छात्रों के कंधों पर सियासत की बंदूक! नीट आंदोलन के बहाने विपक्षी दलों में श्रेय की जंग, चुनावी बिसात पर चली जा रहीं नई-नई चालें

नई दिल्ली। दिल्ली का जंतर-मंतर इन दिनों केवल कथित छात्रों के गुस्से का मंच नहीं है, बल्कि विपक्षी राजनीति की नई प्रयोगशाला भी बन चुका है। जिस आंदोलन की शुरुआत नीट परीक्षा में पेपर लीक के विरोध में कुछ युवाओं ने की थी, अब उस आंदोलन के मंच पर राजनीतिक दल अपनी-अपनी मौजूदगी दर्ज कराने और सबसे बड़ा 'छात्र हितैषी' साबित होने की होड़ में उतर चुके हैं। सवाल अब सिर्फ परीक्षा की पारदर्शिता का नहीं रह गया है, बल्कि यह भी है कि इस आंदोलन का सबसे बड़ा राजनीतिक लाभ किसे मिलेगा।

Jul 23, 2026 - 12:20
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छात्रों के कंधों पर सियासत की बंदूक! नीट आंदोलन के बहाने विपक्षी दलों में श्रेय की जंग, चुनावी बिसात पर चली जा रहीं नई-नई चालें
नीट पेपर लीक का मुद्दा अब शिक्षा सुधार से आगे बढ़कर विपक्षी दलों के बीच राजनीतिक श्रेय और आगामी विधानसभा चुनावों की रणनीति का प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है।

दिलचस्प बात यह है कि इस बार मुकाबला सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जितना नहीं दिख रहा, उससे कहीं अधिक विपक्ष के भीतर ही दिखाई दे रहा है। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी, दोनों छात्र हितों के सबसे बड़े पैरोकार बनने की कोशिश में हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को देखते हुए समाजवादी पार्टी कांग्रेस के साथ कदमताल कर रही है, जबकि आम आदमी पार्टी कांग्रेस पर ही भाजपा से सांठगांठ का आरोप लगाकर विपक्षी एकता की तस्वीर को धुंधला कर रही है। यानी लड़ाई भाजपा से पहले विपक्ष के भीतर नेतृत्व और श्रेय की भी है।

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी कम नहीं है कि आंदोलन की शुरुआती रणनीति के पीछे आम आदमी पार्टी की सक्रिय भूमिका रही। अभिजीत दीपके को आंदोलन का चेहरा बनाकर सामने लाने को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। शायद यह सोच रही हो कि राजनीतिक चेहरों की बजाय युवा नेतृत्व के माध्यम से आंदोलन को अधिक व्यापक समर्थन मिल सकता है। लेकिन जैसे-जैसे आंदोलन ने रफ्तार पकड़ी, संसद मार्च का ऐलान हुआ और पुलिस के साथ टकराव की तस्वीरें सामने आईं, वैसे-वैसे राजनीतिक दलों को भी इसमें संभावनाएं दिखाई देने लगीं।

सबसे पहले अरविंद केजरीवाल मैदान में उतरे। उन्होंने पुलिस कार्रवाई की तुलना जलियांवाला बाग जैसी ऐतिहासिक घटना से करते हुए केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। यह बयान केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं था, बल्कि आंदोलन को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाने की राजनीतिक कोशिश भी थी।

उधर, विदेश दौरे से लौटे लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी देर नहीं लगाई। दो कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों, सांसदों और वरिष्ठ नेताओं के साथ प्रधानमंत्री के सरकारी आवास के बाहर धरना देकर उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया कि छात्रों के मुद्दे पर कांग्रेस पीछे रहने वाली नहीं है। इसके बाद संसद के भीतर भी कांग्रेस लगातार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर सरकार को घेर रही है।

यहीं से तस्वीर और दिलचस्प हो जाती है। जिस आंदोलन की शुरुआत कुछ युवाओं ने छात्रों के भविष्य के नाम पर की थी, वह अब विपक्षी दलों के बीच राजनीतिक वर्चस्व की प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा बनता दिख रहा है। जंतर-मंतर पर पहुंचने वाले नेताओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। हर दल चाहता है कि छात्र उसे अपना सबसे बड़ा समर्थक मानें और जनता तक यही संदेश पहुंचे कि वही युवाओं की आवाज़ उठा रहा है।

