माघ मेला विवाद के बहाने योगी सरकार के भीतर खुला ‘पावर प्ले’, शंकराचार्य विवाद या डिप्टी सीएम बनाम सीएम की शतरंज?

प्रयागराज माघ मेले में एक टकराव के रूप में शुरू हुआ विवाद अब उत्तर प्रदेश की सत्ता के गलियारों में रणनीति बनाम रस्साकशी का रूप लेता दिख रहा है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद, उनके शिष्यों, पुलिस, माघ मेला प्रशासन के बीच हुए विवाद के लगभग शांत होने के बाद अब उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक के ताज़ा बयान ने एक बार फिर हलचल पैदा कर दी है। पाठक के बयान ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यह सब एक सोची-समझी राजनीतिक स्क्रिप्ट है या फिर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनके दोनों डिप्टी सीएम के बीच शह और मात का खुला खेल? लखनऊ प्रवास के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत से पहले सीएम योगी आदित्यनाथ की लम्बी मुलाकात और फिर इसके बाद दोनों डिप्टी सीएम की मुलाकात को भी इसी विवाद से जोड़कर देखा जा रहा है।

Feb 21, 2026 - 20:13
 0
माघ मेला विवाद के बहाने योगी सरकार के भीतर खुला ‘पावर प्ले’, शंकराचार्य विवाद या डिप्टी सीएम बनाम सीएम की शतरंज?

माघ मेले के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्यों (बटुकों) की यह जिद कि वे संगम नोज तक पालकी से ही जाएंगे, प्रशासन के लिए चुनौती बन गई थी। भारी भीड़ और संभावित हादसे की आशंका के बीच पुलिस द्वारा केवल 50 मीटर पैदल चलने का अनुरोध किया गया था, लेकिन टकराव टल नहीं सका। धक्का-मुक्की के बाद हुई पुलिसिया कार्रवाई और कथित रूप से बटुकों की शिखा खींचे जाने के आरोप ने धार्मिक भावनाओं को सीधे छू लिया और इस मामले ने नया मोड़ ले लिया।

इस विवाद के बाद माघ मेला प्रशासन द्वारा जारी नोटिस ने विवाद को नया आयाम दिया। प्रशासन का सवाल सीधा था- जब शंकराचार्य पद को लेकर मामला अदालत में विचाराधीन है, तो स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद किस हैसियत से अपने पंडाल पर ‘शंकराचार्य’ का बोर्ड लगाए हुए हैं? यही वह बिंदु है, जहां से सरकार और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद खुलकर आमने-सामने आ गये थे।

योगी दे चुके हैं स्पष्ट संदेश

इसी विवाद में सपा और कांग्रेस ने भी एंट्री मारी तो हाल ही में विधानसभा के भीतर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बिना लाग-लपेट साफ कर दिया-  अगर समाजवादी पार्टी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य मानती है तो माने और पूजे, लेकिन सरकार उन्हें वैध शंकराचार्य नहीं मानती।
इससे पहले मुख्यमंत्री का ‘कालनेमि’ वाला बयान यह संकेत था कि इस पूरे प्रकरण में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा लगातार पैदा की जा रही असहज स्थिति को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का धैर्य जवाब दे चुका है।

डिप्टी सीएम की दूसरी लाइन?

इस पूरी कहानी में ट्विस्ट उस समय आ गया था जब प्रशासन से विवाद के बाद स्वामी मुक्तेश्वरानंद माघ मेले में ही धरने पर बैठ गये थे और इसके बाद डिप्टी सीएम केश प्रसाद मौर्य ने बयान दिया- भगवान शंकराचार्य के चरणों में प्रणाम है, वे धरना समाप्त कर संगम में स्नान करें। यह बयान कई बार दोहराया गया, जिससे आम लोगों के बीच यह सवाल पैदा हुआ कि क्या डिप्टी सीएम ने सीएम योगी के खिलाफ अलग लाइन ले रखी है या फिर वे एक रणनीति के तहत ऐसा बयान दे रहे हैं।

अब बृजेश पाठक का ‘कंकड़’

अब जबकि माघ मेला भी समाप्त हो चुका है और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद भी पिछले कुछ समय से कुछ नहीं बो रहे थे, अचानक यूपी के डूसरे डिप्टी सीएम बृजेश पाठक ने अचानक बयान दे दिया- माघ मेला में बटुकों की शिखा खींचना महापाप था, दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए। इतना ही नहीं, अगले ही दिन उन्होंने बटुकों को अपने सरकारी आवास पर बुलाकर उनका सम्मान भी किया।
पाठक का यह कदम न सिर्फ प्रशासन बल्कि खुद मुख्यमंत्री की पहले से तय लाइन के बिल्कुल उलट नजर आया।

रणनीति या सत्ता संघर्ष?

माघ मेले के दौरान उठे इस विवाद में बृजेश पाठक के बयान तक का पूरा घटनाक्रम महज़ संयोग नहीं लगता। एक ओर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद लगातार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ़ बेहद तीखे और आक्रामक बयान देते आ रहे हैं। ऐसे में जब स्वयं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर से उनके बयानों पर प्रतिक्रिया आती है, तो तस्वीर का दूसरा पहलू चौंकाने वाला दिखाई देता है। राज्य के दोनों उपमुख्यमंत्री शंकराचार्य के प्रति न केवल नरम रुख अपनाते हैं, बल्कि टकराव से बचते हुए संतुलित भाषा में बात करते हैं।

यही विरोधाभास सवाल खड़े कर रहा है। क्या स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को पहले खुलकर बोलने दिया जाना, फिर उन्हें ‘राजनीतिक संत’ की श्रेणी में रखकर उनकी विश्वसनीयता सीमित करना एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति है, जिसमें मुख्यमंत्री सख़्त भूमिका निभाते हैं और डिप्टी सीएम ‘सॉफ्ट काउंटर’ बनकर सामने आते हैं?
या फिर यह व्यवहार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और दोनों उपमुख्यमंत्रियों के बीच लंबे समय से चली आ रही अंदरूनी सत्ता खींचतान और वैचारिक दूरी का परिणाम है?

पिछले कुछ वर्षों में योगी और डिप्टी सीएम के बीच मतभेद और तल्खी की चर्चाएं समय-समय पर सामने आती रही हैं। क्या माघ मेला विवाद ने उस अदृश्य तनाव को एक बार फिर उजागर कर दिया है। इसलिए यह सवाल अब और प्रासंगिक हो जाता है कि क्या यह सब एक साझा रणनीतिक स्क्रिप्ट का हिस्सा है, या फिर सत्ता के भीतर चल रही अलग-अलग राजनीतिक और धार्मिक निवेशों की खुली अभिव्यक्ति।

शह अभी बाकी है

यह मान लेना जल्दबाज़ी होगी कि दोनों डिप्टी सीएम के बयान सिर्फ एक चूक थी। जिस तरह से एक डिप्टी सीएम के बयान समय-समय पर आए, जिस तरह दूसरे डिप्टी सीएम की लम्बी चुप्पी और फिर अचानक सक्रियता दिखना, वह इशारा करती है कि या तो यह एक मल्टी-लेयर राजनीतिक रणनीति है या फिर योगी सरकार के भीतर नेतृत्व और लाइन को लेकर असहजता।

फिलहाल इतना तय है कि यह विवाद माघ मेले में खत्म नहीं हुआ। यह सत्ता की चौपाल में अब भी जिंदा है और अगली चाल किसकी होगी, यह देखना बाकी है।

SP_Singh AURGURU Editor