राहुल गांधी के मुंह से बिट्टू के लिए निकले ‘गद्दार’ शब्द ने कांग्रेस को मुसीबत में डाला, सिख अस्मिता से जोड़ नेता प्रतिपक्ष को घेरने में जुटी भाजपा
संसद के मकर द्वार पर घटी एक क्षणिक घटना अब क्षण भर की उत्तेजना से निकलकर दीर्घकालिक राजनीतिक विमर्श में बदलती दिख रही है। कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी द्वारा केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को खुलेआम गद्दार कहे जाने की टिप्पणी ने राजनीति के कई संवेदनशील तार एक साथ छेड़ दिए हैं- संसद की मर्यादा, सिख अस्मिता, राष्ट्रवाद की परिभाषा और आने वाले चुनावों की रणनीति।
यह महज शब्दों का टकराव नहीं था। यह वह क्षण था, जब संसद के प्रवेश द्वार पर खड़ा नेता प्रतिपक्ष, अपने ही विरोध के आवेग में, उस रेखा को पार करता दिखा जिसे भारतीय राजनीति में बेहद सावधानी से लांघा जाता है। रवनीत सिंह बिट्टू का पलटकर दिया गया जवाब- मैं देश के दुश्मनों से हाथ नहीं मिलाता, इस टकराव को व्यक्तिगत से वैचारिक स्तर पर ले गया।
भाजपा की रणनीति: व्यक्ति नहीं, पहचान
इस घटना के तुरंत बाद भाजपा ने जिस तरह प्रतिक्रिया दी, उससे स्पष्ट हो गया कि पार्टी इसे व्यक्तिगत अपमान तक सीमित नहीं रखेगी। भाजपा के सिख नेताओं ने एक स्वर में राहुल गांधी की टिप्पणी को सिख समाज के अपमान से जोड़ दिया। यही वह मोड़ है, जहां भाजपा ने इस विवाद को पहचान की राजनीति में बदलने का निर्णय लेने में देरी नहीं की।
राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्वयं इस मुद्दे का उल्लेख करना केवल बिट्टू को नैतिक समर्थन नहीं था, बल्कि एक राजनीतिक संकेत था कि पार्टी इस प्रकरण को हल्के में नहीं लेने जा रही। प्रधानमंत्री का हस्तक्षेप बताता है कि भाजपा इसे राष्ट्रव्यापी विमर्श बनाना चाहती है, खासकर उत्तर भारत में, जहां सिख समुदाय का सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव निर्णायक रहा है।
पंजाब का साया और 2027 की तैयारी
रवनीत सिंह बिट्टू का राजनीतिक और पारिवारिक बैकग्राउंड इस मुद्दे को और धार देता है। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री शहीद बेअंत सिंह के पौत्र होने के कारण बिट्टू का नाम आतंकवाद-विरोधी संघर्ष की स्मृति से जुड़ा है। ऐसे व्यक्ति को गद्दार कहे जाने को भाजपा इतिहास के अपमान के रूप में प्रस्तुत कर रही है।
यही वजह है कि भाजपा इस मुद्दे को पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 की जमीन तैयार करने के रूप में भी देख रही है। सिख अस्मिता, शहादत और राष्ट्रवाद, इन तीनों को जोड़कर भाजपा एक ऐसा नैरेटिव गढ़ रही है, जो कांग्रेस को रक्षात्मक मुद्रा में धकेल सकता है।
कांग्रेस की चुप्पी: रणनीति या भ्रम
इस पूरे घटनाक्रम में कांग्रेस की ओर से अब तक कोई ठोस प्रतिक्रिया या नैरेटिव सामने नहीं आया है। यह चुप्पी या तो रणनीतिक मौन है, या फिर स्थिति की गंभीरता को कम आंकने का संकेत। दोनों ही स्थितियां कांग्रेस के लिए जोखिम भरी हैं, क्योंकि भाजपा इस खाली स्थान को अपने संदेश से भरने में जुट चुकी है। हालांकि कांग्रेस के कुछ सिख सांसदों ने जरूर राहुल गांधी का बचाव करने की कोशिश की है, लेकिन वे सांसद भी शायद इस बात को समझ रहे हैं कि राहुल गांधी ने सिख समाज को आहत करने वाली टिप्पणी कर दी है।
यदि कांग्रेस ने समय रहते इस बयान को संदर्भ, व्याख्या या खेद के जरिए संतुलित नहीं किया, तो यह विवाद एक टिप्पणी से आगे बढ़कर स्थायी राजनीतिक टैग बन सकता है, जिसका असर केवल संसद तक सीमित नहीं रहेगा।
शब्दों की कीमत और राजनीति का विस्तार
यह प्रकरण यह भी बताता है कि भारतीय राजनीति में शब्द केवल अभिव्यक्ति नहीं होते, वे पहचान, इतिहास और भविष्य को भी प्रभावित करते हैं। भाजपा ने राहुल गांधी की टिप्पणी को एक अवसर में बदलने का संकेत दे दिया है, सड़कों से संसद तक, और उत्तर भारत से पंजाब तक। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह मुद्दा केवल राजनीतिक ताप बढ़ाकर ठंडा पड़ जाएगा, या फिर 2027 की चुनावी धुरी में बदल जाएगा।