भारत की नीति का विरोधाभास: छद्म समाजवाद से लोलुप पूंजीवाद तक

शिक्षा में गैर बराबरी, मेडिकल सुविधाओं में असमानता, लाइफ स्टाइल्स, सामाजिक आर्थिक भेदभाव, एक तरफ हवाई अड्डे, बुलेट ट्रेंस, एक्सप्रेसवेज, दूसरी तरफ पब्लिक ट्रांसपोर्ट की दुर्दशा, पैदल, साइकिल वाले, शेयर टेम्पो, लोकल पैसेंजर ट्रेंस की अमानवीय हालत, ये सब इशारे हैं कि हम संविधान के उद्देशिका में लक्षित सोशलिज्म के रास्ते से दूर हो रहे हैं। जातिवाद नष्ट होने की जगह पोषित हो रहा है। असहनीय भ्रष्टाचार अब स्वीकारित होने लगा है।

Jul 8, 2025 - 14:28
Jul 8, 2025 - 14:31
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भारत की नीति का विरोधाभास: छद्म समाजवाद से लोलुप पूंजीवाद तक

भारत में नीतिगत बदलाव

1991: आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत

सार्वजनिक क्षेत्र का एकाधिकार टूटा

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) का आगमन

सरकारी कंपनियों का निजीकरण

व्यापार में खुलापन

लाइसेंस राज खत्म

निजी क्षेत्र का उत्थान

शेयर बाजार में तेज़ी

2017 में जीएसटी लागू

व्यापार करने में सुगमता सुधार

-बृज खंडेलवाल-

विगत पांच जुलाई को नागपुर में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का बयान भारत की आर्थिक नीतियों में छिपे गहरे टकराव या विरोधाभास के संकेतों को उजागर करता है। उन्होंने कहा कि एक ओर कुछ उद्योगपति अपार संपत्ति के मालिक हैं, वहीं करोड़ों लोग गरीबी की दलदल में फंसे हैं। उन्होंने यह भी बताया कि जहां खेती ग्रामीण भारत के 65-70% लोगों को रोज़गार देती है, वहाँ उसका जीडीपी में योगदान महज़ 12% है, जबकि उद्योग और सेवा क्षेत्र मिलकर 75% से अधिक योगदान करते हैं। गडकरी ने सहकारी क्षेत्र और ग्रामीण आमदनी के नए मॉडल जैसे डेयरी की बात की, लेकिन यह उनके ही दल की नीतियों से टकराती दिखती है, जो संविधान के “समाजवादी” शब्द का मज़ाक उड़ाते हुए पूंजीवादी रास्ते पर दौड़ रही है।

भारत का संविधान देश को “सम्प्रभु समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य” कहता है, लेकिन समाजवाद अब एक खोखला नारा बनकर रह गया है। डॉ. राममनोहर लोहिया के सपनों का समाज—जहां संपत्ति का पुनर्वितरण, जाति का खात्मा और सामाजिक न्याय हो—अब दूर की बात है। आज की नीतियां खुली बाजार व्यवस्था को गले लगाकर, एक असमान समाज की नींव रख रही हैं।

आर्थिक असमानता की खाई दिन-ब-दिन गहरी होती जा रही है। देश की कुल संपत्ति का 77% सिर्फ़ ऊपर के 10% लोगों के पास है, जबकि निचले 50% को हाल के वर्षों में सिर्फ़ 1% बढ़त मिली। 1991 के बाद भारत ने समाजवादी राज्य नियंत्रण छोड़कर खुली अर्थव्यवस्था की तरफ़ छलांग लगाई, जिससे 2000 में जहां अरबपतियों की संख्या 9 थी, 2017 तक 119 हो गई। यह समाजवाद नहीं, “क्रोनी कैपिटलिज़्म” यानी चहेतों का पूंजीवाद है।

गडकरी का “समावेशी विकास” का आह्वान तब बेमानी लगता है जब सरकार की प्राथमिकता कॉरपोरेट मुनाफे को जनता की भलाई से ऊपर रखती है। भूमि सुधार और संपत्ति कर जैसे लोहिया के साहसिक कदम नीतियों के कब्रगाह में दफन हो चुके हैं।

भारत की कल्याणकारी राज्य की अवधारणा अब केवल दिखावा बन गई है। सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं जर्जर हैं—63 मिलियन लोग हर साल इलाज के खर्च से गरीबी में धकेल दिए जाते हैं। मज़दूरों के अधिकार, भूमि सुधार, और आरक्षण योजनाएं या तो रेंग रही हैं या भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी हैं। गडकरी की ग्रामीण कल्याण की बातें तब खोखली लगती हैं जब ज़मीन पर पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने वाली नीतियाँ चल रही हों।

लोहिया का सपना था जातिविहीन समाज का, लेकिन आज जाति वही पुराना अवरोध बना हुआ है—शिक्षा, रोज़गार और सामाजिक तरक्की में। राजनीतिक दल जातिवाद को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे समाजवादी एकता का मज़ाक बन गया है।

भारत का नया मध्यम वर्ग, जो आर्थिक उदारीकरण की देन है, उपभोक्तावाद की दौड़ में समाजवादी मूल्यों को छोड़ चुका है। वैश्वीकरण ने व्यक्ति-केंद्रित सोच को जन्म दिया है, जहाँ व्यक्तिगत संपत्ति ही सर्वोपरि है। यहां तक कि समाजवादी कहे जाने वाले दल भी अब पूंजीवादी नीति अपनाकर सत्ता की राजनीति में रम गए हैं।

कभी “हिंदू ग्रोथ रेट” कहकर समाजवाद को दोषी ठहराया गया था, ताकि नवउदारवादी नीतियों का रास्ता साफ़ हो सके। अब वही नीतियां भारत को एक ऐसे पूंजीवादी देश में बदल रही हैं, जहां मॉल और अरबपति फलते हैं, और गांव दम तोड़ते हैं।

राज्य की शिक्षा, स्वास्थ्य और उद्योग से दूरी समाजवाद के अंत की घोषणा है। सार्वजनिक उपक्रम या तो बिक चुके हैं या दम तोड़ रहे हैं। यह कोई "मिश्रित अर्थव्यवस्था" नहीं, यह तो समाजवादी चोला पहनकर पूंजीवादी तंत्र का खेल है।

संविधान का समाजवाद अब एक छलावा बन चुका है। नीति और सिद्धांत के बीच की खाई चौड़ी होती जा रही है। लोहिया का सपना—आर्थिक समानता, जाति विहीनता, और राज्य की सामाजिक जिम्मेदारी—अब अरबपतियों की दुनिया, जातिवादी राजनीति और कारपोरेट वर्चस्व में खो गया है।

SP_Singh AURGURU Editor