संगठन की मरम्मत संग 2027 की बिसात: मायावती के साइलेंट रीबूट में छिपी है बसपा की वापसी की पूरी रणनीति

बहुजन समाज पार्टी की राजनीति पिछले कुछ सालों से संक्रमण के दौर में है, लेकिन इस बार सालों का यह संक्रमण सुनियोजित पुनर्गठन का संकेत दे रहा है। पार्टी सुप्रीमो मायावती ने यह भांप लिया है कि केवल अतीत की उपलब्धियों के सहारे भविष्य की लड़ाई नहीं जीती जा सकती। इसी समझ के तहत उन्होंने अपने भतीजे आकाश आनंद को फील्ड में उतारकर पार्टी को स्पष्ट उत्तराधिकारी और स्पष्ट नेतृत्व का संदेश दे दिया है। पार्टी में ‘नंबर दो’ की हैसियत देकर मायावती ने न सिर्फ संगठन की असमंजस की स्थिति खत्म की है, बल्कि कैडर को यह भरोसा भी दिया है कि बसपा की कमान अब एक तय दिशा में आगे बढ़ रही है।

Feb 7, 2026 - 14:01
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संगठन की मरम्मत संग 2027 की बिसात: मायावती के साइलेंट रीबूट में छिपी है बसपा की वापसी की पूरी रणनीति

आकाश आनंद की भूमिका केवल प्रतीकात्मक नहीं है। वह जमीनी दौरे कर रहे हैं, कार्यकर्ताओं से संवाद कर रहे हैं और उस वोट बैंक को फिर से सक्रिय करने की कोशिश में हैं, जो पिछले कुछ चुनावों में निष्क्रिय होता गया था। बिहार विधानसभा चुनाव में भले ही बसपा को सीमित सफलता मिली हो, लेकिन वहां मिला वोट प्रतिशत मायावती के लिए एक मनोवैज्ञानिक संकेत था कि पार्टी का सामाजिक आधार पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। यही वजह है कि अब पूरा फोकस उत्तर प्रदेश पर केंद्रित कर दिया गया है।

मायावती की रणनीति दो-स्तरीय दिखाई देती है। एक तरफ आकाश आनंद मैदान में संगठन और मतदाताओं के बीच ऊर्जा भरने का काम कर रहे हैं, दूसरी ओर मायावती लखनऊ से संगठनात्मक ढांचे को कसने में जुटी हैं। हालिया बैठक, जिसका औपचारिक एजेंडा एसआईआर था, असल में पार्टी कैडर को फिर से सक्रिय करने और चुनावी मोड में लाने का अभ्यास थी। 403 विधानसभा सीटों के प्रभारियों और भाईचारा कमेटियों को बुलाकर यह साफ कर दिया गया कि बसपा अब ऊपर से नीचे तक एकसाथ काम करना चाहती है।

मायावती का यह भी स्पष्ट संदेश है कि 2027 का चुनाव बसपा अकेले अपने दम पर लड़ेगी। यह फैसला गठबंधन राजनीति से मोहभंग और अपने कोर वोट बैंक पर दोबारा भरोसे की रणनीति को दर्शाता है। वह जानती हैं कि बसपा की ताकत हमेशा उसका संगठित कैडर और अनुशासित वोट रहा है। इसी कारण बूथ स्तर पर इकाइयों को मजबूत करने, वोट कटने से रोकने और एसआईआर पर विशेष नजर रखने के निर्देश दिए गए हैं।

इस पूरी कवायद का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि मायावती भाजपा और सपा दोनों को एक ही तराजू पर रखकर चुनौती दे रही हैं। उनका संदेश साफ है कि अगर संगठन मजबूत हुआ और कार्यकर्ता पूरी ताकत से मैदान में उतरे, तो कोई भी दल बसपा को सत्ता में लौटने से नहीं रोक सकता। यह आत्मविश्वास केवल बयानबाज़ी नहीं, बल्कि उस दौर की याद दिलाने की कोशिश है जब बसपा ने 2007 में पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई थी।

कुल मिलाकर, मायावती का यह साइलेंट रीबूट बसपा की राजनीति को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश है, जहां उत्तराधिकारी तय है, संगठन अनुशासित किया जा रहा है और चुनावी लड़ाई की तैयारी अभी से शुरू हो चुकी है। 2027 की राह लंबी है, लेकिन मायावती ने साफ कर दिया है कि यह सफर वह पूरी रणनीति और धैर्य के साथ तय करेंगी।

SP_Singh AURGURU Editor