राजीव गांधी: पायलट से 21वीं सदी के महानायक तक

भूतपूर्व प्रधानमंत्री, भारत रत्न, स्वर्गीय राजीव गांधी का आज उनकी पुण्यतिथि पर स्मरण किया जा रहा है। राजीव गांधी नाम आते ही एक ऐसे नेता की छवि सामने आती है, जो उस समय दुनिया के सबसे सुंदर व्यक्तियों में से एक थे, तन से भी और मन से भी। एक ऐसे राजनेता, जिसके मन में न कोई कपट था और न ही कोई राजनीतिक द्वेष।

May 21, 2025 - 18:58
May 21, 2025 - 18:59
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राजीव गांधी: पायलट से 21वीं सदी के महानायक तक

-रमा शंकर शर्मा एडवोकेट-

राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त 1944 को मुंबई में भारत की मिलेनियम लीडर, भूतपूर्व प्रधानमंत्री, भारत रत्न स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी के पुत्र के रूप में हुआ था। राजीव गांधी एक कुशल पायलट थे। 1968 में इटली की बेटी सोनिया गांधी से उनका विवाह हुआ। उनसे उनके दो संतानें हुईं, राहुल गांधी (1970) तथा प्रियंका गांधी वाड्रा (1972)।

31 अक्टूबर 1984 को श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या उनके ही दो सुरक्षा गार्ड्स ने गोली मारकर कर दी थी। इंदिरा जी की हत्या के बाद देश में भूचाल सा आ गया था। ऐसे में देश के सामने नेतृत्वहीनता का बहुत बड़ा संकट खड़ा हो गया था। प्रश्न था कि अब देश को कौन संभालेगा? राजीव गांधी अपनी मां की हत्या से विचलित तो हुए, लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों ने उन्हें और अधिक झकझोर दिया। वे आगे आए और देशवासियों को संदेश दिया- मेरी मां देश की एकता-अखंडता के लिए बलिदान हुई हैं और मैं देश को टूटने नहीं दूंगा।

कांग्रेस पार्टी ने उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध प्रधानमंत्री का पद सौंपा, क्योंकि उस समय जनता को उनसे बेहतर कोई स्वीकार नहीं था। तब उन्होंने देश को संदेश दिया था- मेरे एक कंधे पर मेरी मां की अर्थी है, दूसरे कंधे पर मेरा देश है। मैं दोनों को बखूबी निभाऊंगा।

प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने सबसे पहला भाषण लाल किले की प्राचीर से दिया, जिसमें उन्होंने कहा- मुझे मालूम है कि देश में भ्रष्टाचार इस हद तक पहुंच गया है कि दिल्ली से जब एक रुपया जनता के लिए भेजा जाता है, तो बिचौलिए उसे खा जाते हैं और केवल 15 पैसे ही पहुंच पाते हैं। सम्राट अशोक के बाद राजीव जी ही थे, जिन्होंने झोपड़ियों में घूम-घूमकर लोगों का दर्द समझा, उनकी भावनाएं जानीं और संकल्प लिया कि लोगों का हक उन्हें दिलाया जाएगा।

पंचायती राज विधेयक और नगर पालिका विधेयक आज उसी महानायक की देन है, जिनके कारण देश का पैसा सीधे ग्राम पंचायतों और नगर पालिकाओं तक पहुंचता है।

राजीव जी के दिमाग में एक नए भारत की तस्वीर थी। उन्होंने दुनिया के देशों में घूमकर देश को कंप्यूटर क्रांति दी। राजीव जी का विश्वास था कि नौजवान ही देश का इतिहास बदल सकते हैं। यही सोचकर उन्होंने 18 वर्ष की आयु के करोड़ों भारतीय युवाओं को मताधिकार दिया।

उन्होंने महसूस किया कि पुरानी शिक्षा नीति से संस्कृति और सामाजिकता तो आ सकती है, लेकिन दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए नई शिक्षा नीति आवश्यकता महसूस की और देश को एक नई शिक्षा नीति दी।

राजीव जी का राजनीतिक जीवन बहुत अल्प रहा, लेकिन इस दौरान उन्होंने अपने कामों से जनता का दिल जीत लिया था। इसी अल्प राजनीतिक जीवन से जुड़ी संस्मरण आगरा के भी हैं। 1989 में जब केंद्र में वीपी सिंह के नेतृत्व वाली सरकार थी, तब आगरा में पनवारी कांड हुआ। उस समय राजीव गांधी श्रीमती सोनिया गांधी के साथ घनघोर बारिश में खुद जिप्सी ड्राइव कर पनवारी गांव पहुंचे थे और पीड़ितों से मिले थे। पनवारी से लौटते समय फतेहपुरसीकरी रोड पर बरारा गांव के पास उन्हें तत्कालीन एसएसपी कर्मवीर सिंह ने आगरा शहर में प्रवेश करने से यह कहते हुए रोक दिया था कि शहर में कर्फ्यू लागू है।