दरअसल, विपक्ष को इस आंदोलन में आने वाले विधानसभा चुनावों की आहट सुनाई दे रही है। अगले वर्ष कई राज्यों में चुनाव होने हैं और विपक्ष मानता है कि यदि नीट विवाद को व्यापक जनाक्रोश में बदला जा सका, तो इसे मोदी सरकार के खिलाफ एक प्रभावी राजनीतिक मुद्दे में बदला जा सकता है। यही वजह है कि छात्र आंदोलन अब केवल शिक्षा व्यवस्था की बहस नहीं रह गया, बल्कि चुनावी रणनीति का हिस्सा भी बनता जा रहा है।

दूसरी ओर, केंद्र सरकार भी इस पूरे घटनाक्रम को हल्के में लेने के मूड में नहीं दिख रही। सरकार समझती है कि युवाओं से जुड़ा कोई भी मुद्दा राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील होता है। इसलिए वह एक-एक कदम बेहद सावधानी से उठा रही है, ताकि विपक्ष को बड़ा राजनीतिक हथियार न मिल सके।

इस पूरे आंदोलन का एक पहलू ऐसा भी है, जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा हो रही है। जिस नीट परीक्षा के पेपर लीक को लेकर यह आंदोलन चल रहा है, उसमें सबसे अधिक प्रभावित होने वाले छात्रों की प्रत्यक्ष भागीदारी आंदोलन में बहुत कम दिखाई दी है। इसके विपरीत, विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े छात्र संगठनों और उनके कार्यकर्ताओं की सक्रियता कहीं अधिक नजर आई है।

वास्तविकता यह है कि परीक्षा निरस्त होने के बाद अधिकांश अभ्यर्थियों का ध्यान आंदोलन की बजाय अपनी पढ़ाई पर केंद्रित हो गया था। उन्होंने दोबारा होने वाली परीक्षा की तैयारी की, पुनर्परीक्षा दी और अब उसके परिणाम भी घोषित हो चुके हैं। यानी जिन छात्रों का भविष्य सीधे तौर पर इस परीक्षा से जुड़ा था, उनकी प्राथमिकता स्वाभाविक रूप से अपना करियर रही, न कि सड़कों पर उतरकर आंदोलन करना।

दरअसल, नीट जैसी प्रतिस्पर्धी परीक्षा की तैयारी करने वाले अधिकांश छात्र वर्षों तक कठिन परिश्रम करते हैं। उनका पूरा ध्यान लक्ष्य प्राप्त करने पर होता है। यही कारण है कि इस वर्ग का स्वभाव परंपरागत छात्र आंदोलनों से अलग रहा है। यदि परीक्षा निरस्त होने को लेकर व्यापक छात्र आक्रोश स्वतःस्फूर्त रूप से सामने आना होता, तो उसकी सबसे तीखी प्रतिक्रिया उसी समय दिखाई देती, जब पेपर लीक की घटना सामने आई थी और परीक्षा रद्द की गई थी।

इसके विपरीत, आंदोलन की प्रमुख राजनीतिक सक्रियता तब देखने को मिली, जब पुनर्परीक्षा हो चुकी, परिणाम भी आ चुके और मूल प्रभावित छात्र अपने-अपने अगले शैक्षणिक चरण की ओर बढ़ने जा रहे हैं। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या यह आंदोलन अब केवल छात्रों की पीड़ा का प्रतिनिधित्व कर रहा है, या फिर समय के साथ इसका स्वरूप बदलकर राजनीतिक एजेंडे और चुनावी रणनीति का हिस्सा बन गया है। यही प्रश्न इस पूरे घटनाक्रम के राजनीतिक विश्लेषण का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु बनकर उभरता है।

अंत में सबसे बड़ा सवाल वही है, जो हर बड़े जनांदोलन के सामने खड़ा होता है- क्या छात्रों की वास्तविक समस्याएं इस राजनीतिक शोर में दब जाएंगी, या फिर यह आंदोलन शिक्षा व्यवस्था में सुधार का रास्ता खोलेगा? फिलहाल इतना तय है कि जंतर-मंतर पर शुरू हुई यह लड़ाई अब केवल नीट परीक्षा की नहीं रही। यह विपक्ष की राजनीति, चुनावी रणनीति और राजनीतिक श्रेय की ऐसी जंग बन चुकी है, जिसका असर आने वाले विधानसभा चुनावों तक दिखाई देना तय है।

SP_Singh AURGURU Editor