो–दवा लो–दोहराओ।
फिर भी कहानी काली-सफेद नहीं। औपनिवेशिक भारत स्वर्ग नहीं था। असमानता और भूख थी। ग्रीन रेवोल्यूशन ने जानें बचाईं। समस्या तीन टाइम खाना नहीं, हर समय खाना है, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड, मीठे पेय, देर रात डिलीवरी और बैठे रहने की आदत। दक्षिण एशियाई जीन कमी के लिए ढले थे। बहुतायत में वे घुटते हैं। यही वजह है कि एक ही कैलोरी पर हमारा जोखिम ज़्यादा दिखता है।
आज विज्ञान परंपरा की ओर लौट रहा है, सबूतों के साथ। इंटरमिटेंट फास्टिंग से इंसुलिन संवेदनशीलता सुधरती है; मोटे अनाज फाइबर और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स देते हैं। जल्दी डिनर और पर्याप्त नींद मेटाबॉलिज्म को सहारा देती है। यह नॉस्टैल्जिया नहीं, डेटा है।
किरण यह जानती हैं। न्यूट्रिशनिस्ट हैं, खुद पीसीओएस से गुज़रीं। उन्होंने घड़ी नहीं, धूप सुननी शुरू की, देर से ब्रंच, जल्दी डिनर, रागी-ज्वार, हफ्ते में एक उपवास। इतिहास को दोष देना मक़सद नहीं, वे कहती हैं, कंट्रोल वापस लेना है।
उधर पारसनाथ भी बदल रहे हैं, दो टाइम भोजन, स्नैक्स कम, मीठी चाय सीमित, शाम की वॉक। दवाइयां घट रही हैं, कदम हल्के हैं।
हमारी खाने की आदतें शहरीकरण और ग्लोबलाइजेशन से उलट-पुलट हो गईं। जहां पुरखे दो भरपेट थालियों से संतुष्ट थे, आज हम मीटिंग में चिप्स चबाते हैं, हर घंटे मीठा पीते हैं। यह बदलाव सिर्फ़ “व्यस्त जीवन” नहीं, बड़े फूड ब्रांड्स की आक्रामक मार्केटिंग है, जो शेल्फ़ अल्ट्रा-प्रोसेस्ड चीज़ों से भर देती है, छिपी शुगर, ट्रांस फैट, और लत लगाने वाले फ्लेवर।
खाने का चुनाव भी यही दिखाता है: रागी की रोटियां पिज़्ज़ा-बर्गर से बदलीं; मौसमी फल एनर्जी ड्रिंक्स और इंस्टेंट नूडल्स से। दिल्ली की गलियों में जहां ठेले पर अमरूद मिलता था, वहां आज कैन वाली मिठास है, सुविधा का वादा, पोषण गायब।
लाइफस्टाइल रोगों की जड़ में एक जहरीला त्रिकोण है, डेस्क से बंधी नौकरियां, आनुवंशिक संवेदनशीलता, और कॉर्पोरेट मुनाफ़ा। बेंगलुरु की एक टेक प्रोफेशनल देर रात हाई-कार्ब बिरयानी डिलीवरी को अपनी बढ़ती इंसुलिन समस्या से जोड़ती हैं, दादी की हल्की खिचड़ी से कितना अलग!
रास्ता क्या है? पुरखों की हिकमत को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ना, साबुत खाना प्राथमिकता, खाने को शरीर की लय से जोड़ना, देर रात से बचना, रोज़ चलना, और “हमेशा कुछ न कुछ खाने” के जाल से निकलना।
तो असली सवाल पूछिए, ज्यादा खाने से किसे फ़ायदा होता है? और कम या नियंत्रित भोजन से कौन जीतता है।