राजीव जी के साथ सैकड़ों कांग्रेसी थे। वे चाहते तो राजनीतिक लाभ उठाने के लिए कांग्रेसियों के साथ आगे बढ़ सकते थे, लेकिन उन्होंने कानून का सम्मान किया। राजीव जी ने तब के एसएसपी कर्मवीर सिंह से कहा था कि उन्हें दिल्ली के लिए ट्रेन पकड़नी है। इस पर एसएसपी कर्मवीर सिंह उन्हें अपनी गाड़ी ऒफर की। राजीव जी का बड़प्पन देखिए, जो देश के प्रधानमंत्री रह चुके थे, एसएसपी की बात मानकर उनकी गाड़ी में पीछे बैठे। इसके बाद कर्मवीर सिंह खुद गाड़ी ड्राइव करते हुए उन्हें एयरफोर्स एरिया से होते हुए आगरा कैंट लेकर पहुंचे।

कैंट स्टेशन पर राजीव जी ने मुझसे पूछा कि शर्मा, कर्मवीर कैसा अधिकारी है? मेरे यह कहने पर कि अधिकारी तो अच्छे हैं, लेकिन आज आपके साथ हिमाकत की है। इस पर राजीव जी ने मेरे कंधे पर हाथ रखकर कहा- तुम लोग कर्मवीर के खिलाफ कुछ मत करना। अगर हम ही कानून तोड़ेंगे, तो फिर कौन संभालेगा?

आगरा से जुड़ा एक और संस्मरण सन 1991 के लोकसभा चुनाव का है। राजीव गांधी उन दिनों दिन-रात अथक मेहनत कर रहे थे। खाने और सोने तक का समय नहीं था। कभी जहाज में, तो कभी कार में ही झपकी ले ली जाती थी, और वहीं भोजन भी। अपनी हत्या से 5 दिन पूर्व, 16 मई 1991 को वह महान व्यक्तित्व आगरा में था। रामलीला मैदान में चुनावी रैली थी। लाखों लोग उनके आगमन का इंतजार कर रहे थे। मैं उस सभा का संचालन कर रहा था।

रात करीब 12:30 बजे राजीव गांधी का काफिला आया। राजीव जी ने गले में तिरंगी साफी डाली हुई थी, सिर पर धूल और गुलाब की पंखुड़ियां थीं। मंच पर आए तो जनता राजीव गांधी जिंदाबाद के नारों लगाने लगी। उन्होंने मुझसे कहा- जरा लोगों से कहिए कि हमें मथुरा और धौलपुर भी जाना है, शांत हो जाएं। हम कुछ समय जनता से बात करना चाहते हैं।

मैंने माइक से जनता से शांत होने की अपील की, लेकिन जोश थमने का नाम नहीं ले रहा था। इसी बीच पुलिस ने भीड़ पर डंडा चला दिया। राजीव गांधी ने मंच से पुलिस को डंडा चलाते देखा और माइक लेकर ऐलान किया- पुलिस वाले पीछे हट जाएं, डंडा न चलाएं। उनकी नजर एक दरोगा नागर पर पड़ी, जो पीछे खड़ा होकर डंडा चला रहा था। राजीव जी मंच से कूद गए और अपनी कुहनियों से भीड़ को चीरते हुए उस दरोगा तक पहुंचे। थोड़ी नाराजगी के साथ उसे झकझोरते हुए पूछा- तुमने लोगों पर डंडा क्यों चलाया?

इसके बाद मंच से राजीव भाषण देना शुरू किया। आगरा में भाषण देने के बाद वे मथुरा के लिए रवाना हो गए। सुबह 4:30 बजे जब सर्किट हाउस लौटे, तो वहां पूर्व सांसद निहाल सिंह जैन, प्रदेश मंत्री गुलाब सेहरा, कृष्णवीर सिंह कौशल, जिलाध्यक्ष आजाद कुमार कर्दम, शहर अध्यक्ष ओपी जिंदल सहित तमाम कांग्रेसजन और मैं स्वयं भी उपस्थित था।

हमने राजीव जी से कहा- सर, आपने जिस दरोगा को डांटा था, वह रो गया था। उसे बहुत दुख हुआ है। इस पर राजीव जी ने महानता का परिचय देते हुए तुरंत एसएसपी से कहा- नागर दरोगा को बुलाओ। दरोगा नागर को सूचना दी गई और वे सर्किट हाउस पहुंचे। राजीव जी ने उन्हें अपने बगल में सोफे पर बैठाया, कंधे पर हाथ रखा और प्यार से कहा- नागर, प्लीज... वेरी वेरी सॉरी भाई। हम गुस्से में कह गए थे, क्योंकि जनता जिंदाबाद कर रही थी। प्लीज सॉरी।

21 मई 1991 को राजीव गांधी की हत्या कर दी गई। जब यह समाचार नागर दरोगा को मिला, तो वह भी फूट-फूट कर रो पड़ा। उसके मुंह से एक ही वाक्य निकला कि एक महान नेता की हत्या आखिर कैसे हो गई!

राजीव गांधी मरते दम तक, हर सांस, हर पल, देश के लिए जिए और देश के लिए अमर शहीद हो गए।

(लेखक रमा शंकर शर्मा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं)

SP_Singh AURGURU Editor